दिल्ली डीएचजेएस परीक्षा: प्रश्न हटाने के खिलाफ दायर याचिका दिल्ली हाईकोर्ट से खारिज, 77 अंक के कट-ऑफ से पीछे रहा अभ्यर्थी

दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली हायर जुडिशियल सर्विस (डीएचजेएस) प्रारंभिक परीक्षा 2024 के एक प्रश्न को हटाए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली अभ्यर्थी की याचिका खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विवादास्पद प्रश्न को बहाल कर भी दिया जाता, तब भी अभ्यर्थी का प्राप्तांक मुख्य (लिखित) परीक्षा के निर्धारित कट-ऑफ अंक तक नहीं पहुंच पाता।

जस्टिस वी कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिकाकर्ता के परीक्षा परिणाम के लिहाज से यह कानूनी चुनौती पूरी तरह निष्प्रभावी और अकादमिक है। हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि प्रश्न संख्या 60 को रद्द करने के प्रशासनिक फैसले के खिलाफ किसी अन्य अभ्यर्थी ने अदालत का रुख नहीं किया है।

मुख्य परीक्षा के कट-ऑफ अंक से कम रहा प्राप्तांक

हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से अदालत में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, डीएचजेएस मुख्य (लिखित) परीक्षा में प्रवेश के लिए न्यूनतम कट-ऑफ 77 अंक तय किया गया था। याचिकाकर्ता ने प्रारंभिक परीक्षा में 75.75 अंक प्राप्त किए थे।

पीठ ने कहा कि यदि प्रश्न संख्या 60 के संबंध में याचिकाकर्ता के दावे को स्वीकार कर एक अतिरिक्त अंक दे भी दिया जाता, तो उसका कुल स्कोर 76.75 अंक ही होता। यह अंक भी निर्धारित कट-ऑफ से कम है, इसलिए याचिकाकर्ता को कोई प्रभावी राहत नहीं दी जा सकती।

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विशेषज्ञ संस्था के अधिकार क्षेत्र को ठहराया सही

परीक्षा समिति की भूमिका का समर्थन करते हुए पीठ ने कहा कि परीक्षा समिति एक विशेषज्ञ प्रशासनिक संस्था है। उत्तर कुंजी पर आपत्तियां प्राप्त होने के बाद विस्तृत समीक्षा के आधार पर किसी अस्पष्ट प्रश्न को संशोधित करने या हटाने का पूरा अधिकार समिति के पास है। हाईकोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का मनमानापन, प्रक्रियात्मक त्रुटि या दुर्भावना साबित करने में असमर्थ रहा।

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उम्र में छूट देने की मांग भी खारिज

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने आगामी डीएचजेएस परीक्षा चक्र में शामिल होने के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा पार होने का तर्क देते हुए उम्र में एक बार की छूट देने की मौखिक गुहार लगाई थी। हालांकि, पीठ ने इस अनुरोध को अस्वीकार करते हुए टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता ऐसी राहत के लिए कोई भी वैधानिक या कानूनी आधार प्रस्तुत करने में विफल रहा।

20 फरवरी के नोटिस से जुड़ा था मामला

यह विवाद दिल्ली हाईकोर्ट प्रशासन द्वारा 20 फरवरी 2025 को जारी उस नोटिस से उत्पन्न हुआ था, जिसके माध्यम से अस्पष्टता के आधार पर प्रारंभिक परीक्षा के चार प्रश्नों को रद्द कर दिया गया था और चार अन्य प्रश्नों की उत्तर कुंजी संशोधित की गई थी।

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याचिकाकर्ता ने शुरुआत में सभी आठ बदलावों को चुनौती दी थी, लेकिन अदालत में मौखिक बहस के दौरान अपनी दलीलों को केवल प्रश्न संख्या 60 को हटाए जाने तक सीमित रखा। यह प्रश्न विशिष्ट वैधानिक प्रावधानों के तहत बयानों के साक्ष्य मूल्य पर आधारित था। याचिकाकर्ता के वकील का तर्क था कि प्रोविशनल मॉडल उत्तर कुंजी में विकल्प दो को सही दर्शाया गया था और परीक्षा देने वाले हजारों अभ्यर्थियों में से केवल आठ ने आपत्तियां दर्ज कराई थीं, जिनमें से किसी ने भी प्रश्न के अस्पष्ट होने का दावा नहीं किया था।

हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट करते हुए कि उसने प्रश्न संख्या 60 की तकनीकी शुद्धता या कानूनी पहलुओं का मूल्यांकन नहीं किया है, याचिका को पूर्ण रूप से खारिज कर दिया।

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