छत्तीसगढ़ के एक जिला उपभोक्ता आयोग ने ऑनलाइन बुकिंग के बावजूद बुजुर्ग दंपत्ति को कन्फर्म सीटें न देने और सफर के दौरान बार-बार उनकी सीट बदलने पर एक बस ट्रैवल कंपनी पर जुर्माना लगाया है। आयोग ने सेवा में कमी और लापरवाही का दोषी पाते हुए ट्रैवल ऑपरेटर को पीड़ित दंपत्ति को मानसिक उत्पीड़न के एवज में 20,000 रुपये और विधिक खर्च के रूप में 10,000 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही आयोग ने यात्रा की स्वीकार्य राशि लौटाने के भी आदेश दिए हैं।
जिला उपभोक्ता आयोग की अध्यक्ष सुजाता जायसवाल और सदस्य डाकेश्वर सोनी की पीठ ने 22 जुलाई को यह फैसला सुनाया। आयोग ने अपने फैसले में कहा कि पूरा किराया लेने के बाद यात्रियों को उनकी आरक्षित सीट न देना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत सेवा में लापरवाही और कमी के दायरे में आता है। आयोग ने स्पष्ट किया कि बस संचालक अपनी परिचालन सुविधा के लिए यात्रियों की आरक्षित सीटें मनमाने ढंग से नहीं बदल सकते।
सफर के दौरान बार-बार बदली गई सीट
मामला 21 दिसंबर 2025 का है, जब 61 वर्षीय और 57 वर्षीय बुजुर्ग दंपत्ति ने कांकेर से रायपुर जाने के लिए एक निजी बस कंपनी में 500 रुपये प्रति सीट के हिसाब से दो सीटें ऑनलाइन बुक की थीं। बस में सवार होने के बाद कर्मचारियों ने उनसे यह कहकर अपनी तय सीटें खाली करने को कहा कि सीट नंबर दो किसी अन्य यात्री के नाम पर है। इसके बाद उन्हें सीट नंबर चार पर स्थानांतरित कर दिया गया।
थोड़ी देर बाद बस कर्मचारियों ने एक महिला और दो बच्चों को बैठाने के लिए दंपत्ति को फिर से अपनी जगह छोड़ने का निर्देश दिया। बुजुर्ग दंपत्ति ने जब अपने कन्फर्म टिकट का हवाला देते हुए आपत्ति जताई, तो कर्मचारियों ने उनकी बात अनसुनी कर दी। लगभग 30 किलोमीटर के सफर के दौरान उन्हें बार-बार परेशान किया गया और उनकी सीटें बदली गईं।
नोटिस का जवाब न मिलने पर पहुंचे आयोग
इस दुर्व्यवहार और मानसिक उत्पीड़न से परेशान होकर दंपत्ति ने ट्रैवल कंपनी को विधिक नोटिस भेजकर जवाब और मुआवजे की मांग की। पांच दिनों तक कोई संतोषजनक उत्तर न मिलने पर उन्होंने न्याय के लिए जिला उपभोक्ता आयोग का रुख किया।
ऑपरेटर के दावों में नहीं मिला दम
सुनवाई के दौरान बस ऑपरेटर ने अपने बचाव में कहा कि यात्रियों को उनके टिकट के अनुसार ही सीटें दी गई थीं और सेवा में कोई कमी नहीं हुई थी। कंपनी ने शिकायत को झूठा बताते हुए खारिज करने की मांग की।
हालांकि, आयोग ने पाया कि ऑपरेटर ने अपने दावों के समर्थन में कोई शपथ पत्र या गवाह प्रस्तुत नहीं किया। इस वजह से शिकायतकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजी साक्ष्य अनसुने और अकाट्य रहे। आयोग ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि बस ऑपरेटर शिकायतकर्ताओं की आरक्षित सीटों को बार-बार बदलने का कोई तर्कसंगत कारण बताने में असफल रहा, जिससे यात्रियों को अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ा।

