ट्रायल कोर्ट से बरी आरोपी के पक्ष में सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ पीड़ित दूसरी अपील नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 372 के प्रावधान के तहत पीड़ित किसी आरोपी को मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा बरी किए जाने और सेशन कोर्ट द्वारा उस फैसले को बरकरार रखे जाने के बाद दूसरी अपील दायर नहीं कर सकता। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने माना कि धारा 372 CrPC का प्रावधान पीड़ित को बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ केवल एक बार अपील करने का अधिकार देता है और यह लगातार या दूसरी अपील की अनुमति नहीं देता। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने सड़क दुर्घटना की शिकार हुई महिला के पति द्वारा बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर आपराधिक अपील को खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 24 अगस्त, 2005 का है, जब दोपहर लगभग 1:00 बजे शाहीन परवीन अपनी बेटी को स्कूल से लेकर लौट रही थीं। नई दिल्ली के प्रगति विहार स्थित साईं बाबा मंदिर बस स्टैंड, भीष्म पितामह मार्ग के पास पंजीकरण संख्या DL 7CG 0316 वाली एक टोयोटा कोरोला कार ने उन्हें टक्कर मार दी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गईं और बाद में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना में उनकी बेटी आयशा भी घायल हो गई थी।

डीडी एंट्री से मिली जानकारी के आधार पर लोधी कॉलोनी पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 279 (लापरवाही से वाहन चलाना), 337 (दूसरों का जीवन खतरे में डालना) और 304A (लापरवाही से मौत का कारण बनना) के तहत प्राथमिकी (अपराध संख्या 227/2005) दर्ज की गई। जांच पूरी करने के बाद पुलिस ने आरोपी विभोर आहलूवालिया के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की।

ट्रायल के दौरान आरोपी ने खुद को निर्दोष बताया। धारा 313 CrPC के तहत दर्ज अपने बयान में आरोपी ने कहा कि वह कार नहीं चला रहा था और न ही घटना के लिए जिम्मेदार था, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक के नाते वह घायल को मूलचंद अस्पताल ले गया था। 5 नवंबर, 2015 को साकेत कोर्ट के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने धारा 255(1) CrPC के तहत आरोपी को बरी कर दिया। पीड़ित के पति (PW1) ने इस फैसले को सेशन कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन साकेत कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 28 अक्टूबर, 2022 को अपील खारिज करते हुए बरी किए जाने के आदेश की पुष्टि कर दी। इसके बाद पति ने दिल्ली हाईकोर्ट में दूसरी अपील दायर की।

हाईकोर्ट के समक्ष तर्क

आरोपी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह अपील विचारणीय नहीं है। उन्होंने कहा कि धारा 372 CrPC का प्रावधान पीड़ित को अपील का अधिकार केवल एक बार प्रदान करता है और बरी किए जाने के एक ही आदेश के खिलाफ बार-बार अपील करने की अनुमति नहीं देता। सेशन कोर्ट के समक्ष उपलब्ध कानूनी वैधानिक उपाय का उपयोग कर लेने के बाद, अपीलकर्ता के पास दूसरी अपील बनाए रखने का कोई अधिकार नहीं है। इसके समर्थन में एशियन पेंट्स लिमिटेड बनाम राम बाबू, गोपाला कृष्णन बनाम केरल राज्य, और महेश बनाम गुंडेराव जैसे मामलों का हवाला दिया गया।

READ ALSO  दो महीने से अधिक समय तक निर्णयों को सुरक्षित ना रखा जाए: सीजे मद्रास हाईकोर्ट

दूसरी ओर, अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि धारा 372 CrPC के तहत अपील विचारणीय है, क्योंकि यह प्रावधान पीड़ित को किसी भी बरी किए जाने वाले आदेश के खिलाफ उस अदालत में अपील करने का अधिकार देता है, जहां सजा के आदेश के खिलाफ आमतौर पर अपील की जाती है। अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के जोसेफ स्टीफन बनाम संथानासामी फैसले का हवाला दिया।

अदालत का विश्लेषण और निर्णय

पूर्व के फैसलों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि जोसेफ स्टीफन बनाम संथानासामी मामले का निर्णय वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होता है। जोसेफ स्टीफन मामले में अपीलीय अदालत ने सजा के फैसले को बरी किए जाने के आदेश में बदल दिया था, जिससे रिवीजन याचिका की स्थिति बनी थी, जबकि वर्तमान मामले में सेशन कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को बरकरार रखा था।

कानूनी स्थिति को रेखांकित करते हुए अदालत ने टिप्पणी की:

“जोसेफ स्टीफन मामले में दिया गया सिद्धांत स्पष्ट रूप से वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू नहीं होता है। उक्त मामले के विपरीत, इस मामले में अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित बरी किए जाने के आदेश की पुष्टि की है। ऐसी परिस्थितियों में दूसरी अपील नहीं हो सकती।”

केरल हाईकोर्ट के गोपाला कृष्णन बनाम केरल राज्य मामले सहित अन्य निर्णयों का संदर्भ देते हुए अदालत ने माना कि दूसरी अपील पोषणीय (maintainable) नहीं है और तदनुसार याचिका का निपटारा कर दिया। हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री को चुनौती दिए गए फैसले की प्रमाणित प्रति अपीलकर्ता को लौटाने का निर्देश दिया और सभी लंबित आवेदनों को बंद कर दिया।

मामले का विवरण

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने पीडीपी नेता मदनी को इलाज के लिए केरल जाने और वहां रहने की अनुमति दी

मामले का शीर्षक: तलत शाहिदी बनाम विभोर आहलूवालिया और अन्य
वाद संख्या: CRL.A. 884/2023 और CRL.M.A. 28555/2023
पीठ: जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा
निर्णय की तिथि: 20 अगस्त, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles