तय बिक्री राशि का पूरा भुगतान न होना रजिस्टर्ड सेल डीड को अमान्य नहीं बनाता; विक्रेता के पास केवल बकाया राशि वसूली का कानूनी विकल्प: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 54 के तहत तय बिक्री राशि (सेल कंसीडरेशन) का भुगतान न होना या केवल आंशिक भुगतान होना किसी रजिस्टर्ड सेल डीड (बिक्रीनामा) को अमान्य या अप्रभावी नहीं बनाता। अदालत ने निर्णय दिया कि ऐसी स्थिति में विक्रेता सेल डीड को रद्द करने की मांग नहीं कर सकता। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि सेल डीड के पंजीकरण के साथ ही संपत्ति का मालिकाना हक खरीदार को हस्तांतरित हो जाता है, भले ही केवल आंशिक राशि का ही भुगतान क्यों न किया गया हो। ऐसे में विक्रेता का कानूनी अधिकार केवल बकाया राशि की वसूली के लिए मुकदमा (रिफंड या रिकवरी सूट) दायर करना है, न कि सेल डीड को शून्य घोषित कराना। इसी आधार पर शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के समवर्ती निर्णयों को बहाल कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद एक बेटे और उसकी मां (मूल वादी) द्वारा 10 मार्च 1975 को निष्पादित दो सेल डीड से जुड़ा है। वादियों पर विभिन्न वित्तीय संस्थानों और सरकारी विभागों का भारी कर्ज था। इस स्थिति में मूल प्रतिवादी ने प्रत्येक संपत्ति को 7,000 रुपये के कुल मूल्य पर खरीदने पर सहमति व्यक्त की थी।

सेल डीड के विवरण के अनुसार, निष्पादन के समय प्रत्येक संपत्ति के लिए 2,500 रुपये का भुगतान किया गया था। शेष 4,500-4,500 रुपये प्रतिवादी ने अपने पास रख लिए थे ताकि वह वादियों के सरकारी व अन्य बकाए कर्ज को सीधे चुका सके। हालांकि, प्रतिवादी यह देनदारियां चुकाने में विफल रहा। इसके बाद 1975 और 1976 में दो समझौते किए गए, जिनमें प्रतिवादी ने बकाया राशि देने और सरकारी ऋण चुकता करने की जिम्मेदारी फिर से ली।

वर्ष 1984 में वादियों ने सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर दोनों सेल डीड को शून्य और अप्रभावी घोषित करने, उन्हें रद्द करने, खुद को संपत्ति का पूर्ण मालिक घोषित करने और प्रतिवादी को कब्जे में हस्तक्षेप करने से रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की।

ट्रायल कोर्ट ने मुकदमा खारिज करते हुए माना कि ये समझौते एक संपन्न बिक्री से संबंधित थे और सेल डीड में ऐसी कोई शर्त नहीं थी कि शेष राशि न देने पर बिक्री स्वतः रद्द हो जाएगी। अदालत ने कहा कि प्रतिवादी 4,500-4,500 रुपये की बकाया राशि ब्याज सहित चुकाने के लिए बाध्य है। कब्जे के संबंध में, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 145 के तहत कार्यवाही के दौरान उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) ने कब्जा अपने हाथ में लिया था और बाद में वादियों को लौटा दिया था; ट्रायल कोर्ट ने इस कब्जे में हस्तक्षेप नहीं किया। प्रथम अपीलीय अदालत ने भी ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को सही ठहराया।

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हालांकि, हाईकोर्ट ने दूसरी अपील में निचली अदालतों के फैसलों को पलट दिया। हाईकोर्ट ने सेल डीड को अप्रभावी मानते हुए वादियों को संपत्ति का पूर्ण मालिक घोषित कर दिया। हाईकोर्ट का तर्क था कि प्रतिवादी बकाया राशि के भुगतान या कर्ज चुकता करने का कोई सबूत पेश नहीं कर सका।

पक्षों की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ताओं (मूल प्रतिवादी के कानूनी वारिसों) के वकील ने शीर्ष अदालत के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि पूरी राशि का भुगतान न होना रजिस्टर्ड सेल डीड की वैधता को खत्म नहीं करता।

दूसरी ओर, उत्तरदाताओं (मूल वादियों के कानूनी वारिसों) के वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 100 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र में ही काम किया है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं किया, बल्कि केवल निचली अदालतों द्वारा तय किए गए निर्विवाद तथ्यों को सही कानूनी रूप दिया है।

अदालत का विश्लेषण और पूर्व नजीरें

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 54 के कानूनी प्रावधानों का परीक्षण किया और माना कि इस मामले में धारा 54 पूरी तरह लागू होती है। पीठ ने विद्याधर बनाम मणिकराव व अन्य (1999) मामले में तय सिद्धांत का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:

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“परिभाषा दर्शाती है कि बिक्री का गठन करने के लिए संपत्ति के स्वामित्व का हस्तांतरण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को होना चाहिए, यानी हस्तांतरणकर्ता द्वारा संपत्ति में अपने सभी अधिकारों और हितों का हस्तांतरण किया जाता है। हस्तांतरणकर्ता संपत्ति में अपने हित या अधिकार का कोई भी हिस्सा बरकरार नहीं रख सकता, अन्यथा यह बिक्री नहीं कहलाएगी। परिभाषा में आगे कहा गया है कि स्वामित्व का हस्तांतरण ‘दिए गए या देने के वादे किए गए, या आंशिक दिए गए और आंशिक देने के वादे किए गए मूल्य’ के बदले होना चाहिए। मूल्य इस प्रकार बिक्री के लेनदेन का एक अनिवार्य घटक है। ‘मूल्य का भुगतान, वादा या आंशिक भुगतान और आंशिक वादा’ शब्द दर्शाते हैं कि सेल डीड के निष्पादन के समय पूरी कीमत का वास्तविक भुगतान बिक्री के पूरा होने के लिए अनिवार्य शर्त नहीं है। भले ही पूरी कीमत का भुगतान न किया गया हो, लेकिन दस्तावेज निष्पादित और पंजीकृत हो जाता है, तो बिक्री पूरी मानी जाएगी।”

अदालत ने आगे गायत्री प्रसाद बनाम बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (1973) और सुकालू बनाम पुनाऊ (1961) का संदर्भ देते हुए उल्लेख किया:

“वास्तविक कसौटी पक्षों का इरादा है। ‘बिक्री’ गठित करने के लिए, पक्षों का इरादा संपत्ति का स्वामित्व स्थानांतरित करने का होना चाहिए और उनका यह भी इरादा होना चाहिए कि कीमत का भुगतान वर्तमान में या भविष्य में किया जाएगा। यह इरादा सेल डीड के विवरण, पक्षों के आचरण और रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों से समझा जाता है।”

पीठ ने दहीबेन बनाम अरविंदभाई कल्याणजी भानुशाली (2020) के फैसले पर भी चर्चा की, जिसमें दोहराया गया था कि निष्पादन के समय पूरी बिक्री राशि का भुगतान बिक्री पूरा होने की पूर्व शर्त नहीं है। एक बार पंजीकृत हो जाने पर शीर्षक (टाइटल) खरीदार के पास चला जाता है। शेष राशि न मिलने पर केवल बकाया राशि वसूलने का कानूनी उपाय बचता है, न कि सेल डीड को रद्द कराने का।

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इन कानूनी सिद्धांतों को लागू करते हुए जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने पीठ की ओर से टिप्पणी की:

“केवल आंशिक प्रतिफल राशि का भुगतान होने की पूर्ण जानकारी के साथ निष्पादित की गई सेल डीड को केवल इसलिए शून्य या अप्रभावी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि बकाया राशि का वादा पूरा नहीं किया गया था। वादियों का अधिकार केवल बकाया बिक्री राशि की वसूली के लिए मुकदमा दायर करना था, न कि सेल डीड को शून्य घोषित कराने की मांग करना; जो कि वे नहीं हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि निष्पादन और पंजीकरण के साथ ही बिक्री अंतिम हो गई थी। बकाया राशि की वसूली का मुकदमा करने के बजाय वादियों ने निष्पादन के वर्षों बाद सेल डीड रद्द कराने की अनुचित मांग की।

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट तथा प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को बहाल कर दिया।

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि अपीलकर्ता संपत्ति का कब्जा प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें 10 मार्च 1975 से वादियों के लेनदारों द्वारा ली जाने वाली ब्याज दर पर बकाया राशि का भुगतान करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने वादियों के वर्तमान कब्जे में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: रज़िया बेगम व अन्य बनाम नफ़ीसा बेगम अब्दुल हमीद व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 7225 / 2011
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला, जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 07 अगस्त 2026

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