जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के एक जवान की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने दाढ़ी रखने की अनुमति रद्द होने के बाद दबाव में आकर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) लेने का आरोप लगाया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला उसके प्रादेशिक अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को उचित अधिकार क्षेत्र वाली अदालत में जाने की पूरी छूट दी है।
जस्टिस रजनेश ओसवाल की पीठ ने 30 सितंबर को याचिकाकर्ता खुर्शीद अहमद खान की अर्जी पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। खान ने अपने वीआरएस को मंजूर करने और 16 जून 2023 से सेवा से मुक्त करने के आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की—अदालत ने यह तय नहीं किया कि दाढ़ी रखने की अनुमति रद्द करना कानूनी रूप से सही था या नहीं, अथवा जवान पर वीआरएस के लिए दबाव बनाया गया था या नहीं। अदालत ने सिर्फ क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र की तकनीकी आपत्ति को आधार बनाते हुए याचिका को खारिज किया।
क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र पर हाईकोर्ट का रुख
सुनवाई के दौरान बीएसएफ ने प्रारंभिक आपत्ति दर्ज कराते हुए दलील दी कि खान मेघालय के तुरा स्थित प्रहरिनगर में 50वीं बटालियन में तैनात थे। उन्होंने अपना वीआरएस आवेदन भी वहीं जमा किया था और बटालियन कमांडेंट ने उन्हें सेवामुक्त करने का आदेश भी वहीं से जारी किया था। ऐसे में घटना या विवाद का कोई भी हिस्सा जम्मू-कश्मीर में घटित नहीं हुआ।
इसके विपरीत, याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि याचिका में आईजी (बीएसएफ) कश्मीर को एक पक्ष बनाया गया है और बल के महानिदेशक का मुख्यालय नई दिल्ली में है, इसलिए श्रीनगर पीठ को इस पर सुनवाई का अधिकार है। हाईकोर्ट ने इस दलील को सिरे से नकार दिया। पीठ ने कहा कि कश्मीर स्थित अधिकारी का इस मामले से कोई वास्ता नहीं है और इस मामले में वास्तविक निगरानी प्राधिकारी आईजी (बीएसएफ) शिलांग हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत केवल इसलिए किसी भी हाईकोर्ट में मामला दायर नहीं किया जा सकता क्योंकि बल के महानिदेशक का कार्यालय नई दिल्ली में है। पुराने अदालती फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि अधिकार क्षेत्र तय करने के लिए विवाद से जुड़ा कोई अहम और अनिवार्य हिस्सा संबंधित राज्य की भौगोलिक सीमा में होना चाहिए, जो कि जम्मू-कश्मीर के मामले में नहीं बनता।
दाढ़ी को लेकर शुरू हुआ विवाद
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत 6 जनवरी 2018 को हुई थी, जब बीएसएफ ने खान को औपचारिक रूप से ठीक से छंटी हुई (ट्रिम) दाढ़ी रखने की अनुमति दी थी। बल के अनुसार, यह छूट इसी शर्त पर दी गई थी कि दाढ़ी हमेशा साफ-सुथरी और सलीके से ट्रिम रहेगी।
बीएसएफ का कहना है कि 16 जून 2023 को खान अस्त-व्यस्त कपड़ों में पाए गए और उनकी दाढ़ी लंबी तथा अनगढ़ थी। अधिकारियों के मुताबिक जब उन्होंने दाढ़ी को ट्रिम करने के निर्देश का पालन करने से मना कर दिया, तो बल ने उनकी दाढ़ी रखने की पूर्व अनुमति रद्द कर दी।
दूसरी ओर, खान का कहना है कि अनुमति अचानक छीने जाने से वे आहत हुए और इसी वजह से उन्होंने उसी दिन (16 जून 2023) वीआरएस का आवेदन दिया, जिसे उसी दिन तत्काल प्रभाव से स्वीकार भी कर लिया गया।
स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति पर परस्पर विरोधी दावे
सेवानिवृत्ति की परिस्थितियों को लेकर जवान और बल की ओर से अलग-अलग बयान दर्ज कराए गए हैं। खान का आरोप है कि बदले की नीयत से उनकी अनुमति रद्द की गई और उन पर दबाव डालकर वीआरएस कराया गया। उन्होंने 17 जून 2023 को अपना सेवानिवृत्ति आवेदन वापस लेने की अर्जी दी, जिसे ठुकरा दिया गया। इसके बाद 5 जुलाई 2023 के एक आदेश के जरिए उन्हें पेंशन लेने और ड्यूटी पर वापस न लौटने का निर्देश दिया गया। खान ने 19 जुलाई 2024 को महानिदेशक को भी एक अभ्यावेदन भेजा, जिस पर याचिका के अनुसार कोई सुनवाई नहीं हुई।
वहीं, बीएसएफ ने इन आरोपों का खंडन किया है। बल के अनुसार, खान ने एक परेड के बाद खुद अधिकारियों के समक्ष उपस्थित होकर वीआरएस लेने की इच्छा जताई थी। बटालियन कमांडेंट ने अन्य अधिकारियों की मौजूदगी में उनसे पूछताछ की और विशेष रूप से पूछा कि क्या उन पर किसी भी प्रकार का दबाव या जबरदस्ती है। बीएसएफ के अनुसार, खान ने किसी भी तरह के दबाव से साफ मना किया था और इस बात को आधिकारिक रजिस्टर में दर्ज किया गया था।
बल ने यह भी बताया कि खान ने अपनी माताजी की अस्वस्थता और अपनी चिकित्सीय स्थिति के कारण कठिन परिस्थितियों में काम करने में असमर्थता को सेवानिवृत्ति का आधार बताया था। सक्षम प्राधिकारी ने उनके सेवा रिकॉर्ड, हालिया आचरण और परिस्थितियों का आंकलन करने के बाद ही उनके आवेदन को तत्काल प्रभाव से स्वीकार किया था।

