भू-राजनीतिक तनावों, आर्थिक अनिश्चितताओं और तेजी से विकसित होती तकनीकों के इस दौर में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का स्वरूप बदल रहा है। ऐसे समय में विभिन्न देशों के बीच परस्पर सहयोग बनाए रखने के लिए नियम-आधारित व्यवस्था (रूल ऑफ लॉ) सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह बात सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज जस्टिस विक्रम नाथ ने बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित 11वें ब्रिक्स+ लीगल फोरम को संबोधित करते हुए कही।
कार्यक्रम में ब्रिक्स सदस्य देशों के प्रतिनिधियों और भारतीय कानूनी समुदाय को संबोधित करते हुए जस्टिस नाथ ने कहा कि दशक पुराने अंतरराष्ट्रीय संस्थान वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं का सही प्रतिनिधित्व करते हैं या नहीं, इस पर व्यापक बहस चल रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अलग-अलग कानूनी प्रणालियों के बावजूद आपसी समझ और संस्थागत जवाबदेही के जरिए ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी सहयोग संभव है।
एआई गवर्नेंस में मानवीय निर्णय और सामाजिक जवाबदेही
जस्टिस विक्रम नाथ ने आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते प्रभाव पर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने कहा कि एआई अब भविष्य की कोई काल्पनिक तकनीक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक जीवन का व्यावहारिक हिस्सा बन चुका है और इसका विस्तार होना तय है। उन्होंने जोर दिया कि एआई के नियमन के लिए ऐसा ढांचा तैयार करना जरूरी है जो तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने के साथ-साथ सुरक्षा, समावेशिता, मानवाधिकारों और समान पहुंच की गारंटी दे।
कानूनी बिरादरी के सामने खड़ी चुनौतियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि तकनीक की प्राथमिकता गति होती है, जबकि कानून का काम गहन परीक्षण, तार्किक विचार-विमर्श और जवाबदेही तय करना है। चूंकि एआई प्रणालियों को इंसान ही तैयार करते हैं और यह मानव समाज के डेटा पर ही प्रशिक्षित होती हैं, इसलिए इनमें सामाजिक पूर्वाग्रह और असमानताएं भी आ सकती हैं। जस्टिस नाथ ने आगाह किया कि एआई के संचालन का जिम्मा केवल इसके डेवलपर्स पर नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि इसमें जज, वकील, नीति निर्माता, वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल होने चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग का आधार है कानून का शासन
वैश्विक स्तर पर जारी उथल-पुथल का उल्लेख करते हुए जस्टिस नाथ ने कहा कि कानून का शासन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को स्थायित्व प्रदान करता है। यह विभिन्न देशों के बीच मतभेदों और विवादों के समाधान के लिए एक निष्पक्ष तथा विश्वसनीय मंच तैयार करता है। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स समूह का कानूनी आयाम इसके राजनीतिक और आर्थिक सहयोग से अलग नहीं है, बल्कि यह आपसी समझौतों को संरचनात्मक निश्चितता देता है।
सांस्कृतिक विविधता और ब्रिक्स का विस्तार
भारत के अनुभव का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा कि भाषा, संस्कृति और विचारों की विविधता के बावजूद साझा मंच तलाशना भारत की विशेषता रही है। ब्रिक्स सदस्य देशों की राजनीतिक, आर्थिक और कानूनी प्रणालियां अलग हो सकती हैं, लेकिन साझा हितों वाले क्षेत्रों में सहयोग करना ही इस समूह की मूल शक्ति है।
उन्होंने ब्रिक्स के विकास क्रम को याद दिलाते हुए कहा कि ब्राजील, रूस, भारत और चीन को मिलाकर बना यह समूह शुरुआत में मुख्य रूप से आर्थिक चर्चाओं तक सीमित था। वर्ष 2009 के पहले शिखर सम्मेलन के बाद से इसका दायरा काफी व्यापक हुआ है। आज यह समूह सतत विकास, संस्थागत सहयोग, प्रौद्योगिकी और वैकल्पिक विवाद समाधान जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर काम कर रहा है। जस्टिस नाथ ने कहा कि 21वीं सदी के अनुकूल कानूनी ढांचा तैयार करने के लिए न्यायिक संस्थानों को लगातार बदलते परिवेश के अनुसार खुद को ढालना होगा।

