इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश की निचली अदालतों में पुलिस फाइनल रिपोर्ट (अंतिम रिपोर्ट) के निपटारे में हो रही अत्यधिक देरी पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए राज्य के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों से विस्तृत रिपोर्ट और एक्शन प्लान तलब किया है। जस्टिस तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने टिप्पणी की कि फाइनल रिपोर्ट को वर्षों तक लंबित रखना आपराधिक न्याय प्रणाली के संचालन को गंभीर रूप से प्रभावित करता है और इससे पक्षों को अनावश्यक परेशानी झेलनी पड़ती है।
मामले की पृष्ठभूमि
हाईकोर्ट का यह आदेश असित वर्मा और एक अन्य व्यक्ति द्वारा धारा 483 सीआरपीसी / धारा 529 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत दाखिल आवेदन पर सुनवाई करते हुए आया। याचिकाकर्ताओं ने लखनऊ के गोसाईंगंज थाने में दर्ज केस अपराध संख्या 611/2019 (भारतीय दंड संहिता की धारा 409, 467, 468, 471, 504 और 506) से उत्पन्न आपराधिक मामले (केस संख्या 4917/2023 – माया गुप्ता बनाम सौमिल व अन्य) की कार्यवाही में तेजी लाने की मांग की थी। इस मामले में पुलिस ने 11 जुलाई 2020 को ही ट्रायल कोर्ट के समक्ष फाइनल रिपोर्ट पेश कर दी थी, लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी उस पर अंतिम आदेश पारित नहीं किया गया था।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं के वकील श्री श्रीत राज जायसवाल ने श्री आकाश वर्मा के सहयोग से अदालत में तर्क दिया कि 11 जुलाई 2020 को फाइनल रिपोर्ट जमा होने और शिकायतकर्ता को नोटिस जारी किए जाने के बाद भी ट्रायल कोर्ट ने कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता कारोबारी हैं और उन्हें व्यापार के सिलसिले में अक्सर विदेश यात्रा करनी पड़ती है। हालांकि, मुकदमा लंबित होने के कारण उनके पासपोर्ट के नवीनीकरण में कठिनाई आ रही है।
वकील ने यह भी जानकारी दी कि इससे पहले भी याचिकाकर्ताओं ने धारा 528 बीएनएसएस के तहत हाईकोर्ट में याचिका (असित वर्मा बनाम यूपी राज्य, धारा 528 बीएनएसएस संख्या 87/2026) दाखिल की थी। उस मामले में हाईकोर्ट ने 10 फरवरी 2026 को निचली अदालत को एक सप्ताह के भीतर इस मामले का निस्तारण करने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से गुहार लगाई कि संबंधित अदालत को उनके खिलाफ लंबित फाइनल रिपोर्ट पर जल्द से जल्द अंतिम आदेश पारित करने का निर्देश दिया जाए। राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) ने किया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और मुख्य टिप्पणियां
अदालतों में मुकदमों के बैकलाग का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि केवल लखनऊ जजशिप में ही लगभग 50,000 फाइनल रिपोर्ट निस्तारण के इंतजार में पड़ी हैं। कोर्ट ने इसे एक गंभीर चिंता का विषय और प्रणालीगत विफलता करार दिया।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
“यह अत्यंत चिंता का विषय है कि जिला स्तर की अदालतों में प्रस्तुत अंतिम रिपोर्टों को लंबे समय से लंबित रखा जा रहा है। केवल एक ही जजशिप यानी लखनऊ जजशिप में लगभग 50,000 मामले अंतिम रिपोर्ट के निस्तारण के लिए लंबित हैं।”
“कानून के प्रावधानों के अनुसार, अंतिम रिपोर्ट दाखिल होने पर शिकायतकर्ता को नोटिस जारी किया जाना अनिवार्य है। लेकिन शिकायतकर्ता/सूचनाकर्ता को नोटिस की तामील न होने के कारण होने वाली देरी समझ से परे है, क्योंकि इसका अंतिम नुकसान अभियुक्त को ही उठाना पड़ता है, जिसके संबंध में अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई है।”
“इस अदालत के संज्ञान में लाया गया है कि इस तरह के मामले प्रदेश के लगभग सभी जिलों में लंबित हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पक्षकारों की ओर से कोई गलती न होने के बावजूद, केवल पीठासीन अधिकारियों की उदासीनता के कारण अंतिम रिपोर्ट वर्षों तक लंबित रहती हैं। एक बार जब अदालत के समक्ष अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी जाती है, तो संबंधित पीठासीन अधिकारी ही इसके लिए पहला और सबसे जिम्मेदार अधिकारी होता है। दुर्भाग्य से, यह वह क्षेत्र है जहां प्रणाली समय पर परिणाम देने में विफल रही है। यह समझा जा सकता है कि विवादित मुकदमों का फैसला जल्दबाजी में नहीं किया जा सकता, लेकिन जहां जांच पूरी होने के बाद अंतिम रिपोर्ट दाखिल की जा चुकी है, उन्हें इतने लंबे समय तक लंबित कैसे रखा जा सकता है।”
“इस अदालत का मानना है कि अनिश्चित काल के लिए अंतिम रिपोर्टों का लंबा लंबित रहना न्याय के हित में नहीं है, क्योंकि यह आपराधिक प्रक्रिया को धीमा करता है और पक्षकारों को अनावश्यक परेशान करता है। इसलिए, इस तरह के लंबित मामलों पर तत्काल ध्यान देने और इनके शीघ्र निस्तारण के लिए प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है।”
“यह स्पष्ट है कि न तो दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 और न ही भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में आपराधिक अदालतों के समक्ष लंबित अंतिम रिपोर्टों के निस्तारण के लिए कोई निश्चित समय सीमा निर्धारित की गई है। हालांकि, अंतिम रिपोर्टों के अत्यधिक और लंबे समय तक लंबित रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह आपराधिक न्याय प्रशासन को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है और संबंधित पक्षों की अनिश्चितता को बेवजह बढ़ाता है।”
हाईकोर्ट का फैसला और निर्देश
धारा 483 सीआरपीसी / धारा 529 बीएनएसएस के तहत अपने पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल / सीनियर रजिस्ट्रार के माध्यम से उत्तर प्रदेश के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को प्रशासनिक निर्देश जारी किए। जिला जजों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने प्रशासनिक नियंत्रण वाली अदालतों में लंबित फाइनल रिपोर्टों की समय-समय पर समीक्षा करें और काफी समय से लंबित मामलों को, विशेषकर जहां शिकायतकर्ता को नोटिस जारी हो चुका है, प्राथमिकता के आधार पर निपटाएं। साथ ही, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों (सीजेएम) और अन्य मजिस्ट्रेटों को भी इन मामलों का शीघ्र निस्तारण सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।
इसके अलावा, हाईकोर्ट ने राज्यभर के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों से चार विशिष्ट बिंदुओं पर रिपोर्ट मांगी है:
- उनके जिले में (अदालतवार) कितनी अंतिम रिपोर्टें लंबित हैं;
- लंबित अंतिम रिपोर्टों पर कोई आदेश पारित न करने के क्या कारण हैं;
- आपराधिक मामलों में लंबित अंतिम रिपोर्टों के निस्तारण के संबंध में संबंधित जिला एवं सत्र न्यायाधीशों द्वारा क्या कार्रवाई की गई है;
- लंबित अंतिम रिपोर्टों के निस्तारण के लिए जिला एवं सत्र न्यायाधीशों द्वारा क्या कार्रवाई योजना/प्रस्तावित योजना तैयार की गई या अपनाई गई है।
हाईकोर्ट ने प्रदेशभर से मिलने वाली संकलित रिपोर्टों के साथ इस मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त 2026 को तय की है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: असित वर्मा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, मुख्य सचिव गृह विभाग, लखनऊ व अन्य
वाद संख्या: एप्लीकेशन यू/एस 529 बी.एन.एस.एस. संख्या 605/2026
पीठ: जस्टिस तेज प्रताप तिवारी
निर्णय की तिथि: 21 जुलाई 2026

