गोमतीनगर विस्तार ओवरब्रिज: भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया पर हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार से मांगा रिकॉर्ड

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने गोमतीनगर विस्तार स्थित भरवारा रेलवे क्रॉसिंग पर प्रस्तावित रेलवे ओवरब्रिज (ROB) के लिए की जा रही भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिकाओं और जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को मामले से जुड़े सभी आधिकारिक रिकॉर्ड अदालत के समक्ष पेश करने के निर्देश दिए हैं।

सरकारी दावों में दिखा विरोधाभास

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण कानून (2013) की धारा 11 के तहत जारी सरकारी अधिसूचना और सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट (SIA) की रिपोर्ट के बीच विरोधाभास पर चिंता जताई। धारा 11 के नोटिस में दावा किया गया था कि परियोजना से किसी भी परिवार का विस्थापन नहीं होगा। वहीं, 4 जुलाई 2025 की SIA रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि निर्माण कार्य से लोग प्रभावित और विस्थापित होंगे। कोर्ट ने अपर महाधिवक्ता को इस अंतर को स्पष्ट करने और यह साबित करने का निर्देश दिया कि अधिग्रहण का नोटिस जारी करने से पहले वैधानिक जरूरतों को पूरा किया गया था या नहीं।

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तकनीकी विभागों से परामर्श की कमी

अदालत ने पाया कि उचित मुआवजा एवं पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013 की धारा 8(2) के तहत निर्णय लेने से पहले किसी भी तकनीकी एजेंसी से सलाह लेने का कोई दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं है। हालांकि SIA रिपोर्ट और स्वतंत्र विशेषज्ञ समूह दोनों ने ही स्वीकार किया है कि भरवारा क्रॉसिंग पर ट्रैफिक जाम से मुक्ति के लिए ओवरब्रिज जरूरी है, लेकिन विभागों के बीच इसके सटीक स्थान को लेकर मतभेद थे। विशेषज्ञ समिति ने सलाह दी थी कि ओवरब्रिज के संरेखण (अलाइनमेंट) पर अंतिम फैसला रेलवे, यूपी स्टेट ब्रिज कॉरपोरेशन और अन्य तकनीकी निकायों से औपचारिक राय लेने के बाद ही लिया जाना चाहिए। इसके अलावा, SIA रिपोर्ट में मानवीय विस्थापन को कम करने के लिए एक वैकल्पिक जगह पर विचार करने का भी सुझाव दिया गया था।

कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी

खंडपीठ ने जोर देकर कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून की प्रक्रिया केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक विकास परियोजनाओं में कम से कम विस्थापन हो और सभी उपलब्ध विकल्पों की निष्पक्ष जांच की जाए। कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि उसके पिछले आदेश के बावजूद धारा 8(2) से संबंधित सरकारी रिकॉर्ड पेश नहीं किए गए।

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साथ ही, हाईकोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि उसकी टिप्पणियां केवल निर्णय लेने की कानूनी प्रक्रिया और नियमों के पालन तक सीमित हैं। अदालत ओवरब्रिज के निर्माण या उसकी उपयोगिता पर सवाल नहीं उठा रही है, क्योंकि यह क्षेत्र में यातायात की समस्या को हल करने के लिए आवश्यक है। मामले की अगली सुनवाई 5 अगस्त को तय की गई है।

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