इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चार वकीलों के कोर्ट परिसर प्रवेश पर लगाई रोक: लखनऊ जिला अदालत में हिंसा और जमीन कब्जाने के आरोपों पर IB जांच और संपत्ति ब्योरे के दिए निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने लखनऊ जिला अदालत परिसर में एक वादकारी के साथ हुई हिंसा, मारपीट और धमकी के मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने सेंट्रल बार एसोसिएशन लखनऊ के कनिष्ठ उपाध्यक्ष सौरभ कुमार वर्मा सहित चार अधिवक्ताओं के 24 अगस्त 2026 तक लखनऊ जिले के किसी भी कोर्ट परिसर में प्रवेश करने पर रोक लगा दी है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने जिला अदालत में वकीलों द्वारा जमीन कब्जाने, संगठित गुंडागर्दी और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के गंभीर आरोपों पर खुफिया ब्यूरो (IB) से गोपनीय जांच कराने, वकीलों के 10 साल के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) व संपत्ति का प्रकटीकरण मांगने तथा पीड़ित को पुलिस सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वकीलों द्वारा दायर एक आवेदन (I.A. संख्या 08/2026) से उत्पन्न हुआ, जिसमें 21 जुलाई 2026 को लखनऊ जिला अदालत परिसर के भीतर हुई एक हिंसक घटना का विवरण दिया गया था। हाईकोर्ट ने इस आवेदन को एक अलग स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (Suo Motu PIL) के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया।

घटना के अनुसार, दीवानी मुकदमे (सूट संख्या 2933/2025) के वादी संख्या 1 मोहम्मद शाकिर के साथ मारपीट की गई, उन्हें घसीटकर सेंट्रल बार एसोसिएशन के कार्यालय ले जाया गया और मुकदमा वापस न लेने पर जान से मारने की धमकी दी गई। इस घटना के बाद वजीरगंज थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 109, 191(2), 115(2), 127(2) और 351(3) के तहत एफआईआर (केस क्राइम संख्या 0174/2026) दर्ज की गई।

सुनवाई के दौरान मोहम्मद शाकिर स्वयं हाईकोर्ट के समक्ष उपस्थित हुए और रोते हुए बताया कि किस तरह वकील सौरभ कुमार वर्मा (कनिष्ठ उपाध्यक्ष, सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ), हर्षित पांडे, यश पांडे, अभय प्रताप वर्मा और उनके साथियों ने उनके साथ बुरी तरह मारपीट की। जिला न्यायाधीश और पुलिस आयुक्त, लखनऊ द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट और सीसीटीवी फुटेज से भी शारीरिक हमले की पुष्टि हुई और इन चारों वकीलों की मुख्य आरोपियों के रूप में पहचान की गई।

अदालत में पेशी और पक्षों की बहस

सुनवाई के दौरान आवेदकों की ओर से एडवोकेट अबिप्सा मोहंती, कोमल अग्रवाल और आशुतोष श्रीवास्तव पेश हुए। उन्होंने पीठ को बताया कि हमलावर वकील सौरभ कुमार वर्मा के पास असलहा था और उन्होंने अपने साथी वकील अभय प्रताप वर्मा से कहा कि वह हथियार शाकिर के हाथ में थमा दें ताकि उन्हें किसी आपराधिक मामले में फंसाया जा सके। उन्होंने यह भी बताया कि शाकिर को कई घंटों तक सेंट्रल बार एसोसिएशन के दफ्तर में अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा गया था।

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राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए गवर्नमेंट एडवोकेट डॉ. वी.के. सिंह, एजीए-1 गिरिजेश कुमार द्विवेदी और स्टेट लॉ ऑफिसर शिवेंद्र शिवम सिंह राठौर ने कोर्ट को सूचित किया कि सौरभ कुमार वर्मा के खिलाफ लखनऊ के विभिन्न थानों में चोरी, आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी, बलवा और मारपीट जैसे 8 आपराधिक मामले दर्ज हैं। वहीं, वकील हर्षित पांडे के खिलाफ भी एक आपराधिक मामला लंबित है।

वकील सौरभ कुमार वर्मा की ओर से एडवोकेट अनुपम मेहरोत्रा और एडवोकेट सादिक हसन पेश हुए। शुरुआती बहस में अनुपम मेहरोत्रा ने दावा किया कि मोहम्मद शाकिर खुद एक वकील हैं जो प्रॉपर्टी डीलिंग का काम करते हैं। हालांकि, जब कोर्ट ने मोहम्मद शाकिर से सीधे पूछताछ की, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि वे वकील नहीं बल्कि आजमगढ़ के राजकीय मेडिकल कॉलेज में पदस्थ एक सरकारी कर्मचारी हैं। इसके बाद बचाव पक्ष के वकील ने माना कि निर्देशों के आदान-प्रदान में गफलत हुई थी।

मामले के तथ्यों से यह भी उजागर हुआ कि सौरभ कुमार वर्मा दीवानी मुकदमे (सूट संख्या 2933/2025) में प्रतिवादी संख्या 1 हैं और उन्होंने एक पूर्व मुकदमे (सूट संख्या 1317/2022) के लंबित रहने के दौरान विक्रय विलेख (सेल डीड) के माध्यम से विवादित संपत्ति खरीदी थी। पीठ ने टिप्पणी की कि यदि वर्मा पूर्व मुकदमे में पेशेवर रूप से शामिल थे, तो विवादित संपत्ति खरीदना एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत बने बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स, 1975 के अध्याय II, भाग VI के नियम 22A का उल्लंघन है।

केंद्र सरकार की ओर से डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया (DSGI) एस.बी. पांडे और एडवोकेट राज कुमार सिंह, जबकि सीबीआई की ओर से एडवोकेट अनुराग कुमार सिंह उपस्थित हुए। सेंट्रल बार एसोसिएशन लखनऊ के अध्यक्ष अखिलेश जायसवाल और सचिव अवनीश दीक्षित, डॉ. एल.पी. मिश्रा के साथ कोर्ट में मौजूद रहे। इसके अलावा आयकर विभाग का प्रतिनिधित्व करने के लिए एडवोकेट कुशाग्र दीक्षित को नामित किया गया।

दूसरी ओर, पुलिस आयुक्त की रिपोर्ट में वकील हर्षित पांडे द्वारा दिए गए एक आवेदन का जिक्र था जिसमें दावा किया गया था कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने गोली चलाई थी। हालांकि, पुलिस जांच और सीसीटीवी फुटेज में किसी भी पक्ष द्वारा असलहा ले जाने या गोली चलाए जाने का कोई सबूत नहीं मिला।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियां और विश्लेषण

सीसीटीवी फुटेज और रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने जिला अदालत परिसर में फैली अराजकता और अदालती सुरक्षाकर्मियों की ओर से हुई चूक पर गंभीर चिंता व्यक्त की।

वकीलों के आचरण की तीखी आलोचना करते हुए पीठ ने कहा: “मौजूदा मामले में, वकीलों ने खुलेआम उपद्रव मचाया, एक याचिकाकर्ता को अपनी मर्जी से गालियां दीं, अपमानित किया और उसके साथ मारपीट की, तथा उसे गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां दीं, जैसा कि आवेदकों और एफआईआर के वादी मोहम्मद शाकिर ने आरोप लगाया है।”

हाईकोर्ट ने जिला अदालत में वकीलों के एक समूह द्वारा अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों पर प्रकाश डालते हुए कहा: “लखनऊ जिला अदालत में वकीलों के ऐसे समूह हैं जो प्रॉपर्टी डीलिंग और जमीन कब्जाने में शामिल हैं। इस प्रक्रिया में वे अदालती कार्यवाहियों में हेरफेर करते हैं और उन्हें अपने या अपने पास आने वाले मुकदमों के पक्ष में प्रभावित करते हैं। वे विरोधी पक्षों की ओर से वकीलों को पेश होने से रोकने के लिए डराने-धमकाने और कई बार अदालत पर ही प्रभाव डालने का प्रयास करते हैं।”

अदालत ने जोर देकर कहा कि न्यायिक व्यवस्था में जनता का विश्वास बहाल करने के लिए सख्त प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई आवश्यक है: “कड़े शब्दों का समय अब खत्म होता दिखता है, क्योंकि इनका कोई वांछित प्रभाव नहीं पड़ा है। अब पुलिस और उन सभी हितधारकों के लिए कार्रवाई का समय है जो स्थिति में सुधार कर सकते हैं।”

पीठ ने स्पष्ट किया कि वकीलों का यह कृत्य न्यायिक गरिमा का गंभीर उल्लंघन है: “हमारे समक्ष रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों और सामग्रियों से प्रथम दृष्टया घोर पेशेवर कदाचार, कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग, न्यायिक कार्यवाही के सुचारू संचालन में गंभीर हस्तक्षेप और न्याय प्रशासन में बाधा डालने का मामला बनता है, जिसके लिए ये अधिवक्ता जिम्मेदार नजर आते हैं।”

प्रक्रियात्मक नियमों से ऊपर न्याय को प्राथमिकता देते हुए कोर्ट ने कहा: “स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, हम तकनीकी और प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं से बंधे नहीं रहेंगे, क्योंकि हमें यह सुनिश्चित करना है कि लखनऊ जिला अदालत परिसर में अराजकता के बजाय कानून का शासन रहे और अदालतें बिना किसी बाधा या हस्तक्षेप के न्याय दे सकें।”

अदालत के प्रमुख निर्देश

वादकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और न्यायिक कार्यवाही की गरिमा बनाए रखने के लिए हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. अदालत प्रवेश पर रोक: अधिवक्ता सौरभ कुमार वर्मा, हर्षित पांडे, यश पांडे और अभय प्रताप वर्मा के अगली सुनवाई (24 अगस्त 2026) तक लखनऊ जिले के किसी भी कोर्ट परिसर में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
  2. वित्तीय और संपत्ति का प्रकटीकरण: चारों वकीलों को हलफनामा दाखिल कर पिछले 10 वर्षों के इनकम टैक्स रिटर्न की प्रतियां, परिवार के सभी जीवित सदस्यों (माता-पिता, भाई-बहन, जीवनसाथी, बच्चे) का विवरण, और पिछले 5 वर्षों में उनके या उनके परिजनों द्वारा की गई संपत्तियों की खरीद-बिक्री, लीज या उपहार से जुड़ी लेनदेन की पूरी जानकारी देने का आदेश दिया गया है।
  3. लंबित मुकदमों का विवरण: चारों वकीलों को उन सभी दीवानी मुकदमों की जानकारी देनी होगी जिनमें वे स्वयं पक्षकार हैं या वकील के रूप में पैरवी कर रहे हैं।
  4. इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की जांच: केंद्र सरकार के इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के लखनऊ स्थित स्थानीय कार्यालय (जो संयुक्त निदेशक स्तर के अधिकारी के नेतृत्व में है) को इन चारों वकीलों की पृष्ठभूमि और गतिविधियों की गोपनीय जांच कर सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया गया है।
  5. अदालती रिकॉर्ड सील करने का आदेश: लखनऊ के जिला न्यायाधीश को निर्देश दिया गया है कि वे सूट संख्या 1317/2022 और सूट संख्या 2933/2025 के रिकॉर्ड को तुरंत सील करें, जिसे सीनियर रजिस्ट्रार की व्यक्तिगत कस्टडी में सुरक्षित रखा जाएगा।
  6. पीड़ित को सुरक्षा: आजमगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को निर्देश दिया गया है कि वे पीड़ित मोहम्मद शाकिर को आजमगढ़ में अगले आदेश तक पर्याप्त पुलिस सुरक्षा प्रदान करें।
  7. संगठित अपराध की धाराएं: पुलिस अधिकारियों को यह जांचने का निर्देश दिया गया है कि क्या इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 111 (संगठित अपराध) के प्रावधान लागू होते हैं या नहीं।
  8. नए पक्षकारों को शामिल करना: इस मामले में बार काउंसिल ऑफ इंडिया, यूपी बार काउंसिल, केंद्रीय गृह एवं कानून मंत्रालय, यूपी पुलिस महानिदेशक, आयकर विभाग और सेंट्रल बार एसोसिएशन को पक्षकार बनाया गया है।
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इस मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त 2026 को तय की गई है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: सुओ मोटू कॉग्निजेंस ऑफ इंसिडेंट डेटेड 21/07/2026 इन द कोर्ट प्रेमिसेस बनाम स्टेट ऑफ यूपी थ्रू प्रिंसिपल सेक्रेटरी होम लखनऊ
वाद संख्या: क्रिमिनल रिट-पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन संख्या 8/2026
पीठ: जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला
निर्णय की तिथि: 28 जुलाई 2026

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