झारखंड हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें एक मुस्लिम महिला को अपने पति के पास वापस लौटने और वैवाहिक जीवन बहाल करने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी अपने पति या ससुराल वालों पर गंभीर प्रताड़ना और शारीरिक हमले के आरोप लगाती है, तो उसे जबरन वैवाहिक घर लौटने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
दांपत्य अधिकारों की बहाली केवल पति के अधिकार पर निर्भर नहीं
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की पीठ ने 7 अगस्त को यह फैसला सुनाया। पीठ ने टिप्पणी की कि दांपत्य अधिकारों की बहाली (रेस्टीट्यूशन ऑफ कंज्यूगल राइट्स) से जुड़ा मामला पूरी तरह से पति के अधिकार पर ही निर्भर नहीं करता। अदालतों को यह देखना अनिवार्य है कि क्या वर्तमान परिस्थितियों में महिला को पति के पास वापस भेजना न्यायसंगत, तर्कसंगत और सुरक्षित है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पति का आचरण ऐसा रहा है जिससे पत्नी को अकारण प्रताड़ित होना पड़ा हो या उसके साथ रहना असुरक्षित हो गया हो, तो अदालतें दांपत्य अधिकारों की बहाली की याचिका खारिज कर सकती हैं। अदालत ने यह भी कहा कि भले ही साक्ष्यों के सख्त नियमों के तहत क्रूरता पूरी तरह साबित न हो पाए, फिर भी अगर परिस्थितियां ऐसी हैं जहां महिला का लौटना अन्यायपूर्ण होगा, तो राहत देने से इनकार किया जा सकता है।
फैमिली कोर्ट्स को विवाद की जड़ तक पहुंचने की जरूरत
अदालत ने रेखांकित किया कि वैवाहिक विवादों में फैमिली कोर्ट का यह कर्तव्य बनता है कि वह केवल सबूतों की तकनीकी बारीकियों में उलझने के बजाय दोनों पक्षों के बीच विवाद की मुख्य वजह को समझने की कोशिश करे।
यह पूरा मामला 27 मई 2013 को मुस्लिम रीति-रिवाज से हुई शादी से जुड़ा है। पति का दावा था कि शादी के लगभग दो साल बाद पत्नी रानी ने उसके माता-पिता से अलग रहने की मांग की, जिससे विवाद शुरू हुआ। इसके बाद दोनों करीब दो साल तक बेंगलुरु में रहे और फिर वापस अपने घर आ गए। पति के अनुसार, पत्नी 2022 में अपना ससुराल छोड़कर चली गई। स्थानीय पंचायत, समाज के बुजुर्गों और परिजनों द्वारा सुलह की कोशिशें नाकाम होने पर पति ने फैमिली कोर्ट में दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दायर की थी।
पत्नी के प्रताड़ना के आरोप और आपराधिक मामला
दूसरी ओर, पत्नी ने पति और उसके परिजनों पर गंभीर शारीरिक हमले, मारपीट और जानलेवा प्रताड़ना के आरोप लगाए। महिला की ओर से पेश वकील प्रभात कुमार सिन्हा और मयंक मृदुल ने अदालत को बताया कि गंभीर मारपीट के बाद महिला ने किसी तरह अपनी जान बचाकर अपनी बहन के घर शरण ली और पुलिस थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई। इसके आधार पर पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया गया था।
महिला का यह भी कहना था कि उसके पास अलग रहने का वैध कारण है। उसने दावा किया कि उसके पति ने उसे सार्वजनिक रूप से तलाक दे दिया था, जिसके बाद उसने नवंबर 2023 में काजी-ए-शहर के जरिए औपचारिक रूप से ‘खुला’ प्राप्त कर लिया था।
फैमिली कोर्ट ने पहले पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए महिला को ससुराल लौटने का आदेश दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस आदेश को खारिज करते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट साक्ष्यों का सही मूल्यांकन करने में विफल रहा और उसने तर्कसंगतता की जांच किए बिना ही आदेश पारित कर दिया था।

