पंजाब के अमृतसर स्थित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक पब्लिशिंग कंपनी को सेवा में लापरवाही का दोषी ठहराते हुए एक वकील की पूरी राशि ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया है। कंपनी ने वकील से 8,000 रुपये लेकर उनकी किताब छापने और 15 से 20 दिनों के भीतर डिलीवरी देने का वादा किया था, लेकिन भुगतान मिलने के बाद काम पूरा नहीं किया। आयोग ने कंपनी को मानसिक उत्पीड़न और कानूनी खर्च के एवज में 15,000 रुपये अतिरिक्त देने का भी निर्देश दिया है।
भुगतान के बाद पब्लिशर ने साधी चुप्पी
अमृतसर जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष जगदीश्वर कुमार चोपड़ा और सदस्य मनदीप कौर की पीठ ने 3 अगस्त को इस मामले में अपना फैसला सुनाया। पीठ ने अपने आदेश में कहा, “भुगतान प्राप्त करने के बाद पब्लिशिंग कंपनी का पूरी तरह चुप रहना, बार-बार किए गए संपर्कों को नजरअंदाज करना, कानूनी नोटिस की तामील से बचना और उसके बाद मौजूदा कार्यवाही में शामिल न होना स्पष्ट रूप से सेवा में कमी को साबित करता है।”
शिकायतकर्ता अधिवक्ता ने अक्टूबर 2024 में अपनी पुस्तक के प्रकाशन के लिए पब्लिशिंग हाउस से संपर्क किया था। कंपनी ने 8,000 रुपये के कुल पैकेज में आईएसबीएन (ISBN) नंबर प्रक्रिया, कवर डिजाइनिंग, प्रिंटिंग और ऑनलाइन लिस्टिंग जैसी सुविधाएं देने का आश्वासन दिया था। इसके बाद वकील ने 10 अक्टूबर और 17 अक्टूबर 2024 को 4,000-4,000 रुपये की दो किस्तों में पूरी राशि का भुगतान कर दिया।
महीनों तक चक्कर काटने के बाद कानूनी नोटिस
कंपनी ने 15 से 20 दिनों में छपी हुई किताबें भेजने का भरोसा दिया था, लेकिन निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी कोई काम पूरा नहीं किया गया। अक्टूबर 2024 से मई 2025 तक पीड़ित वकील ने फोन कॉल, व्हाट्सएप संदेशों और ईमेल के जरिए लगातार संपर्क करने की कोशिश की, मगर पब्लिशर की तरफ से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
परेशान होकर वकील ने जून 2025 में पब्लिशिंग कंपनी को औपचारिक कानूनी नोटिस भेजकर किताब का प्रकाशन पूरा करने या मुआवजा सहित पैसे लौटाने की मांग की। हालांकि, अगले ही दिन यह नोटिस “कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है” की टिप्पणी के साथ वापस आ गया। इसके बाद पीड़ित अधिवक्ता ने उपभोक्ता आयोग का रुख किया।
45 दिनों के भीतर करना होगा भुगतान
वकील ने अपनी शिकायत में किताब का प्रकाशन कराने या ब्याज सहित रकम वापसी के साथ-साथ 5 लाख रुपये के मुआवजे और 25,000 रुपये मुकदमे के खर्च की मांग की थी।
आयोग ने शिकायत को स्वीकार करते हुए कंपनी को निर्देश दिया कि वह शिकायत दर्ज करने की तिथि से 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर के साथ 8,000 रुपये की मूल राशि लौटाए। इसके अलावा, सेवा में कमी के कारण हुए मानसिक कष्ट और असुविधा के बदले 10,000 रुपये का मुआवजा और 5,000 रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में देने के आदेश दिए। आयोग ने पब्लिशिंग कंपनी को यह पूरी रकम 45 दिनों के भीतर अदा करने की ताकीद की है।

