बच्चे से मिलने की फीस रद्द, कर्नाटक हाईकोर्ट की मां को चेतावनी- असहयोग पड़ा भारी तो नहीं मिलेगी कस्टडी

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक बच्चे के कस्टडी विवाद में फैसला सुनाते हुए पिता पर लगाई गई 5,000 रुपये प्रति मुलाकात की फीस को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने मां को सख्त चेतावनी दी है कि यदि उसने पिता को बच्चे से मिलने देने के अदालती आदेशों का पालन नहीं किया, तो इसका असर उसकी स्थायी कस्टडी की मांग पर पड़ सकता है।

जस्टिस पी श्री सुधा की पीठ ने 24 जुलाई को यह फैसला सुनाते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें पिता को हर मुलाकात के लिए मां को 5,000 रुपये देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि मां ने स्वयं मुलाकात की जगह किसी कॉफी शॉप के बजाय फैमिली कोर्ट के विजिटेशन रूम में बदलने का अनुरोध किया था, इसलिए वह किसी भी तरह के यात्रा खर्च की हकदार नहीं है।

मुलाकात के नए नियम और पाबंदी

अदालत ने पिता की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने अपने चार साल के बेटे से बिना किसी निगरानी के मिलने की अनुमति मांगी थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा तय समय-सारणी को बरकरार रखा। इस व्यवस्था के तहत पिता को हर महीने के पहले और तीसरे शनिवार को फैमिली कोर्ट के विजिटेशन रूम में और बच्चे के जन्मदिन पर मिलने की अनुमति रहेगी।

अदालत ने पिता और पुत्र के बीच बेहतर संबंध बनाने के उद्देश्य से दोनों पक्षों के दादा-दादी और नाना-नानी के मुलाकात के दौरान मौजूद रहने पर रोक लगा दी है। पीठ का मानना था कि परिवार के अन्य सदस्यों को दूर रखने से पिता और बेटे को बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के गुणवत्तापूर्ण समय बिताने का अवसर मिलेगा।

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मां के रवैये पर कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

हाईकोर्ट ने पिता द्वारा प्रस्तुत रिकॉर्ड्स का संज्ञान लिया, जिनसे पता चलता है कि दोनों के घर के बीच सिर्फ 1.75 किलोमीटर की दूरी होने के बावजूद मां कई मौकों पर बिना किसी पूर्व सूचना के बच्चे को मुलाकात के लिए नहीं लाई।

पीठ ने पाया कि मां बच्चे को पिता से मिलाने में अनिच्छा जता रही थी और उसने पूर्व में आदेश जारी होने के कुछ ही समय बाद शर्तों में बदलाव की मांग कर दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी कि मां का यह लगातार असहयोग और अदालती निर्देशों का उल्लंघन स्थायी कस्टडी याचिका के अंतिम फैसले के समय उसके खिलाफ जा सकता है।

क्या है मामला

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यह कानूनी विवाद दंपति के अलग होने के बाद शुरू हुआ था। पिता की ओर से पेश वकील रश्मि जॉर्ज के अनुसार, मां 30 जून 2022 को बिना कोई कारण बताए बच्चे को लेकर अपने पति के घर से चली गई थी। इसके बाद पिता ने बेंगलुरु के फैमिली कोर्ट में बच्चे की स्थायी कस्टडी के लिए याचिका दायर की थी।

मुकदमे की सुनवाई के दौरान पिता ने सप्ताहांत पर कुछ घंटों के लिए बिना निगरानी के अंतरिम कस्टडी मांगी थी। पिता का आरोप था कि पूर्व में तय मुलाकात के दौरान मां देर से आती थी, अपने माता-पिता को साथ लाती थी और बातचीत में बाधा डालती थी, जिससे बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा था।

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दूसरी ओर, मां ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा था कि बच्चा पिता के साथ लंबा समय बिताने में सहज नहीं महसूस करता और रोने लगता है। मां ने यह आरोप भी लगाया कि पिता बच्चे के पालन-पोषण में लापरवाही बरत रहे हैं और भरण-पोषण राशि का भुगतान नहीं कर रहे हैं।

इसके बाद बेंगलुरु फैमिली कोर्ट ने मुलाकात को महीने में दो बार और जन्मदिन तक सीमित करते हुए 5,000 रुपये प्रति विजिट की शर्त लगा दी थी, जिसे पिता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

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