सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद सख्त हुई न्यायपालिका: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने 351 पुराने मुकदमों के निपटारे की समय-सीमा तय की

सुप्रीम कोर्ट की गंभीर टिप्पणियों के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने केंद्र शासित प्रदेशों की निचली अदालतों को वर्षों से लंबित 351 आपराधिक मुकदमों की सुनवाई तेजी से पूरी करने के कड़े निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने इनमें से सबसे पुराने मामलों का निपटारा चार महीने से लेकर तीन साल के भीतर करने की अंतिम समय-सीमा निर्धारित की है।

हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल एम. के. शर्मा द्वारा 25 जून को जारी आदेश के तहत अधीनस्थ अदालतों को 15 बेहद पुराने प्राथमिक मामलों की सुनवाई चार महीने से तीन साल में पूरी करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके अलावा, निचली अदालतों को 336 अन्य ऐसे आपराधिक मामलों में भी तेजी से सुनवाई के निर्देश दिए गए हैं जिनमें आरोपी बिना किसी फैसले के 14 से 15 साल जैसी लंबी अवधि से जेलों में बंद हैं।

निचली अदालतों के लिए हाईकोर्ट के निर्देश

मामलों के निपटारे की गति बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट ने अधीनस्थ अदालतों को निर्देश दिया है कि वे इन मुकदमों को अपनी दैनिक कार्यसूची (कॉज लिस्ट) में सबसे ऊपर रखें और अकारण सुनवाई स्थगित करने से बचें। अदालतों से कहा गया है कि वे गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करें, बयान दर्ज करने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और डिजिटल साधनों का इस्तेमाल करें। साथ ही, यदि बचाव पक्ष के वकील की अनुपस्थिति या असहयोग से कार्यवाही में बाधा आती है, तो बिना देरी किए कानूनी सहायता (लीगल एड) वकील नियुक्त किया जाए।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर की जेलों में कई विचाराधीन कैदी 10 से 15 साल से बंद हैं, जबकि कुछ मामलों में हिरासत की अवधि 18 साल से भी अधिक हो चुकी है।

READ ALSO  केरल हाईकोर्ट ने वकील की फीस न चुकाने पर NCTE पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया

तय सजा से भी अधिक समय जेल में बिता चुका है आरोपी

हाईकोर्ट द्वारा प्राथमिकता दिए गए 15 मुख्य मामलों में डोडा निवासी गुलाम नबी का मामला प्रमुख है, जो 15 साल से अधिक समय से जेल में बंद है। यह अवधि उसके ऊपर लगे आरोपों के लिए कानून में तय अधिकतम सजा से भी ज्यादा है।

बचाव पक्ष के वकील परवेज अहमद के अनुसार, नबी पर 2010 में तत्कालीन रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) के तहत हत्या के प्रयास, आपराधिक साजिश और अपराधियों को शरण देने के साथ-साथ आर्म्स एक्ट के तहत आरोप लगाए गए थे। उस समय इन अपराधों में अधिकतम 10 साल की सजा का प्रावधान था। इसके अलावा, नबी 2009 और 2010 के दो अन्य मुकदमों का भी सामना कर रहा है, जिनमें विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, हत्या, चोरी और हथियारों से जुड़ी धाराएं शामिल हैं।

तीन दशक पुराना हत्याकांड और सीमा पार से नशीली दवाओं की तस्करी

हाईकोर्ट की प्राथमिकता सूची में 1996 में श्रीनगर के निशात से ठेकेदार अली मोहम्मद मीर के अपहरण और हत्या का मामला भी शामिल है। हथियारबंद लोगों द्वारा अपहरण के बाद मीर की हत्या कर दी गई थी और उनका शव झेलम नदी में फेंक दिए जाने की बात सामने आई थी, जो आज तक बरामद नहीं हो सका है।

घटना के 11 साल बाद 2007 में इस मामले की पहली प्राथमिकी दर्ज की गई थी। प्राथमिकी में नामजद छह आरोपियों में से तीन की मौत हो चुकी है। बाकी बचे तीन आरोपियों में से दो 2008 से जेल में हैं, जबकि तीसरे आरोपी को दिसंबर 2025 में गिरफ्तार किया गया।

READ ALSO  Inquiry indeed can be initiated against the officer/employee who retired from the service provided sanction is obtained from the Government: SC

एक अन्य मामले में, मुज़फ़्फ़राबाद निवासी ट्रक चालक मोहम्मद शफ़ीक़ अवाण 12 साल से अधिक समय से हिरासत में है। उसे 17 जनवरी 2014 को उरी स्थित सलामाबाद व्यापार सुविधा केंद्र से 148 बादाम की बोरियों में छिपाई गई 114 किलोग्राम हेरोइन के साथ गिरफ्तार किया गया था।

इस घटना के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक और व्यापारिक तनाव पैदा हो गया था, जिससे सीमा पार व्यापार और आवाजाही को अस्थायी रूप से रोकना पड़ा था। इस मामले में कथित तौर पर मदद करने वाले दो स्थानीय व्यापारियों को अदालत से जमानत मिल चुकी है, लेकिन अवाण लगातार जेल में बना हुआ है। उस समय व्यावसायिक मात्रा में मादक पदार्थों की बरामदगी पर अधिकतम 20 साल की कैद का प्रावधान था।

READ ALSO  मराठा आरक्षण मामला: इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में बनी समिति

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद आया आदेश

हाईकोर्ट का यह आदेश सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस साल की शुरुआत में जताई गई नाराजगी के बाद आया है। अप्रैल में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट को पांच साल से अधिक समय से लंबित सभी आपराधिक मुकदमों में सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए थे।

इससे पहले फरवरी में, सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक आरोपी को सात साल तक जेल में रखने और इस दौरान 82 सुनवाइयों में केवल सात गवाहों की जांच किए जाने पर अभियोजन पक्ष के रवैये की आलोचना की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले त्वरित सुनवाई के अधिकार का मज़ाक करार देते हुए जम्मू-कश्मीर के गृह सचिव से जवाब और पांच साल या उससे अधिक समय से बंद कैदियों का पूरा ब्योरा मांगा था।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles