केरल हाईकोर्ट का राज्य सरकार को निर्देश: केएसआरटीसी की महिला कंडक्टरों के लिए मेंस्ट्रुअल लीव नीति पर तीन महीने में लें फैसला

केरल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को केरल राज्य सड़क परिवहन निगम (केएसआरटीसी) की महिला बस कंडक्टरों के लिए पेड मेंस्ट्रुअल लीव (पीरियड लीव) नीति लागू करने की मांग पर तीन महीने के भीतर फैसला लेने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि महिला कंडक्टरों के काम के अत्यधिक कठिन स्वरूप को देखते हुए ऐसी कल्याणकारी नीति लागू करने पर विचार किया जाना चाहिए।

जस्टिस बीजू एब्राहम की पीठ ने तीन महिला कंडक्टरों और कर्मचारियों के कल्याण संगठन ‘फोरम फॉर जस्टिस’ (एफएफजे) की रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया। याचिकाकर्ताओं ने महिला कंडक्टरों के लिए हर महीने दो दिन के वैतनिक मेंस्ट्रुअल लीव की मांग की है। हाईकोर्ट ने राज्य अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे अंतिम फैसला लेने से पहले याचिकाकर्ताओं और केएसआरटीसी प्रबंधन दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर प्रदान करें।

संवैधानिक अधिकारों और कार्यस्थल की चुनौतियों पर जोर

अदालत ने 23 जुलाई को सुनवाई के दौरान मेंस्ट्रुअल लीव को एक प्रगतिशील कल्याणकारी उपाय बताया। पीठ ने कहा कि यह नीति महिलाओं पर पीरियड्स के दौरान पड़ने वाले शारीरिक और मानसिक प्रभाव को स्वीकार करती है। जस्टिस एब्राहम के अनुसार, यह कदम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21, 15(3) और 42 के सिद्धांतों के अनुरूप है, जो गरिमा की रक्षा, महिलाओं के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति और मानवीय कार्य परिस्थितियों की गारंटी देते हैं।

हाईकोर्ट ने केएसआरटीसी के ऑपरेटिंग सेक्टर में काम करने वाली लगभग 3,000 महिलाओं के कामकाजी माहौल पर ध्यान केंद्रित किया। याचिका में बताया गया कि महिला कंडक्टरों को प्रतिदिन 8 से 16 घंटे की लंबी शिफ्ट में काम करना पड़ता है। उन्हें चलती और भीड़भाड़ वाली बसों में लगातार खड़े रहकर टिकट जारी करने और किराया वसूलने की जिम्मेदारी निभानी होती है। इसके अतिरिक्त, अधिकांश डिपो में स्वच्छ पानी वाले शौचालयों, समुचित विश्राम क्षेत्रों और पीरियड अपशिष्ट निपटान की सुविधाओं का भारी अभाव है।

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स्वास्थ्य, गरिमा और उत्पादकता पर सकारात्मक प्रभाव

कार्यस्थल की इन प्रतिकूल परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि मेंस्ट्रुअल के दौरान गंभीर लक्षण कर्मचारियों के स्वास्थ्य, गरिमा और कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं। मेंस्ट्रुअल लीव देने से कर्मचारियों का कल्याण सुनिश्चित होगा, ‘प्रेजेंटेइज्म’ (अस्वस्थ होने पर भी मजबूरी में काम पर उपस्थित होना) घटेगा, कार्यस्थल पर उत्पादकता बढ़ेगी और अधिक समावेशी माहौल बनेगा।

याचिकाकर्ताओं ने 30 अक्टूबर 2025 को राज्य सरकार को इस संबंध में ज्ञापन सौंपा था। सरकार की ओर से कोई कार्रवाई न होने पर उन्होंने हाईकोर्ट की शरण ली।

अन्य राज्यों की नीतियां और वर्तमान स्थिति

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याचिका में अन्य राज्यों का उदाहरण देते हुए बताया गया कि कर्नाटक सरकार ने नवंबर 2025 में सरकारी और निजी क्षेत्रों में 18 से 52 वर्ष की महिला कर्मचारियों के लिए हर महीने एक दिन के वैतनिक मेंस्ट्रुअल लीव का प्रावधान किया है। इसके अलावा बिहार और ओडिशा में भी ऐसी नीतियां लागू हैं।

केरल में वर्तमान में विश्वविद्यालय स्तर पर छात्राओं को मेंस्ट्रुअल लीव का लाभ दिया जाता है, लेकिन राज्य सरकार के कर्मचारियों या केएसआरटीसी के कर्मचारियों के लिए अब तक ऐसा कोई प्रावधान लागू नहीं किया गया है।

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