इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल के रूप में कार्य करने वाले एडवोकेट को रिवर्स चार्ज नहीं, बल्कि फॉरवर्ड चार्ज मैकेनिज्म के तहत जीएसटी का भुगतान करना होगा: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बार काउंसिल में पंजीकृत जो एडवोकेट ‘इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016’ (IBC) के तहत इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल (IP) के रूप में कार्य करते हैं, उन पर गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) के भुगतान के लिए ‘फॉरवर्ड चार्ज मैकेनिज्म’ लागू होगा। जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस शैल जैन की डिविजन बेंच ने माना कि इंसॉल्वेंसी और रिसीवरशिप सेवाएं देने वाले वकीलों को जीएसटी पंजीकरण कराना होगा और उसी तरह जीएसटी-अनुपालन चालान जमा करने होंगे, जैसा कि इस श्रेणी के अन्य इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स के लिए अनिवार्य है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय केवल इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल की क्षमता में दी गई सेवाओं पर लागू होता है और वकीलों द्वारा उनकी कानूनी क्षमता में दी जाने वाली विधिक सेवाओं पर लागू ‘रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म’ में कोई बदलाव नहीं करता है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता कंवल चौधरी 1995 से दिल्ली बार काउंसिल में नामांकित एक वकील हैं। उन्होंने लिमिटेड इंसॉल्वेंसी परीक्षा उत्तीर्ण की और 27 जुलाई 2017 को इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल के रूप में पंजीकृत हुए। 13 दिसंबर 2018 को, नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) दिल्ली बेंच ने वर्कस्पेस कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर आवेदन को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को कॉर्पोरेट दिनदार, इरियो फाईवरिवर प्राइवेट लिमिटेड के लिए अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) नियुक्त किया।

अपने कार्यकाल के दौरान, याचिकाकर्ता ने अपनी व्यावसायिक फीस के लिए 13 अगस्त 2019 और 31 अक्टूबर 2019 की तारीखों में चालान जारी किए। 17 सितंबर 2019 को के.वी. जैन को नए समाधान पेशेवर (RP) के रूप में नियुक्त किया गया और उन्होंने कार्यभार संभाल लिया। फीस का भुगतान न होने पर याचिकाकर्ता ने बकाया राशि के भुगतान का निर्देश मांगने के लिए NCLT के समक्ष आवेदन दायर किए।

1 सितंबर 2020 को NCLT ने के.वी. जैन को इन चालानों की जांच करने का निर्देश दिया। इसके बाद के.वी. जैन ने याचिकाकर्ता से जीएसटी-अनुपालन चालान जारी करने का अनुरोध किया। जवाब में याचिकाकर्ता ने कहा कि वह न तो जीएसटी के तहत पंजीकृत हैं और न ही उन्हें पंजीकरण की आवश्यकता है, क्योंकि उन्हें केंद्रीय माल और सेवा कर अधिनियम, 2017 (CGST एक्ट) की धारा 9(3) और 9(4) के साथ पढ़ी जाने वाली अधिसूचना संख्या 12/2017 और 13/2017 के तहत छूट प्राप्त है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि जीएसटी देय है, तो कॉर्पोरेट देनदार द्वारा रिवर्स चार्ज के आधार पर इसका भुगतान किया जाना चाहिए।

7 अक्टूबर 2020 को NCLT ने याचिकाकर्ता को 49,04,988 रुपये की शेष फीस का भुगतान करने का निर्देश दिया और जीएसटी भुगतान की देनदारी का मुद्दा स्पष्टीकरण के लिए ‘इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया’ (IBBI) को भेज दिया। 9 मार्च 2021 को IBBI ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि ‘इंसॉल्वेंसी और रिसीवरशिप’ सेवाएं रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म के अंतर्गत नहीं आती हैं और याचिकाकर्ता को जीएसटी-अनुपालन चालान जमा करने का निर्देश दिया। इस स्पष्टीकरण से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने IBBI के आदेश को रद्द करने की मांग करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।

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पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि IBBI के पास इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल के रूप में कार्य करने वाले वकीलों पर फॉरवर्ड चार्ज मैकेनिज्म की प्रयोज्यता निर्धारित करने का अधिकार क्षेत्र नहीं है। यह प्रस्तुत किया गया कि वकील अधिसूचना संख्या 12/2017 और 13/2017 के तहत रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म द्वारा शासित होते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा जे.के. मित्तल एंड कंपनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य में दिए गए अंतरिम आदेशों का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि कानूनी सेवाओं में कानून की किसी भी शाखा में सलाह, परामर्श या सहायता शामिल है, जिसमें इंसॉल्वेंसी कानून भी शामिल है। यह भी तर्क दिया गया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के तहत वकील केवल विधिक सेवाएं ही दे सकते हैं, और इंसॉल्वेंसी सेवाओं को गैर-कानूनी सेवा मानने से किसी वकील का नामांकन निलंबित करने की नौबत आ सकती है।

जीएसटी विभाग का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील ने तर्क दिया कि जीएसटी व्यवस्था के तहत कर योग्यता सेवा की प्रकृति से निर्धारित होती है, न कि उसे प्रदान करने वाले व्यक्ति की व्यावसायिक पहचान से। यह सबमिट किया गया कि एक इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल द्वारा निष्पादित कार्य—जैसे कॉर्पोरेट देनदार के मामलों का प्रबंधन करना, लेनदारों के दावों को आमंत्रित करना और लेनदारों की समिति की बैठकें आयोजित करना—प्रशासनिक और प्रबंधकीय होते हैं, न कि पारंपरिक कानूनी वकालत। विभाग ने तर्क दिया कि सेवाओं के वर्गीकरण की योजना के तहत ‘इंसॉल्वेंसी और रिसीवरशिप सेवाओं’ (कोड 998241) की विशिष्ट प्रविष्टि ‘विधिक सेवाओं’ (कोड 99821) की सामान्य प्रविष्टि पर भारी पड़ती है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के कमिश्नर ऑफ कमर्शियल टैक्स बनाम ए.आर. थर्मोसेट्स (पी) लिमिटेड और मूरको (इंडिया) लिमिटेड बनाम कलेक्टर ऑफ कस्टम्स, मद्रास के निर्णयों पर भरोसा जताया गया।

IBBI के वकील ने आंकड़े प्रस्तुत करते हुए बताया कि 30 जून 2025 तक कुल 4,558 पंजीकृत इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स में से केवल 283 (6% से भी कम) वकील थे। यह तर्क दिया गया कि आईपी सेवाएं केवल वकीलों तक सीमित नहीं हैं और इसके लिए लिमिटेड इंसॉल्वेंसी परीक्षा पास करना आवश्यक होता है। सुप्रीम कोर्ट के स्विस रिबन्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया गया कि IBC की धारा 17, 18, 20, 22, 23 और 25 के तहत समाधान पेशेवरों के कर्तव्य प्रबंधकीय, प्रशासनिक और अर्ध-न्यायिक प्रकृति के होते हैं।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने 6 सितंबर 2025 के अपने हलफनामे में कहा कि जब कोई वकील इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल के रूप में कार्य करता है, तो प्रदान की जाने वाली सेवाओं की प्रकृति पारंपरिक कानूनी सेवाओं से काफी भिन्न होती है और यह फॉरवर्ड चार्ज मैकेनिज्म के तहत कर योग्य है।

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कोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने तीन मुख्य पहलुओं का विश्लेषण किया: वकीलों पर लागू जीएसटी मैकेनिज्म, इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स पर लागू मैकेनिज्म, और इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल के रूप में कार्य करने वाले वकीलों पर लागू मैकेनिज्म।

कोर्ट ने पाया कि 25 सितंबर 2017 के शुद्धिपत्र द्वारा संशोधित अधिसूचना संख्या 13/2017-सेंट्रल टैक्स (रेट) के तहत व्यक्तिगत वकीलों या लॉ फर्मों द्वारा प्रदान की जाने वाली कानूनी सेवाएं रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म के अधीन हैं। हालांकि, इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स के लिए, उनकी सेवाएं अधिसूचना संख्या 13/2017 के तहत निर्दिष्ट श्रेणियों में सूचीबद्ध नहीं हैं, जिसका अर्थ है कि CGST एक्ट की धारा 9(1) के तहत डिफ़ॉल्ट नियम यानी ‘फॉरवर्ड चार्ज मैकेनिज्म’ लागू होता है।

इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल के रूप में कार्य करने वाले वकीलों की जांच करते समय, कोर्ट ने माना कि निर्णायक कारक निभाई गई भूमिका और सेवा की प्रकृति है, न कि अंतर्निहित व्यावसायिक योग्यता। बेंच ने रेखांकित किया कि IBBI विनियमों के विनियमन 5(c) के तहत, इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल बनने की पात्रता चार्टर्ड अकाउंटेंट, कंपनी सेक्रेटरी, कॉस्ट अकाउंटेंट, मैनेजर और वकील सहित कई श्रेणियों के लिए खुली है। कुल समूह में वकील केवल एक छोटा हिस्सा हैं।

कोर्ट ने हेडिंग 982 (‘लीगल एंड अकाउंटिंग सर्विसेज’) के तहत सेवाओं के वर्गीकरण की जीएसटी योजना का परीक्षण किया और नोट किया कि ‘लीगल सर्विसेज’ (कोड 99821) और ‘इंसॉल्वेंसी एंड रिसीवरशिप सर्विसेज’ (कोड 998241) को अलग-अलग, समकक्ष उप-शीर्षों के तहत वर्गीकृत किया गया है। योजना की प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से कहा गया है: “…जहां कोई सेवा उसके विवरण के आधार पर किसी भी उद्देश्य के लिए भिन्न उपचार के योग्य है, वहां अधिक सामान्य विवरण के बजाय सबसे विशिष्ट विवरण को प्राथमिकता दी जाएगी।”

बेंच ने इस सुस्थापित सिद्धांत को दोहराया कि एक विशिष्ट प्रविष्टि सामान्य प्रविष्टि पर हावी होती है। सुप्रीम कोर्ट के मूरको (इंडिया) लिमिटेड बनाम कलेक्टर ऑफ कस्टम्स के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा: “…वर्गीकरण के विशिष्ट शीर्षक को सामान्य शीर्षक से अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस खंड में ऐसी वस्तुओं की परिकल्पना की गई है जो एक से अधिक विवरणों को संतुष्ट कर सकती हैं। या यह विशिष्ट और सामान्य विवरण को संतुष्ट कर सकती है। किसी भी स्थिति में, वह वर्गीकरण जो सबसे अधिक विशिष्ट है, उसे उस वर्गीकरण की तुलना में प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो विशिष्ट नहीं है या प्रकृति में सामान्य है। दूसरे शब्दों में, दो प्रतिस्पर्धी प्रविष्टियों में से जो विवरण के सबसे निकट हो उसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए।”

कोर्ट ने अपने हलफनामे में BCI के रुख पर भी ध्यान केंद्रित किया, जिसमें कहा गया था: “…जब किसी वकील को इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 (“IBC”) के तहत इंसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (“IRP”) या रेजोल्यूशन प्रोफेशनल के रूप में नियुक्त किया जाता है, तो दी जाने वाली सेवाओं की प्रकृति पारंपरिक कानूनी प्रैक्टिस/सेवाओं से काफी भिन्न होती है।”

वकील के नियमों से संबंधित याचिकाकर्ता की आशंका को संबोधित करते हुए, बेंच ने कहा कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 और IBC को सामंजस्यपूर्ण रूप से पढ़ा जाना चाहिए। चूंकि IBBI नियमों का विनियमन 5(c)(iv)(d) स्पष्ट रूप से नामांकित वकीलों को पंजीकरण के लिए पात्र मानता है, इसलिए एक अलग वैधानिक ढांचे के तहत ऐसी विशेष भूमिकाएं निभाना एडवोकेट्स एक्ट से भटकना नहीं है और न ही यह किसी वकील के नामांकन को खतरे में डालता है।

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि 9 मार्च 2021 की IBBI की सूचना कानून की सही स्थिति को दर्शाती है और इसे दी गई चुनौती को खारिज कर दिया।

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कोर्ट ने निम्नलिखित मुख्य निष्कर्ष और निर्देश जारी किए:

  1. बार काउंसिल में पंजीकृत वकील जो IBC के तहत इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल्स के रूप में कार्य करते हैं, वे ‘फॉरवर्ड चार्ज मैकेनिज्म’ से शासित होंगे। उन्हें जीएसटी पंजीकरण प्राप्त करना होगा और CGST एक्ट, 2017 के तहत सभी अनुवर्ती आवश्यकताओं का अनुपालन करना होगा।
  2. यह निर्देश केवल इंसॉल्वेंसी प्रोफेशनल की क्षमता में दी गई सेवाओं पर लागू होता है और वकीलों द्वारा अपनी वकील की क्षमता में प्रदान की जाने वाली कानूनी सेवाओं पर लागू रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म को प्रभावित या परिवर्तित नहीं करता है।
  3. याचिकाकर्ता को CP(IB) No. 408/2018 में अंतरिम समाधान पेशेवर के रूप में अपनी सेवाओं के लिए ली जाने वाली व्यावसायिक फीस के लिए जीएसटी-अनुपालन चालान प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: कंवल चौधरी बनाम इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया व अन्य

वाद संख्या: डब्ल्यू.पी.(सी) 9410/2021

पीठ: जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह, जस्टिस शैल जैन

निर्णय की तिथि: 13 अगस्त 2026

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