जमानत में समानता कोई ‘मैकेनिकल गणितीय फार्मूला’ नहीं; आरोपी की विशिष्ट भूमिका की जांच जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सह-आरोपी को जमानत मिलने मात्र से दूसरे आरोपी को समानता (पैरिटी) के आधार पर स्वतः जमानत का अधिकार नहीं मिल जाता। गोवा के एक बहुचर्चित हत्या के मामले में मुख्य आरोपी राजेंद्र प्रसाद की दूसरी जमानत याचिका खारिज करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि समानता का सिद्धांत कोई यांत्रिक या गणितीय फार्मूला नहीं है, बल्कि इसका मूल्यांकन मामले के तथ्यों और प्रत्येक आरोपी की विशिष्ट भूमिका के आधार पर होना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला गोवा के ओल्ड गोवा पुलिस स्टेशन में 28 अगस्त, 2023 को दर्ज प्राथमिकी संख्या 90/2023 से जुड़ा है, जो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) और 201 (साक्ष्य मिटाना) के तहत दर्ज की गई थी। मामले में याचिकाकर्ता राजेंद्र प्रसाद को 29 अगस्त, 2023 को गिरफ्तार किया गया था और 23 नवंबर, 2023 को दाखिल चार्जशीट में उसे आरोपी नंबर 1 बनाया गया। फिलहाल वह मडगांव/तिसवाड़ी (मरसेस, तिसवाड़ी, उत्तर गोवा) स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय में धारा 342, 302, 201 और 120-बी के तहत मुकदमे (सेशंस केस नंबर 11/2023) का सामना कर रहा है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित उनके पैतृक गांव में परिवार और संपत्ति को लेकर चल रहे पुराने विवाद के कारण याचिकाकर्ता और सह-आरोपियों ने चंद्रिका उर्फ गब्बर साहनी की हत्या की साजिश रची। आरोप है कि 23 अगस्त, 2023 को याचिकाकर्ता ने पेंटिंग का काम देने के बहाने पीड़ित को पोरवोरिम (गोवा) स्थित अपने किराए के मकान में बुलाया। वहां याचिकाकर्ता और रणजीत प्रसाद (आरोपी नंबर 2) ने उसे एक कमरे में बंधक बनाकर लकड़ी के डंडे से बुरी तरह पीटा। इसके बाद अखिलेश कुमार साहनी (आरोपी नंबर 3) और राजकुमार प्रसाद (आरोपी नंबर 4) के साथ मिलकर अचेत पीड़ित को नारंगी रंग की नायलॉन की रस्सी और लोहे के हुक से एक भारी पत्थर से बांध दिया, शव को मारुति स्विफ्ट कार में ले जाकर गौंडालीम नदी में फेंक दिया।

याचिकाकर्ता ने बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ के 8 अप्रैल, 2026 के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके तहत उसकी दूसरी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता समानता के आधार पर जमानत का हकदार है, क्योंकि चार्जशीट और काउंटर-एफिडेविट में सभी चारों आरोपियों को एक जैसी भूमिका दी गई है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि हाईकोर्ट आरोपी नंबर 3 और आरोपी नंबर 4 को क्रमशः 2 सितंबर, 2024 और 8 अप्रैल, 2026 के आदेशों द्वारा पहले ही जमानत दे चुका है। इसके अलावा, उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया सामग्री नहीं है, अभियोजन की कहानी में अंतर्विरोध हैं और याचिकाकर्ता बिना किसी महत्वपूर्ण प्रगति के लगभग तीन साल से जेल में बंद है।

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जमानत याचिका का विरोध करते हुए गोवा राज्य की ओर से अधिवक्ता अभय अंतुरकर ने कहा कि यह मामला एक पूर्व-नियोजित और गंभीर अपराध से जुड़ा है। जांच में एकत्र सामग्री याचिकाकर्ता की सक्रिय भूमिका को उजागर करती है। उन्होंने तर्क दिया कि समानता का आधार याचिकाकर्ता के लिए उपलब्ध नहीं है, क्योंकि उसकी भूमिका जमानत पर रिहा हुए सह-आरोपियों की तुलना में अलग और प्रमुख है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि मुकदमे के दौरान याचिकाकर्ता को रिहा करने से उन संवेदनशील गवाहों को प्रभावित करने का जोखिम है जो उसे जानते हैं।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि मुकदमा चल रहा है और अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तावित 62 गवाहों में से केवल एक गवाह का बयान दर्ज किया गया है।

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समानता के तर्क को खारिज करते हुए पीठ ने जोर दिया कि प्रत्येक आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाना चाहिए। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“यह सर्वविदित है कि एक आरोपी को जमानत मिलना, स्वतः ही दूसरे आरोपी को जमानत देने का आधार नहीं बनता। समानता (पैरिटी) कोई यांत्रिक या गणितीय फार्मूला नहीं है; इसका मूल्यांकन मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर प्रत्येक आरोपी को सौंपी गई विशिष्ट भूमिका के अनुसार किया जाना चाहिए।”

‘रमेश भवन राठौड़ बनाम विशनभाई हीराभाई मकवाना’, ‘सागर बनाम यूपी राज्य’ और ‘रेखा सेंगर बनाम एमपी राज्य’ के निर्णयों का हवाला देते हुए कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता समानता के आधार पर जमानत का दावा नहीं कर सकता। प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से पता चलता है कि याचिकाकर्ता हत्या की योजना का मुख्य सूत्रधार (प्रिंसिपल आर्किटेक्ट) था, जबकि जमानत पर रिहा किए गए सह-आरोपियों ने केवल मददगार की भूमिका निभाई थी।

लंबे समय तक जेल में रहने के तर्क पर कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“केवल इस तथ्य से कि याचिकाकर्ता लगभग तीन वर्षों से हिरासत में है या मुकदमे के जल्द पूरा न होने की संभावना है, उसे जमानत पर रिहा करने का अधिकार नहीं मिल जाता, विशेष रूप से कथित अपराध की गंभीरता और गवाहों को प्रभावित करने व साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना को देखते हुए।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और निर्देश

जमानत याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता के त्वरित सुनवाई (स्पीड ट्रायल) के अधिकार को स्वीकार किया। संवेदनशील कर्मचारियों और सहयोगियों के बयानों की निष्पक्षता बनाए रखने के राज्य के सरोकारों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सत्र अदालत को निर्देश दिया कि वह आठ संवेदनशील गवाहों—PW-25 सोनू साहनी, PW-26 बीजू साहनी, PW-29 अमरनाथ मौर्य, PW-30 श्रीराम थारू, PW-33 संतू सिंह, PW-34 गणेश थारू, PW-36 साहिल शिंदे और PW-38 महाबलेश्वर गौड़ा—के बयान इस आदेश की प्रति मिलने के एक वर्ष के भीतर प्राथमिकता के आधार पर दर्ज करने का प्रयास करे।

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कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि इन आठ गवाहों की गवाही पूरी होने के बाद, या एक साल की अवधि के भीतर गवाही पूरी न होने की स्थिति में, वह नए सिरे से जमानत के लिए उचित फोरम में आवेदन कर सकता है, बशर्ते वह कार्यवाही में सहयोग करे और देरी का कारण उसकी तरफ से न हो।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: राजेंद्र प्रसाद बनाम गोवा राज्य व अन्य
वाद संख्या: स्पेशल लीव याचिका (क्रिमिनल) नंबर 9754/2026
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 18 अगस्त, 2026

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