दिल्ली हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है जिसमें एक व्यक्ति को अपनी अलग रह रही पत्नी और नाबालिग बेटे के लिए तय मासिक गुजारा भत्ते में हर साल 5 प्रतिशत की स्वतः बढ़ोतरी करने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि समय के साथ बढ़ने वाली महंगाई और जीवन यापन की लागत को देखते हुए भत्ते में यह नियमित वृद्धि आवश्यक है ताकि दी जाने वाली राशि की वास्तविक क्रय शक्ति बनी रहे।
जस्टिस मधु जैन की पीठ ने कड़कड़डूमा फैमिली कोर्ट के 13 फरवरी 2020 के फैसले के खिलाफ पति द्वारा दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया। फैमिली कोर्ट ने पति को जनवरी 2020 से अपनी पत्नी को 15,000 रुपये और बेटे को 10,000 रुपये यानी कुल 25,000 रुपये प्रतिमाह देने तथा इस राशि में प्रतिवर्ष 5 प्रतिशत का इजाफा करने का आदेश दिया था।
महंगाई और गुजारा भत्ते पर कोर्ट की टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जैन ने कहा कि समय बीतने के साथ महंगाई बढ़ती है, जिससे तय गुजारा भत्ते का वास्तविक मूल्य धीरे-धीरे घटने लगता है। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दिए जाने वाले भत्ते का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पत्नी और बच्चा गरिमापूर्ण जीवन जी सकें और उनका रहन-सहन उस स्तर का बना रहे जो शादी के दौरान था। ऐसे में 5 फीसदी की वार्षिक वृद्धि किसी भी तरह से गैर-कानूनी या अनुचित नहीं है।
अदालत ने पति की इस दलील को भी नकार दिया कि भविष्य में भत्ते में किसी भी बढ़ोतरी के लिए धारा 127 के तहत परिस्थितियों में बदलाव साबित करना अनिवार्य होता है। हाईकोर्ट ने कहा कि 5 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि का आदेश किसी अधिकार क्षेत्र के उल्लंघन या कानूनी त्रुटि से ग्रस्त नहीं है।
आय से जुड़े दावों को अदालत ने माना अमान्य
पुनर्विचार याचिका में पति ने दावा किया था कि फैमिली कोर्ट ने उसकी आय और वित्तीय क्षमता का गलत आकलन किया है। उसने तर्क दिया कि भारत में काम करते हुए उसकी मासिक आय महज 11,000 रुपये है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दावे को पूरी तरह से अविश्वसनीय करार दिया। अदालत ने ध्यान दिलाया कि व्यक्ति के पास स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग नेपियर विश्वविद्यालय से हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट की डिग्री है और उसने जिरह के दौरान खुद स्वीकार किया था कि उसकी नौकरी उसकी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप ही है।
इसके अलावा, अदालत ने पाया कि पत्नी की आर्थिक निर्भरता, बच्चे के पालन-पोषण व शिक्षा के खर्च और पति के पारिवारिक स्तर से जुड़े बयानों पर पति की ओर से कोई जिरह नहीं की गई, जबकि उसे इसके कई अवसर दिए गए थे। इसके कारण पत्नी की गवाही पूरी तरह से अनकटी रही।
मामले की पृष्ठभूमि और बकाया रकम
इस वैवाहिक विवाद की शुरुआत 5 दिसंबर 2012 को हुए विवाह और 19 सितंबर 2013 को बेटे के जन्म के बाद हुई थी। पत्नी का आरोप है कि दहेज मांग और क्रूरता के कारण उसे अपना ससुराल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा, जिसके बाद उसने 17 नवंबर 2014 को क्राइम अगेंस्ट वूमेन सेल में शिकायत दर्ज कराई और तब से वह अपने माता-पिता के साथ रह रही है। वहीं, पति का कहना था कि दोनों नवंबर 2013 से अलग रह रहे हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान 20 अगस्त 2025 को हुई मध्यस्थता की कोशिश भी विफल रही थी। फैमिली कोर्ट में सुनवाई के दौरान पति ने दावा किया था कि उसके पास कोई अचल संपत्ति नहीं है, वह किराये के मकान में रहता है और उसके पिता की संपत्तियों को उसकी आय मान लिया गया है। उसने यह भी तर्क दिया था कि उसके बेटे का स्कूल में दाखिला आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) श्रेणी में हुआ है, जो उसकी सीमित आय को दर्शाता है।
दूसरी ओर, पत्नी के वकील ने हाईकोर्ट को बताया कि वित्तीय वर्ष 2023-24 और 2024-25 के दौरान बकाया लगभग 7 लाख रुपये की वसूली की कार्रवाई फैमिली कोर्ट में लंबित है। हाईकोर्ट ने कहा कि पुनर्विचार याचिका के सीमित अधिकार क्षेत्र में साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि निचली अदालत के फैसले में कोई गंभीर कानूनी खामी न हो। इस आधार पर अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया।

