देश की सड़कों पर दौड़ रहे लगभग 56% बिना इंश्योरेंस वाले वाहनों की गंभीर स्थिति पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रव्यापी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 146 के तहत अनिवार्य थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस का पालन न होने पर चिंता जताई। कोर्ट ने हाईवे पर लगे ANPR कैमरों को वाहन पोर्टल से जोड़ने, पेट्रोल पंपों पर बिना इंश्योरेंस वाले वाहनों को ईंधन न देने संबंधी पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने, नई गाड़ियों के लिए थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस की अवधि बढ़ाने और प्राइवेट वाहनों के लिए चार-स्तरीय (4-Layer) पॉलिसी ढांचा लागू करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही, कोर्ट ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि कॉम्प्रिहेंसिव पॉलिसी के तहत वाहन में यात्री के रूप में सफर कर रहे व्यक्ति की मौत पर बीमा कंपनी मुआवजा देने के लिए पूरी तरह जवाबदेह है।
क्या था मामला? (पृष्ठभूमि)
इस मामले की शुरुआत 13 जुलाई 1996 को हुए एक सड़क हादसे से हुई थी। टी. रामू नाम के व्यक्ति अपनी मारुति 800 कार से तिरुपति से अपने गांव वेंकनूर लौट रहे थे। सुबह करीब 5:00 बजे सिंगरायाकोंडा के पास एक अज्ञात तेज रफ्तार लॉरी ने उनकी कार को पीछे से टक्कर मार दी, जिससे उनकी मौत हो गई। मृतक के कानूनी वारिसों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT), एल.बी. नगर, हैदराबाद के समक्ष 10,00,000 रुपये के मुआवजे का दावा प्रस्तुत किया। याचिका में बताया गया कि मृतक सीफूड के कारोबार से सालाना कम से कम 1,00,000 रुपये कमाते थे और अपने परिवार के अकेले कमाने वाले सदस्य थे।
8 दिसंबर 2009 को ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि वाहन मालिक के व्यक्तिगत जोखिम को कवर करने के लिए कोई अतिरिक्त प्रीमियम नहीं दिया गया था। इसके खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट ने 30 जुलाई 2024 को ट्रिब्यूनल के फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने माना कि वाहन की पॉलिसी एक कॉम्प्रिहेंसिव (पैकेज) पॉलिसी थी, जो यात्री के रूप में यात्रा कर रहे मालिक को भी कवर करती है। हाईकोर्ट ने मृतक की काल्पनिक आय 4,500 रुपये प्रति माह मानते हुए 7.5% वार्षिक ब्याज के साथ 10,00,500 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। बीमा कंपनी नेशनल इंश्योरेंस ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
व्यापक जनहित में बदला मामला
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि देश में बड़ी संख्या में वाहन बिना वैध इंश्योरेंस के चल रहे हैं। इसे देखते हुए कोर्ट ने मामले का दायरा बढ़ाते हुए 22 बीमा कंपनियों, भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDA), जनरल इंश्योरेंस काउंसिल ऑफ इंडिया (GIC) और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) को पक्षकार के रूप में शामिल किया।
सुनवाई के दौरान विभिन्न पक्षों द्वारा निम्नलिखित महत्वपूर्ण तथ्य प्रस्तुत किए गए:
- सड़कों पर अनइंश्योर्ड वाहनों की स्थिति: वित्त संबंधी स्थायी समिति (2024-25) और लोकसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल 30.48 करोड़ वाहनों में से लगभग 16.54 करोड़ (56%) वाहन बिना इंश्योरेंस के चल रहे हैं। ई-डार (e-DAR) डेटा के मुताबिक, 22% सड़क दुर्घटनाएं बिना इंश्योरेंस वाले वाहनों से होती हैं।
- सड़क परिवहन मंत्रालय (MoRTH) का पक्ष: मंत्रालय ने बताया कि राज्यों को इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के लिए SOP जारी किया गया है और 7 राज्यों (ओडिशा, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड) में ई-डिटेक्शन शुरू हो चुका है। मंत्रालय ने ANPR कैमरों को वाहन पोर्टल से जोड़ने, अनइंश्योर्ड वाहनों को ज़ब्त करने और बिना रुके टोल टैक्स कटने वाली ‘मल्टी-लेन फ्री फ्लो टोलिंग’ प्रणाली लागू करने का सुझाव दिया।
- IRDA और GIC के सुझाव: IRDA ने ट्रैफिक पुलिस को हैंडहेल्ड डिवाइस देने, धारा 196 के तहत ई-चालान काटने और वाहन खरीदारों के लिए mandatory ‘कस्टमर ऑप्शन फॉर्म’ लागू करने का प्रस्ताव रखा। हालांकि, IRDA और GIC ने प्रीमियम दरों में नियमित संशोधन का हवाला देते हुए बहु-वर्षीय (multi-year) नीतियों को और अधिक बढ़ाने का विरोध किया था।
- लंबित मुकदमों पर सुझाव: वरिष्ठ वकील जे.आर. मिड्ढा ने कोर्ट को बताया कि धारा 159 के तहत पुलिस को 30 दिनों के भीतर डिटेल्ड एक्सीडेंट रिपोर्ट (DAR) जमा करनी होती है। उन्होंने 31 मार्च 2022 से पहले के लंबित मामलों के जल्द निपटारे के लिए निर्देश देने का अनुरोध किया।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने कानून के अनिवार्य प्रावधानों और जमीनी स्तर पर उनके क्रियान्वयन के बीच की खाई पर गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने टिप्पणी की कि वाहन का इंश्योरेंस न होने के कारण दुर्घटना पीड़ितों और उनके परिवारों को मुआवजे के लिए दर-दर भटकना पड़ता है।
सड़क सुरक्षा को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से जोड़ते हुए, पीठ ने इन री: फलोदी एक्सीडेंट बनाम भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण व अन्य के मामले में दिए गए अपने पूर्व निर्णय को उद्धृत किया:
“एक सड़क, विशेष रूप से एक हाई-स्पीड एक्सप्रेसवे, प्रशासनिक सुस्ती या ढांचागत कमियों के कारण खतरे का गलियारा नहीं बनना चाहिए। अवैध पार्किंग या ब्लैकस्पॉट जैसे टाले जा सकने वाले खतरों के कारण एक भी जान जाना राज्य के सुरक्षात्मक छत्र की विफलता को दर्शाता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिया गया ‘जीवन का अधिकार’ केवल जीवन को गैर-कानूनी तरीके से छीने जाने के खिलाफ गारंटी नहीं है, बल्कि यह राज्य पर एक सकारात्मक जनादेश है कि वह एक सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करे जहां मानव जीवन को संरक्षित और मूल्यवान माना जाए। इसलिए, यात्री की सुरक्षा को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मान के साथ जीने के अधिकार के अभिन्न पहलू के रूप में स्वीकार करते हुए, यह आवश्यक है कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए इन अंतरिम निर्देशों को जारी करके व्यवस्थित मूल कारणों का समाधान किया जाए। हम दोहराते हैं कि कोई भी वित्तीय या प्रशासनिक बाधा मानव जीवन की पवित्रता से बढ़कर नहीं हो सकती, और यहां दी गई सख्त समय-सीमाएं इस संवैधानिक दायित्व की तात्कालिकता को दर्शाती हैं।”
इसके साथ ही पटना हाईकोर्ट के अभिजीत कुमार पांडे बनाम बिहार राज्य निर्णय का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने दोहराया:
“हम यह मानते हैं कि सुरक्षित यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) के तहत स्वतंत्र आवाजाही के अधिकार और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में निहित है।”
लंबित मामलों पर चिंता जताते हुए पीठ ने जनरल इंश्योरेंस काउंसिल बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, जय प्रकाश बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी, एम.आर. कृष्णा मूर्ति बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और शिशु पाल उर्फ शीश राम व अन्य बनाम सुरजीत व अन्य मामलों के मिसालों का उल्लेख किया, जिनमें पाया गया था कि 50% से अधिक दुर्घटना दावे चार साल से अधिक समय से लंबित रहते हैं।
मूल अपील पर विचार करते हुए, कोर्ट ने सुरेखा व अन्य बनाम संतोष व अन्य निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि दुर्घटना दावों में अदालतों को अत्यधिक तकनीकी रवैया नहीं अपनाना चाहिए। IRDA के 16 नवंबर 2009 के सर्कुलर का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कॉम्प्रिहेंसिव/पैकेज पॉलिसी के तहत बीमा कंपनियां वाहन में सवार किसी भी यात्री को क्षतिपूर्ति देने के लिए बाध्य हैं।
कोर्ट का निर्णय और देशव्यापी निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी की अपील को खारिज कर दिया और तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा दिए गए 10,00,500 रुपये (7.5% ब्याज सहित) के मुआवजे के आदेश को सही ठहराया।
इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक हित में कोर्ट ने सड़क परिवहन मंत्रालय और IRDA को निम्नलिखित बाध्यकारी निर्देश जारी किए:
- ANPR और VAHAN एकीकरण: सड़कों और हाईवे पर लगे ANPR कैमरों को इंश्योरेंस इंफॉर्मेशन ब्यूरो और VAHAN पोर्टल से तुरंत जोड़ा जाए ताकि बिना इंश्योरेंस वाले वाहनों का अपने आप ई-चालान काटा जा सके।
- ट्रैफिक पुलिस के लिए हैंडहेल्ड डिवाइस: राज्य पुलिस को VAHAN डेटा से जुड़े हैंडहेल्ड डिवाइस या मोबाइल ऐप उपलब्ध कराए जाएं ताकि वे मौके पर ही वाहनों के इंश्योरेंस स्टेटस की जांच कर सकें।
- चार-स्तरीय (4-Layer) पॉलिसी ढांचा: IRDA निजी वाहनों के लिए एक स्पष्ट 4-स्तरीय इंश्योरेंस ढांचा लागू करे:
- लेयर I: अनिवार्य थर्ड-पार्टी पॉलिसी (धारा 146 MVA के तहत बेस कवर)।
- लेयर II: यात्रियों/पिलियन राइडर्स के लिए वैकल्पिक कानूनी देयता कवर (मालिक, ड्राइवर और परिवार को छोड़कर)।
- लेयर III: मालिक, ड्राइवर और यात्रियों के लिए पर्सनल एक्सीडेंट कवर।
- लेयर IV: खुद वाहन के नुकसान के लिए ओन डैमेज (Own Damage) कवर। खरीदार को एक मानकीकृत ‘कस्टमर ऑप्शन फॉर्म’ और कस्टमर इंफॉर्मेशन शीट देना अनिवार्य होगा।
- थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस अवधि में बढ़ोतरी: एस. राजासेकरण बनाम भारत संघ (2018) के आदेश में संशोधन करते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि नए वाहनों की खरीद के समय अनिवार्य थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस की अवधि कार के लिए 4 वर्ष (पहले 3 वर्ष) और दोपहिया वाहनों के लिए 6 वर्ष (पहले 5 वर्ष) होगी।
- पेट्रोल पंपों पर इंश्योरेंस लिंक और पायलट प्रोजेक्ट:
- आम नागरिकों के लिए वाहनों के वास्तविक इंश्योरेंस स्टेटस की जांच हेतु एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जाए।
- IRDA और MoRTH मिलकर एक ऐसा पायलट प्रोजेक्ट तैयार करें, जिसके तहत ANPR कैमरों की मदद से पेट्रोल पंपों पर वाहनों के इंश्योरेंस की जांच हो और वैध इंश्योरेंस न होने पर वाहन को ईंधन देने से मना कर दिया जाए।
- हाईवे पर ट्रैफिक जाम रोकने के लिए बैरियर-मुक्त ‘मल्टी-लेन फ्री फ्लो टोलिंग’ पायलट प्रोजेक्ट लागू किए जाएं।
- पुराने MACT मुकदमों का जल्द निपटारा: 31 मार्च 2022 से पहले हुए हादसों के लंबित मुकदमों में राज्य पुलिस को निर्देश दिया गया है कि वे सभी जरूरी दस्तावेजों (FIR, MLC, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, इंश्योरेंस पॉलिसी) के साथ डिटेल्ड एक्सीडेंट रिपोर्ट (DAR) ट्रिब्यूनल में जल्द दाखिल करें और गवाहों को पेश कराने में मदद करें।
सभी हितधारकों को 14 अगस्त 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया गया है। मामले की अगली समीक्षा सुनवाई 18 अगस्त 2026 को होगी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम श्रीमती तुंगला धना लक्ष्मी व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील नंबर 14369/2025
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा निर्णय की तिथि: 4 अगस्त 2026

