सुप्रीम कोर्ट ने 2013 के बलात्कार मामले में स्वयंभू संत आसाराम के बेटे नारायण साईं की उम्रकैद की सजा निलंबित करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट से कहा है कि वह नारायण साईं की दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपील पर तीन महीने के भीतर फैसला सुनाए।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता और राज्य सरकार दोनों इस अवधि के भीतर अपील का निपटारा सुनिश्चित करने के लिए पूरा सहयोग करें। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि हाईकोर्ट तीन महीने में मामला नहीं सुलझा पाता है, तो नारायण साईं को दोबारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता होगी।
सुनवाई के समय नारायण साईं का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन ने अदालत को बताया कि जल्द सुनवाई की अर्जी लगाने के बाद भी अपील पर अब तक सुनवाई शुरू नहीं हो पाई है।
हाईकोर्ट का रुख और सुनवाई में देरी
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश गुजरात हाईकोर्ट के 4 मई के आदेश के बाद आया है, जिसमें हाईकोर्ट ने नारायण साईं की सजा स्थगन और जमानत की अर्जी खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि जुर्म की गंभीरता को देखते हुए ऐसा कोई ठोस कारण नहीं दिखता जिससे यह माना जा सके कि अपीलकर्ता के बरी होने की संभावना है।
हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी भी की थी कि हालांकि साईं 11 साल जेल में बिता चुके हैं, लेकिन उन्होंने 2019 से अपनी मुख्य अपील की अंतिम सुनवाई में सहयोग नहीं किया है। अदालत के अनुसार, साईं मामले का शीघ्र निपटारा कराने के बजाय बार-बार अस्थायी या स्थायी जमानत की अर्जियां दाखिल कर प्रक्रिया को टालते रहे हैं।
सूरत कोर्ट की सजा और मुख्य आरोप
सूरत की एक अदालत ने अप्रैल 2019 में नारायण साईं को अपनी एक पूर्व महिला अनुयायी से 2013 में बलात्कार का दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अदालत ने उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार), 377 (अप्राकृतिक अपराध), 323 (हमला), 506-2 (आपराधिक धमकी) और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत सजा सुनाई थी।
इस मामले में तीन अन्य सह-आरोपियों—धर्मिष्ठा उर्फ गंगा, भावना उर्फ यमुना और पवन उर्फ हनुमान—को 10-10 साल की कैद की सजा दी गई थी। वहीं, नारायण साईं के पिता आसाराम को दो अलग-अलग बलात्कार मामलों में पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है।

