राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने लुधियाना स्थित सतगुरु प्रताप सिंह अपोलो अस्पताल और उसके दो डॉक्टरों को एक महिला मरीज के इलाज में देरी और निगरानी में लापरवाही का दोषी पाया है। आयोग ने अस्पताल और डॉक्टरों को पीड़ित महिला को 15 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। महिला को रीढ़ की हड्डी के ऑपरेशन के बाद समय पर उचित इलाज न मिलने के कारण लकवे (पैराप्लेजिया) का सामना करना पड़ा था।
एनसीडीआरसी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति ए. पी. साही और सदस्य भारत कुमार पंड्या की पीठ ने 4 अगस्त को यह फैसला दीपक बंसल और उनकी पत्नी किरण बाला की शिकायत पर सुनाया। आयोग ने माना कि 36 वर्षीय मरीज में सर्जरी के बाद पैर सुन्न होने और तेज दर्द जैसे गंभीर लक्षण दिखने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टरों ने त्वरित जांच और निगरानी में ढिलाई बरती।
मुआवजे की रकम और भुगतान की शर्तें
पीठ ने 15 लाख रुपये के कुल मुआवजे में से 90 प्रतिशत राशि अस्पताल को और 5-5 प्रतिशत राशि डॉ. एम. दीपेंद्र सिंह तथा डॉ. गौरव कुथिआला को देने का आदेश दिया है। इस राशि पर शिकायत दर्ज कराने की तारीख से 6 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज भी देय होगा।
इसके अलावा, आयोग ने अस्पताल को 25,000 रुपये कानूनी खर्च के रूप में भुगतान करने का निर्देश दिया है। सभी भुगतानों को पूरा करने के लिए 4 अक्टूबर तक का समय तय किया गया है। यदि निर्धारित समयसीमा तक भुगतान नहीं किया जाता, तो 4 अक्टूबर के बाद बकाया राशि पर 9 penalty प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज लागू होगा।
हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने 2 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की थी, जिसे पीठ ने अत्यधिक बताते हुए खारिज कर दिया। आयोग का कहना था कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य इतने बड़े मुआवजे और मरीज को हुए वित्तीय या मानसिक नुकसान के बीच सीधा संबंध स्थापित नहीं करते।
आयोग का निष्कर्ष और लापरवाही की वजह
अपने फैसले में आयोग ने यह स्पष्ट किया कि शुरुआती एंडोस्कोपिक सर्जरी या रीढ़ की हड्डी में ड्रेन (लंबर ड्रेन) लगाने की प्रक्रिया में कोई सर्जिकल लापरवाही नहीं पाई गई है। यह इलाज पूरी तरह से स्थापित चिकित्सा मानकों के अनुसार ही किया गया था।
आयोग ने लापरवाही का आधार इलाज के बाद मरीज की बिगड़ती स्थिति पर अस्पताल की मेडिकल टीम द्वारा दिखाई गई सामूहिक सुस्ती को बनाया। पीठ ने टिप्पणी की कि रात के समय मरीज की निगरानी के लिए जरूरी तैयारियां नहीं थीं, महत्वपूर्ण एमआरआई जांच कराने में देरी की गई और डॉक्टरों के नोट्स में पारदर्शिता और स्पष्टता का अभाव था। आयोग ने रेखांकित किया कि जब अस्पताल चेतावनी भरे लक्षणों की तुरंत जांच करने, विशेषज्ञ की सलाह लेने या बिगड़ते मरीज की लगातार निगरानी करने में विफल रहते हैं, तो उन्हें सेवाओं में कमी के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
मरीज के इलाज का घटनाक्रम
मामले की शुरुआत 17 सितंबर 2011 को हुई थी, जब किरण बाला को नाक से द्रव (सीएसएफ राइनोरिया) रिसाव की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। एंडोस्कोपिक मरम्मत के बाद जब रिसाव दोबारा शुरू हुआ, तो डॉक्टरों ने इलाज में मदद के लिए लंबर ड्रेन लगाया।
23 सितंबर की शाम 5:30 बजे रिकवरी नोट में मरीज के दोनों पैरों में लगातार दर्द की बात दर्ज की गई और डॉ. गौरव की ओर से डॉ. दीपेंद्र को सूचित करने का निर्देश दिया गया। अस्पताल प्रशासन का दावा था कि डॉ. दीपेंद्र ने रात करीब 9:00 बजे मरीज की जांच की थी, लेकिन आयोग ने पाया कि आधिकारिक मेडिकल रिकॉर्ड में ऐसी किसी यात्रा, सलाह या जांच का कोई उल्लेख नहीं था।
अगली सुबह 24 सितंबर को मरीज के पैरों की कार्यक्षमता (मोटर पावर) घटकर 5 में से केवल 1 रह गई। सुबह 10:00 बजे एमआरआई का आदेश दिया गया, जिसे दोपहर 1:00 बजे किया गया और शाम 4:30 बजे मिली रिपोर्ट में स्पाइनल थोरासिक कॉर्ड मायलाइटिस की पुष्टि हुई। इसके बाद मरीज की स्थिति और बिगड़ गई और वह पूरी तरह लकवाग्रस्त हो गई, जिससे उनका मूत्राशय और आंतों पर नियंत्रण भी समाप्त हो गया।
तीसरे डॉक्टर को मिली राहत
आयोग ने मामले में नामजद तीसरे डॉक्टर, डॉ. सिद्धार्थ गर्ग को सभी आरोपों से बरी कर दिया। पीठ ने पाया कि जब विशेषज्ञ सलाह के लिए डॉ. गर्ग से संपर्क किया गया, तो उन्होंने तुरंत, उचित और प्रभावी ढंग से अपनी सेवाएं प्रदान की थीं।

