सोशल मीडिया पोस्ट मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने अरविंद केजरीवाल और अन्य आप नेताओं को अवमानना पर जवाब के लिए चार हफ्ते का समय दिया

दिल्ली हाईकोर्ट ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ सोशल मीडिया पर कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणी करने के आपराधिक अवमानना मामले में आम आदमी पार्टी (आप) के शीर्ष नेताओं को अपना पक्ष रखने के लिए चार सप्ताह की मोहलत दी है। कोर्ट ने मंगलवार को पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और अन्य नेताओं को लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुदेजा की पीठ ने यह निर्देश तब जारी किया जब बचाव पक्ष के वकीलों ने अदालत को बताया कि उन्हें अभी तक अवमानना कार्रवाई का आधार बनने वाले जरूरी दस्तावेज प्राप्त नहीं हुए हैं। इस पर संज्ञान लेते हुए पीठ ने हाईकोर्ट रजिस्ट्री को सभी पक्षकारों को तुरंत संबंधित कागजात मुहैया कराने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई के लिए 21 सितंबर की तारीख तय की।

अन्य याचिकाओं पर भी जवाब के लिए मोहलत

इसी दौरान हाईकोर्ट ने आप नेता गोपाल राय और पत्रकार सौरव दास को भी एक अलग अवमानना याचिका में जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया। अधिवक्ता अशोक चैतन्य द्वारा दायर इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि दोनों जस्टिस शर्मा के खिलाफ चलाए गए एक सुनियोजित सोशल मीडिया अभियान में शामिल थे।

इससे पहले 19 मई को हाईकोर्ट ने जस्टिस शर्मा द्वारा दर्ज किए गए स्वतः संज्ञान अवमानना मामले में केजरीवाल और अन्य नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा था। अदालत ने इस मामले में सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता राजदीपा बेहुरा को एमिकस क्यूरी (अदालत का मित्र) भी नियुक्त किया था।

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न्यायाधीश के खिलाफ मुहिम और भ्रामक वीडियो के आरोप

यह अवमानना कार्रवाई जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा द्वारा 14 मई को शुरू की गई थी। इसमें केजरीवाल, सिसोदिया, संजय सिंह के अलावा आप नेता दुर्गेश पाठक, सौरभ भारद्वाज, विनय मिश्रा और एक्स उपयोगकर्ता देवेश विश्वकर्मा को नामजद किया गया था।

अपने अवमानना आदेश में जस्टिस शर्मा ने कहा था कि केजरीवाल ने कानूनी रास्ते अपनाने के बजाय सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ एक सुनियोजित दुष्प्रचार अभियान चलाया। न्यायाधीश ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि आप नेताओं ने अपनी पोस्ट में उन पर राजनीतिक जुड़ाव के आरोप लगाए और वाराणसी के एक शैक्षणिक संस्थान में दिए गए उनके भाषण का एक भ्रामक एडिटेड वीडियो साझा किया।

अदालत की कार्यवाही के वीडियो क्लिप को व्यापक रूप से शेयर किए जाने का उल्लेख करते हुए जस्टिस शर्मा ने टिप्पणी की थी कि आरोपी एक समानांतर नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे माहौल में चुप्पी साधना न्यायिक संयम नहीं, बल्कि किसी प्रभावशाली पक्षकार के आगे आत्मसमर्पण करने जैसा होगा।

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शराब नीति मामला और सत्याग्रह का पत्र

इस विवाद की शुरुआत दिल्ली आबकारी नीति जांच से जुड़े घटनाक्रमों से हुई थी। 27 फरवरी को एक निचली अदालत ने केजरीवाल, सिसोदिया और 21 अन्य आरोपियों को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि सीबीआई का मामला न्यायिक जांच में टिकने योग्य नहीं है और पूरी तरह खारिज होने लायक है।

सीबीआई ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। इसके बाद जस्टिस शर्मा ने 20 अप्रैल को सीबीआई याचिका की सुनवाई से खुद को अलग करने की मांग वाली अर्जी खारिज कर दी। इसके विरोध में केजरीवाल, सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने एक संयुक्त पत्र लिखकर घोषणा की कि वे व्यक्तिगत रूप से या अपने वकीलों के जरिए जस्टिस शर्मा की अदालत में पेश नहीं होंगे और महात्मा गांधी के सत्याग्रह के मार्ग का पालन करेंगे।

बाद में जस्टिस शर्मा ने सीबीआई अपील पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया और मामला दूसरी पीठ को स्थानांतरित कर दिया। फिलहाल यह मामला जस्टिस मनोज जैन की अदालत में लंबित है।

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