स्वैच्छिक तबादले पर दूसरे जिले जाने वाले पुलिस कांस्टेबल नई सीनियोरिटी लिस्ट में सबसे नीचे रहेंगे: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि एक जिले से दूसरे जिले में अपने स्वयं के अनुरोध (स्वैच्छिक ट्रांसफर) पर स्थानांतरित होने वाले पुलिस कांस्टेबल नए जिले में अपनी मूल भर्ती की सीनियोरिटी (वरिष्ठता) को बरकरार नहीं रख सकते। जस्टिस विभू दत्त गुरु की पीठ ने विभागीय पदोन्नति प्रक्रिया को चुनौती देने वाली रिट याचिकाओं के एक समूह का निपटारा करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ पुलिस कार्यपालिक बल, कांस्टेबल (भर्ती तथा सेवा की शर्तें) नियम, 2007 के नियम 16A के तहत, स्वयं के अनुरोध पर तबादला पाने वाले कर्मचारियों को तबादला आदेश की तारीख से नए जिले की सीनियोरिटी लिस्ट में सबसे नीचे रखा जाना अनिवार्य है। नतीजतन, हाईकोर्ट ने हेड कांस्टेबल के पद पर पदोन्नति के लिए 13 फरवरी, 2026 के बाद तैयार की गई सीनियोरिटी/ग्रेडेशन लिस्ट और परिणामी फिट लिस्ट को रद्द कर दिया तथा राज्य के प्राधिकारियों को वैधानिक नियमों के अनुसार दोबारा सूचियाँ तैयार करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद जिला कोरबा में लगभग 16 से 17 वर्षों से कार्यरत लव कुमार पात्रे और अन्य पुलिस कांस्टेबलों द्वारा दायर याचिकाओं से शुरू हुआ। याचिकाकर्ता इस बात से क्षुब्ध थे कि वर्ष 2026 के लिए आयोजित विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की प्रक्रिया के दौरान हेड कांस्टेबल के पद पर पदोन्नति के लिए उनके नाम पर विचार नहीं किया गया।

याचिकाकर्ताओं की मुख्य शिकायत यह थी कि विभाग ने अन्य जिलों से स्थानांतरित होकर आए कई कांस्टेबलों को उनकी मूल शुरुआती नियुक्ति की तारीख के आधार पर जिला कोरबा की ग्रेडेशन लिस्ट में शामिल कर लिया। इनमें से कई अधिकारी अपने व्यक्तिगत अनुरोध पर आए थे, फिर भी उन्हें उन स्थानीय कांस्टेबलों से ऊपर रखा गया जो लंबे समय से इस जिला कैडर में सेवा दे रहे थे। प्रोविजनल ग्रेडेशन लिस्ट के खिलाफ दर्ज कराई गई आपत्तियों को अधिकारियों ने 4 मई, 2026 के एक आदेश द्वारा खारिज कर दिया था। याचिकाकर्ताओं ने ध्यान दिलाया कि पूर्व की सूचियों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले 6 अगस्त, 2021 के एक पुराने एसओपी को हाईकोर्ट ने पहले ही रद्द कर दिया था और राज्य सरकार को छत्तीसगढ़ पुलिस अधिनियम, 2007 की धारा 51(2) तथा संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत नए नियम बनाने की छूट दी थी। इसके बाद, राज्य सरकार ने 13 फरवरी, 2026 को संशोधित नियम 16A अधिसूचित किया, जो विशेष रूप से पदोन्नति प्रक्रिया और सीनियोरिटी निर्धारण को नियंत्रित करता है।

अदालत के समक्ष पक्षकारों के तर्क

याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने तर्क दिया कि कांस्टेबल का पद जिला कैडर का पद होता है। जब कोई कर्मचारी स्वेच्छा से दूसरे जिला कैडर में तबादला मांगता है, तो वैधानिक नियमों के अनुसार वह अपनी कैडर सीनियोरिटी खो देता है और नए कैडर में सबसे नीचे शामिल होता है। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले डायरेक्ट रिक्रूट क्लास II इंजीनियरिंग ऑफिसर्स एसोसिएशन बनाम महाराष्ट्र राज्य (1990) का हवाला देते हुए कहा कि सीनियोरिटी का निर्धारण लागू वैधानिक योजना के अनुसार होना चाहिए, न कि उसके विपरीत किसी प्रशासनिक व्यवस्था के आधार पर। उन्होंने संतोष कुमार बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2003) और अमरेंद्र कुमार महापात्रा बनाम उड़ीसा राज्य (2014) का हवाला देते हुए कहा कि प्रशासनिक निर्णय वैधानिक नियमों का स्थान नहीं ले सकते।

दूसरी ओर, राज्य के वकील ने याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि विभाग ने शुरुआती नियुक्ति की तारीखों को ध्यान में रखकर वैधानिक मानदंडों के अनुसार काम किया है। राज्य ने दलील दी कि निजी प्रतिवादी याचिकाकर्ताओं से पहले नियुक्त हुए थे और वे एक ही राज्य पुलिस सेवा के भीतर निरंतर सेवा में बने हुए हैं। इसलिए, केवल अंतर-जिला तबादले के कारण उनकी मूल नियुक्ति की तारीख को समाप्त नहीं किया जा सकता।

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निजी प्रतिवादियों के वकीलों ने भी राज्य के रुख का समर्थन किया और कहा कि अंतर-जिला तबादले से एकीकृत राज्य पुलिस सेवा में उनकी सेवा की अवधि या मूल सीनियोरिटी खत्म नहीं होती। हालाँकि, एक प्रतिवादी (प्रतिवादी संख्या 63) ने अन्य निजी प्रतिवादियों से अलग रुख अपनाते हुए याचिकाकर्ताओं का समर्थन किया और वर्ष 2026 की पदोन्नति प्रक्रिया के लिए संशोधित नियम 16A को सख्ती से लागू करने की माँग की।

अदालत का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष

वैधानिक ढांचे का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि वर्ष 2007 के नियम संविधान के अनुच्छेद 309 के परंतुक के तहत बनाए गए थे और 13 फरवरी, 2026 को नियम 16A को शामिल करके इनमें स्पष्ट संशोधन किया गया था।

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नियम 16A(1) स्पष्ट रूप से यह निर्देश देता है:

“कांस्टेबल और हेड कांस्टेबल के पद जिला कैडर के हैं। प्रशासनिक दृष्टिकोण से एक जिले/इकाई से दूसरे जिले/इकाई में कांस्टेबल और हेड कांस्टेबल के तबादले के मामले में सीनियोरिटी का निर्धारण छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (सामान्य सेवा की शर्तें) नियम, 1961 के नियम 12 ‘सीनियोरिटी’ के प्रावधानों के अनुसार किया जाएगा। हालांकि, जहां ऐसा तबादला कर्मचारी के अनुरोध पर किया जाता है, उसे तबादला आदेश की तारीख से संबंधित जिले/इकाई की सीनियोरिटी लिस्ट में सबसे नीचे रखा जाएगा।”

प्रशासनिक तबादलों और स्वैच्छिक तबादलों के बीच के अंतर का विश्लेषण करते हुए जस्टिस विभू दत्त गुरु ने टिप्पणी की कि जहाँ प्रशासनिक तबादलों में सीनियोरिटी के लिए निरंतर सेवा अवधि बनी रहती है, वहीं स्वैच्छिक तबादलों के अलग कानूनी परिणाम होते हैं।

अदालत ने टिप्पणी की:

“जहाँ किसी सरकारी कर्मचारी का तबादला उसके खुद के अनुरोध पर किया जाता है, वहाँ स्थानांतरित कर्मचारी को तबादले की तारीख तक की अपनी सीनियोरिटी छोड़नी होगी और उसे नए कैडर या विभाग में संबंधित श्रेणी के सबसे जूनियर कर्मचारी के नीचे स्थान दिया जाएगा।”

कानूनी तर्क को विस्तार से बताते हुए अदालत ने कहा:

“ऐसा इसलिए है क्योंकि व्यक्तिगत कारणों से किसी अन्य इकाई या विभाग में स्थानांतरित होने वाले सरकारी कर्मचारी को यह दावा करके उस विभाग के कर्मचारियों की सीनियोरिटी बिगाड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि जिस विभाग से उसका तबादला हुआ है, वहाँ की गई उसकी सेवा को ध्यान में रखा जाना चाहिए।”

अदालत ने कैडर की उम्मीदों पर पड़ने वाले प्रभाव को रेखांकित करते हुए आगे कहा:

“यह इसलिए भी है क्योंकि किसी कैडर में किसी पद पर नियुक्त व्यक्ति को कैडर की संख्या और कैडर के लिए तैयार की गई सीनियोरिटी लिस्ट के आधार पर पदोन्नति की संभावनाओं का पता होना चाहिए, और बाहर से किसी भी नए जुड़ाव से ऐसी संभावनाएँ प्रभावित होंगी।”

इन सिद्धांतों के समर्थन में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित फैसलों द्विजेन चंद्र सरकार बनाम भारत संघ (1999), के.पी. सुधाकरन बनाम केरल राज्य (2006), और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव बनाम के.सी. देवकी (2025) का संदर्भ दिया।

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अदालत ने राज्य के बचाव को खारिज करते हुए कहा कि “सीनियोरिटी को नियंत्रित करने वाले किसी वैधानिक नियम को प्रशासनिक व्याख्या द्वारा या किसी कर्मचारी की नियुक्ति की मूल तारीख का सहारा लेकर दरकिनार नहीं किया जा सकता।”

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने रिट याचिकाओं के समूह को स्वीकार करते हुए निर्णय दिया कि 13 फरवरी, 2026 के बाद तैयार की गई ग्रेडेशन और फिट लिस्ट को इस हद तक बरकरार नहीं रखा जा सकता कि वे स्वैच्छिक तबादले वाले कर्मचारियों के संबंध में नियम 16A के वैधानिक जनादेश की अनदेखी करती हैं।

अदालत ने विवादित सीनियोरिटी/ग्रेडेशन लिस्ट और परिणामी फिट लिस्ट को रद्द कर दिया। इसने प्रतिवादी प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे नियम 16A के सख्त अनुपालन में सीनियोरिटी का निर्धारण करने के लिए नए सिरे से प्रक्रिया शुरू करें, तदनुसार सूचियों को फिर से तैयार करें और उसके बाद पदोन्नति प्रक्रिया आयोजित करें। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस निर्णय का अर्थ किसी भी याचिकाकर्ता की स्वचालित पदोन्नति नहीं है, क्योंकि संशोधित सीनियोरिटी लिस्ट प्रकाशित होने के बाद प्रासंगिक नियमों के अनुसार ही प्रत्येक कर्मचारी की पात्रता, उपयुक्तता और योग्यता का मूल्यांकन किया जाएगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: तारेश्वर नाथ केशरी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य (और संबद्ध मामले)

वाद संख्या: डब्ल्यूपीएस संख्या 4339 वर्ष 2026 (मुख्य मामला: डब्ल्यूपीएस संख्या 4364 वर्ष 2026)

पीठ: जस्टिस विभू दत्त गुरु

निर्णय की तिथि: 11 अगस्त, 2026

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