केरल के पलक्कड़ जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने 25 लाख रुपये से अधिक कीमत की एक ऑटोमेटेड बॉटल-फिलिंग और कैप-सीलिंग मशीन को बदलने का आदेश दिया है। आयोग ने माना कि मशीन में मैन्युफैक्चरिंग दोष नहीं था, लेकिन गलत इंस्टॉलेशन, खराब कैलिब्रेशन, त्रुटिपूर्ण प्रोग्रामिंग और अपर्याप्त आफ्टर-सेल्स सर्विस के कारण मशीन उपयोग के योग्य नहीं रह गई। आयोग ने निर्माता कंपनी को 75,000 रुपये मुआवजा और वाद व्यय भी देने का निर्देश दिया।
यह आदेश 17 जुलाई को पलक्कड़ जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष विनय मेनन वी तथा सदस्य विद्या ए और कृष्णनकुट्टी एन.के. की पीठ ने एसकेएस फूड्स, कंजिकोड (पलक्कड़) द्वारा एर्नाकुलम स्थित अभिलाष इंडस्ट्रीज के खिलाफ दायर शिकायत पर सुनाया।
उद्यमी ने बैंक ऋण लेकर खरीदी थी मशीन
शिकायत के अनुसार, एसकेएस फूड्स की प्रोपराइटर सजिता ई.जी. ने 27 जून 2023 को अभिलाष इंडस्ट्रीज से 25,01,600 रुपये में ऑटोमैटिक फोर-हेड वॉल्यूमेट्रिक बॉटल-फिलिंग मशीन, ऑटोमैटिक स्क्रू-कैप सीलिंग मशीन और अन्य संबंधित उपकरण खरीदे थे। मशीन पर एक वर्ष की वारंटी थी और इसकी खरीद बैंक से वित्तीय सहायता लेकर की गई थी।
शिकायतकर्ता का कहना था कि कंपनी ने आश्वासन दिया था कि मशीन प्रति घंटे 1,000 लीटर कंसन्ट्रेट भर सकेगी, जिससे पांच कर्मचारियों की आवश्यकता कम हो जाएगी। लेकिन मशीन पहले ही दिन से अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी। बोतलों में भराव का स्तर एक समान नहीं था, कई बोतलें ओवरफ्लो हो जाती थीं और कैप ठीक से सील नहीं होती थीं।
इन कमियों के कारण व्यवसाय को भारी आर्थिक नुकसान और मानसिक पीड़ा होने का दावा करते हुए शिकायतकर्ता ने मशीन की कीमत वापस करने, बैंक ब्याज, श्रम व्यय और क्षतिपूर्ति दिलाने की मांग की।
निर्माता कंपनी ने आरोपों से किया इनकार
अभिलाष इंडस्ट्रीज ने शिकायत का विरोध करते हुए कहा कि मशीन व्यावसायिक उद्देश्य से खरीदी गई थी, इसलिए शिकायत सुनवाई योग्य नहीं है।
कंपनी ने यह भी कहा कि मशीन में कोई मैन्युफैक्चरिंग दोष नहीं था। उसके अनुसार, उसने शिकायतकर्ता के ऑपरेटर को प्रशिक्षण दिया था और आवश्यकता पड़ने पर आफ्टर-सेल्स सहायता भी उपलब्ध कराई थी। कंपनी का दावा था कि समस्या शिकायतकर्ता के कर्मचारियों द्वारा मशीन का सही ढंग से संचालन न कर पाने के कारण उत्पन्न हुई और वह वास्तविक तकनीकी समस्याओं को दूर करने के लिए हमेशा तैयार थी।
विशेषज्ञ जांच में सामने आई असली वजह
विवाद की वास्तविक स्थिति जानने के लिए आयोग ने एक विशेषज्ञ आयुक्त नियुक्त किया, जिसने मशीन का परीक्षण किया।
जांच के दौरान 12 बोतलों में से केवल तीन सही तरीके से भरी गईं। छह बोतलें ओवरफ्लो हो गईं, जबकि बाकी बोतलों में निर्धारित मात्रा से कम भराव हुआ। इसके अलावा, कैप-सीलिंग सिस्टम बार-बार जाम होता पाया गया।
विशेषज्ञ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि मशीन में कोई मैन्युफैक्चरिंग दोष नहीं है। समस्याएं गलत इंस्टॉलेशन, त्रुटिपूर्ण प्रोग्रामिंग, खराब कैलिब्रेशन और संबंधित तकनीकी कमियों के कारण उत्पन्न हुईं।
इस रिपोर्ट के आधार पर आयोग ने माना कि निर्माता कंपनी की आफ्टर-सेल्स सर्विस में गंभीर कमी रही, जो उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत सेवा में कमी (Deficiency in Service) है।
आयोग ने मशीन बदलने का दिया आदेश
आयोग ने निर्माता कंपनी की यह आपत्ति भी खारिज कर दी कि मशीन व्यावसायिक उपयोग के लिए खरीदी गई थी, इसलिए शिकायत पर विचार नहीं किया जा सकता।
आयोग ने कहा कि बैंक वित्तीय सहायता से खरीदी गई यह मशीन तीन वर्ष से अधिक समय तक उपयोग में नहीं आ सकी, जिससे शिकायतकर्ता को उस निवेश का अपेक्षित लाभ नहीं मिला।
हालांकि, विशेषज्ञ द्वारा मैन्युफैक्चरिंग दोष से इनकार किए जाने के कारण आयोग ने मशीन की कीमत, बैंक ब्याज और श्रम व्यय लौटाने का आदेश देने से इनकार कर दिया।
इसके बजाय आयोग ने अभिलाष इंडस्ट्रीज को 45 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता को उसी प्रकार की नई मशीन उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। साथ ही कंपनी को सेवा में कमी के लिए 50,000 रुपये मुआवजा और 25,000 रुपये वाद व्यय देने का भी आदेश दिया।
आयोग ने यह भी कहा कि यदि 45 दिनों के भीतर आदेश का पालन नहीं किया गया, तो आदेश की तारीख से अनुपालन होने तक शिकायतकर्ता को प्रति माह या उसके किसी भी हिस्से के लिए 1,000 रुपये सोलैटियम भी दिया जाएगा।
आयोग ने अपने आदेश में कहा, “जब कोई शिकायतकर्ता अपने व्यवसाय को बेहतर बनाने के उद्देश्य से वित्तीय सहायता लेकर मशीन खरीदता है, तो वह अपने जीवन स्तर में सुधार की बड़ी अपेक्षा रखता है। लेकिन इस मामले में शिकायतकर्ता को केवल कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।”

