सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने गुरुवार को 5:4 के बहुमत से इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 की धारा 2(j) के तहत ‘इंडस्ट्री’ की पहचान के लिए लागू टेस्ट में बदलाव किया। कोर्ट ने 1978 के बैंगलोर वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा मामले में सात जजों की पीठ द्वारा तय ढांचे को पूरी तरह खारिज नहीं किया, लेकिन उसके ‘ट्रिपल टेस्ट’ के कुछ हिस्सों और उससे जुड़ी गाइडलाइंस को नए सिरे से तय किया है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस पीएस नरसिम्हा, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस उज्जल भुइयां, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल थे।
बहुमत के पांच जजों ने माना कि बैंगलोर वाटर सप्लाई फैसले में तय मूल ढांचा समय की कसौटी पर कायम रहा है, लेकिन ट्रिपल टेस्ट के कुछ तत्वों को धारा 2(j) के दायरे और स्वरूप को बेहतर ढंग से स्पष्ट करने के लिए नए सिरे से तैयार करने की जरूरत है।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि नया फैसला केवल भविष्य के मामलों पर लागू होगा। इसका असर पहले से लंबित विवादों और मामलों पर नहीं पड़ेगा। अदालतों, ट्रिब्यूनलों, लेबर अथॉरिटीज और अन्य फोरम के सामने इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट के तहत लंबित मामलों का फैसला बैंगलोर वाटर सप्लाई केस में तय पुराने ट्रिपल टेस्ट के आधार पर किया जा सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020 में दी गई ‘इंडस्ट्री’ की नई परिभाषा पर विचार करने से भी परहेज किया।
चार जजों ने बहुमत से जताई असहमति
जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने बहुमत के फैसले से असहमति जताई।
जस्टिस नागरत्ना ने अलग राय देते हुए कहा कि बैंगलोर वाटर सप्लाई मामले में दी गई ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं थी। उनके मुताबिक, 2005 में इस मुद्दे को बड़ी पीठ के पास भेजने की भी आवश्यकता नहीं थी।
उन्होंने कहा कि धारा 2(j) में ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा को व्यापक रूप से समझा जाना चाहिए। केवल इस आधार पर किसी गतिविधि को ‘इंडस्ट्री’ के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता कि वह काम सरकार कर रही है। सरकारी विभागों या उनकी संस्थाओं द्वारा चलाई जा रही सामाजिक कल्याण योजनाएं और अन्य गतिविधियां भी उनके स्वरूप के आधार पर धारा 2(j) के तहत औद्योगिक गतिविधि हो सकती हैं।
जस्टिस दीपांकर दत्ता ने जस्टिस उज्जल भुइयां के साथ माना कि स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम जय बीर सिंह मामले में पांच जजों की पीठ द्वारा किया गया रेफरेंस जरूरी नहीं था। उनके मुताबिक, इससे कोई व्यावहारिक, न्यायशास्त्रीय या सैद्धांतिक उद्देश्य पूरा नहीं होता। उन्होंने कानून में अंतिमता के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि करीब आधी सदी से लागू कानूनी स्थिति को दोबारा खोलने के लिए कोई ठोस वजह नहीं थी।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने रेफरेंस को सुनवाई योग्य माना, लेकिन मामले के मेरिट पर बहुमत से असहमति जताई। उन्होंने जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस दत्ता की इस राय से सहमति जताई कि बैंगलोर वाटर सप्लाई में तय ट्रिपल टेस्ट ही 1947 के कानून के तहत ‘इंडस्ट्री’ के दायरे को सही तरीके से निर्धारित करता है।
जस्टिस बागची के मुताबिक, यह टेस्ट उन नियोक्ता-कर्मचारी विवादों तक श्रम कानून का लाभकारी उद्देश्य पहुंचाता है, जहां पक्ष मानव जरूरतों को पूरा करने के लिए वस्तुओं या सेवाओं के उत्पादन से जुड़ी संगठित और व्यवस्थित गतिविधियों में शामिल होते हैं। इसके लिए गतिविधि का व्यावसायिक आधार पर चलना जरूरी नहीं है।
उन्होंने इस आलोचना से भी असहमति जताई कि ट्रिपल टेस्ट हर संगठित मानवीय गतिविधि को ‘इंडस्ट्री’ बना देता है। उन्होंने कहा कि घरेलू सेवा, व्यक्तिगत पेशे और छोटे व असंगठित क्लब, एसोसिएशन या व्यक्तियों जैसी आकस्मिक और गैर-व्यवस्थित गतिविधियों को इससे बाहर रखा गया है।
1978 के फैसले से आया था ‘ट्रिपल टेस्ट’
नौ जजों की पीठ के सामने मुख्य सवाल 1978 के बैंगलोर वाटर सप्लाई फैसले की समीक्षा से जुड़ा था। सात जजों की पीठ ने उस फैसले में ‘इंडस्ट्री’ की व्यापक व्याख्या करते हुए ‘ट्रिपल टेस्ट’ तैयार किया था।
इस टेस्ट के मुताबिक, किसी गतिविधि को सामान्य तौर पर ‘इंडस्ट्री’ माना जा सकता है, यदि वहां व्यवस्थित गतिविधि हो, नियोक्ता और कर्मचारी के बीच संगठित सहयोग हो और मानव की जरूरतों व इच्छाओं को पूरा करने के लिए वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन या वितरण किया जाता हो।
उस फैसले में लाभ कमाने के उद्देश्य और पूंजी निवेश को इस सवाल के निर्धारण में काफी हद तक गैर-जरूरी माना गया था। इससे इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट की धारा 2(j) का दायरा व्यापक हो गया था।
बाद में स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम जय बीर सिंह मामले में इस व्याख्या पर सवाल उठा। वर्ष 2005 में पांच जजों की संविधान पीठ ने बैंगलोर वाटर सप्लाई में अपनाई गई व्यापक व्याख्या पर संदेह जताते हुए मामला बड़ी पीठ के पास भेज दिया था।
यह रेफरेंस दो दशक से अधिक समय तक लंबित रहा। नौ जजों की संविधान पीठ ने इस साल लगातार तीन दिनों तक दलीलें सुनने के बाद 19 मार्च को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
केंद्र ने कहा था, टेस्ट सही लेकिन उसका इस्तेमाल बहुत व्यापक हुआ
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा था कि ट्रिपल टेस्ट और ‘डॉमिनेंट नेचर टेस्ट’ अपने आप में सही हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल इतना व्यापक हो गया कि कई गतिविधियों को बिना पर्याप्त अंतर किए ‘इंडस्ट्री’ के दायरे में शामिल कर लिया गया।
उन्होंने दलील दी थी कि सरकारी और कल्याणकारी कार्यों, खासकर संप्रभु कार्यों से जुड़ी गतिविधियों के लिए अलग और अधिक स्पष्ट दृष्टिकोण की जरूरत है।
सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने 1978 के फैसले पर दोबारा विचार करने का विरोध किया था। उनका कहना था कि दशकों से श्रम कानून की व्यवस्था को दिशा देने वाले फैसले को फिर से खोलने के लिए कोई पर्याप्त आधार नहीं बनाया गया है।
उन्होंने कहा था कि इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट कर्मचारियों के हित में बनाया गया कानून है, जो उन्हें सामान्य सिविल कार्यवाही में उपलब्ध न होने वाले कई उपाय देता है। इनमें नौकरी पर बहाली और सजा की आनुपातिकता की जांच जैसे अधिकार शामिल हैं।
जयसिंह ने ‘कमर्शियल मोटिव’ को अनिवार्य शर्त बनाने का भी विरोध किया और संप्रभु कार्यों की सीमित व्याख्या की वकालत की। उन्होंने कहा कि कई सेवाएं जिन्हें कभी केवल सरकार का काम माना जाता था, आज निजी संस्थाएं भी उपलब्ध करा रही हैं।

