दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की डिवीजन पीठ ने सिंगल जज के उस आदेश को चुनौती देने वाली अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें परिसीमा (लिमिटेशन) के आधार पर सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) के आदेश VII नियम 11(d) के तहत संपत्ति से जुड़े एक मुकदमे को खारिज करने से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने माना कि जहां वाद पत्र (प्लेन्ट) में कोविड-19 महामारी के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी आदेशों के तहत समय के निष्कासन (एक्सक्लूजन ऑफ टाइम) और परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 14 का लाभ लेने के आधार मौजूद हैं, वहां परिसीमा का मुद्दा शुरुआती चरण में ही तय करने के बजाय मुद्दे तय करने (फ्रेमिंग ऑफ इश्यूज) और साक्ष्य दर्ज करने के बाद विचारण (ट्रायल) के दौरान तय किया जाने वाला मामला बन जाता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद दिल्ली के कमला नगर स्थित संपत्ति संख्या D-37 से संबंधित है। रेस्पोंडेंट (वादी) श्रीमती सुनिता अग्रवाल का दावा है कि वह स्व. श्रीमती पद्मावती की कानूनी वारिसों में से एक हैं, जो इस संपत्ति की मालिक थीं। नवंबर 2019 में, अपीलकर्ता संख्या 1 श्री जय प्रकाश तायल द्वारा संपत्ति में तीसरे पक्ष का अधिकार बनाए जाने की आशंका के चलते, रेस्पोंडेंट ने सिविल जज के समक्ष सिविल सूट संख्या 3517/2019 दायर कर स्थायी निषेधाज्ञा (परमानेंट इंजंक्शन) की मांग की थी, ताकि अपीलकर्ता को संपत्ति बेचने या किसी अन्य का हित बनाने से रोका जा सके।
8 जनवरी 2020 को, अपीलकर्ता संख्या 1 ने उस मुकदमे में अपना लिखित बयान (रिटन स्टेटमेंट) दर्ज किया। इसमें उन्होंने पहली बार 7 जून 2007 के एक पंजीकृत गिफ्ट डीड (दान पत्र) और एक पंजीकृत वसीयत का हवाला दिया, जिसे कथित तौर पर श्रीमती पद्मावती द्वारा उनके पक्ष में निष्पादित किया गया था। रेस्पोंडेंट का कहना था कि उन्हें इन दस्तावेजों की जानकारी पहली बार लिखित बयान मिलने पर ही हुई।
ट्रायल कोर्ट ने 7 मार्च 2020 को केवल इंजंक्शन के मुकदमे का निपटारा करते हुए कहा कि स्वामित्व (टाइटल) विवाद को देखते हुए केवल इंजंक्शन का मुकदमा पोषणीय नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने रेस्पोंडेंट को उचित घोषणात्मक (डिक्लेरेटरी) और आनुषंगिक राहत की मांग करते हुए एक विस्तृत मुकदमा दायर करने की छूट प्रदान की। रेस्पोंडेंट ने इस फैसले को अपील में चुनौती दी, जिसे अंततः 27 मई 2024 को वापस ले लिया गया, जिससे ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई छूट बरकरार रही।
इसके बाद, रेस्पोंडेंट ने हाईकोर्ट के समक्ष CS(OS) 464/2024 दायर कर गिफ्ट डीड और वसीयत को शून्य और अमान्य घोषित करने, बंटवारे (पारpartition) और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की। इसके जवाब में, अपीलकर्ता संख्या 1 ने सीपीसी के आदेश VII नियम 11 के तहत आवेदन दायर कर तर्क दिया कि मुकदमा परिसीमा अधिनियम के अनुच्छेद 58 के तहत समय सीमा से बाहर (बार्ड बाय लिमिटेशन) है, क्योंकि वादी ने खुद माना है कि उसे 8 जनवरी 2020 को दस्तावेजों की जानकारी मिली थी, जबकि मुकदमा 27 मई 2024 को दायर किया गया। सिंगल जज ने 18 अगस्त 2025 को इस आवेदन को खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ यह अपील डिवीजन पीठ के समक्ष लाई गई।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि घोषणा (डिक्लेरेशन) की राहत परिसीमा अधिनियम के अनुच्छेद 58 द्वारा शासित होती है, जो जानकारी की तारीख (8 जनवरी 2020) से तीन साल की अवधि निर्धारित करती है। उन्होंने कहा कि मुकदमा स्पष्ट रूप से समय सीमा से बाहर था और सिविल कोर्ट द्वारा दी गई छूट से वैधानिक परिसीमा अवधि न तो बढ़ सकती है और न ही निलंबित हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि सिंगल जज ने यह मानने में भूल की कि परिसीमा कानून और तथ्य का एक मिश्रित प्रश्न है, जबकि यह रोक खुद वाद पत्र से ही स्पष्ट थी।
इसके विपरीत, रेस्पोंडेंट के वकील ने सिंगल जज के आदेश का समर्थन किया और तर्क दिया कि आदेश VII नियम 11 सीपीसी का आवेदन मुख्य रूप से प्रतिवादियों के बचाव पर आधारित है, जिसे वाद पत्र खारिज करने के चरण में नहीं देखा जा सकता। रेस्पोंडेंट ने कहा कि जब वाद पत्र को पूरी तरह पढ़ा जाता है, तो यह वह कानूनी और तथ्यात्मक आधार प्रस्तुत करता है जो दर्शाता है कि मुकदमा परिसीमा के भीतर है। यह भी तर्क दिया गया कि परिसीमा का सवाल साक्ष्य की मांग करता है और इसे शुरुआत में ही अलग से तय नहीं किया जा सकता।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
दोनों पक्षों के तर्कों का मूल्यांकन करते हुए पीठ ने टिप्पणी की: “हमारे समक्ष प्रश्न यह नहीं है कि प्रतिवादी परिसीमा के अपने तर्कों में सफल होगी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वाद पत्र केवल एक ही निष्कर्ष पर पहुंचता है कि मुकदमा परिसीमा द्वारा बाधित है।”
पीठ ने ध्यान दिलाया कि परिसीमा अधिनियम के अनुच्छेद 58 के तहत, घोषणा के लिए परिसीमा की अवधि उस समय से तीन वर्ष है जब मुकदमा करने का अधिकार पहली बार उत्पन्न होता है। हालांकि 8 जनवरी 2020 से तीन साल की सामान्य अवधि 7 जनवरी 2023 को समाप्त हो जाती, लेकिन रेस्पोंडेंट ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश पर भरोसा किया जो इन री: कॉग्निजेंस फॉर एक्सटेंशन ऑफ लिमिटेशन (सुओ मोटो रिट पिटीशन (सी) नंबर 3/2020) में 10 जनवरी 2022 को पारित किया गया था। इसके तहत 15 मार्च 2020 से 28 फरवरी 2022 तक की अवधि को परिसीमा की गणना से बाहर रखने का निर्देश दिया गया था।
वाद पत्र में टाइपिंग की गलती को ठीक करते हुए और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सही तारीखों का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने माना कि लगभग 23 महीने और कुछ दिनों की इस अवधि को हटाने के बाद परिसीमा अवधि दिसंबर के आसपास तक बढ़ जाती है। इस प्रकार 27 मई 2024 को दायर किया गया मुकदमा निर्धारित अवधि के भीतर आता है। पीठ ने कहा: “मामले के इस पहलू को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि वाद पत्र के कथनों को पढ़ने से परिसीमा की ऐसी रुकावट बनती है जो सीपीसी के आदेश VII नियम 11(d) को आकर्षित करे।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि परिसीमा अधिनियम की धारा 14 के तहत लाभ मांगने की रेस्पोंडेंट की दलील को भी शुरुआत में ही खारिज नहीं किया जा सकता। धारा 14 क्षेत्राधिकार की कमी या समान कारण से राहत देने में असमर्थ अदालत के समक्ष सद्भावनापूर्वक चलाए गए पिछले सिविल मामले के समय को घटाने की अनुमति देती है।
पीठ ने टिप्पणी की: “प्रतिवादी, यदि आवश्यक हो, अंततः धारा 14 के लाभ की हकदार है या नहीं, यह एक ऐसा मामला है जिसकी जांच उपयुक्त चरण में साक्ष्य के आधार पर करनी होगी। वर्तमान में, पिछली कार्यवाहियों से उत्पन्न ऐसा तर्क यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि परिसीमा का प्रश्न स्पष्ट नहीं है और इसे मुद्दों के निर्धारण के बाद ही तय किया जा सकता है, न कि सीपीसी के आदेश VII नियम 11(d) के तहत किसी आवेदन में।”
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय कंसोलिडेटेड इंजीनियरिंग एंटरप्राइजेज बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी, इरिगेशन डिपार्टमेंट व अन्य, (2008) 7 SCC 169 (पैराग्राफ 52 और 54) का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 14 परिसीमा को बढ़ाती नहीं है, बल्कि उसी राहत के लिए पहले की गई उचित कार्यवाहियों में बिताए गए समय को घटाने की अनुमति देती है। कोर्ट ने आगे कहा: “क्या धारा 14 के अर्थ के भीतर पिछली कार्यवाहियों का वास्तव में सद्भावनापूर्वक और उचित तत्परता के साथ पीछा किया गया था, यह एक ऐसा मामला है जिसका उचित परीक्षण पक्षों द्वारा साक्ष्य पेश करने के बाद और विचारण के समय ही किया जा सकता है।”
अपने विश्लेषण का समापन करते हुए पीठ ने माना: “इन परिस्थितियों में, यह नहीं कहा जा सकता कि वाद पत्र प्रथम दृष्टया परिसीमा का स्पष्ट और असंदिग्ध प्रतिबंध प्रकट करता है; परिणामस्वरूप, सीपीसी के आदेश VII नियम 11(d) के तहत वाद पत्र का खारिज होना न्यायोचित नहीं है।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया और सभी लंबित आवेदनों का निपटारा कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि उसके फैसले की किसी भी बात को परिसीमा से जुड़े पक्षों के तर्कों के गुण-दोष पर राय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए और सभी प्रश्नों को मुकदमे की सुनवाई के दौरान तय करने के लिए खुला रखा गया है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: श्री जय प्रकाश तायल एवं अन्य बनाम श्रीमती सुनिता अग्रवाल
वाद संख्या: एफएओ (ओएस) 111/2025
पीठ: जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर
निर्णय की तिथि: 22 अगस्त 2026

