धारा 302 IPC का अलग से आरोप तय न होने से सजा रद्द नहीं होगी यदि आरोपी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़ा हो: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत अलग से (सिम्पलिसिटर) आरोप तय न किए जाने मात्र से आरोपी की सजा रद्द नहीं होती, बशर्ते आरोपी को अपने खिलाफ लगे विशिष्ट अपराध की स्पष्ट जानकारी रही हो और मुकदमे की सुनवाई के दौरान उस पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़ा हो। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की डिवीजन बेंच ने मिर्जापुर में 1988 के जमीन विवाद से जुड़ी हिंसा के मामले में सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया। कोर्ट ने एक अपीलकर्ता की हत्या की सजा और आजीवन कारावास तथा तीन अन्य जीवित अपीलकर्ताओं की हत्या के प्रयास और दंगे के आरोपों में सजा को बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 24 अक्टूबर 1988 का है, जब सुबह करीब 7:30 बजे मिर्जापुर जिले के चितावनपुर गांव में घटना घटी। शिकायतकर्ता फखरूद्दीन (PW-1) द्वारा दर्ज कराई गई लिखित रिपोर्ट के अनुसार, उनके नाना जासिम खान (PW-3) और अकीलु (PW-2) ट्रैक्टर से प्लॉट नंबर 1387 जोत रहे थे। तभी आरोपी बाबू खान मौके पर पहुंचा और खेत जोतने का विरोध करने लगा। कहासुनी के बाद बाबू खान बंदूक लाने की धमकी देते हुए अपने घर की ओर भागा।

थोड़ी ही देर में बाबू खान 17 अन्य लोगों के साथ बंदूक, कट्टा और बल्लम (भाला) लेकर लौट आया। बाबू खान के उकसाने पर पूरे गिरोह ने जासिम खान, अकीलु, रहीमउद्दीन, करीमउद्दीन, हकीमउद्दीन और हसनैन पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं। अकीलु ने ट्रैक्टर के पीछे छिपकर अपनी जान बचाई, जबकि अन्य लोग गोली लगने से घायल हो गए।

हंगामा सुनकर बदरुद्दीन, शरीफ खान, अशरफ उर्फ गुड्डू और फखरूद्दीन मौके की तरफ दौड़े। हमलावरों ने उन्हें ललकारा और गोलियों की बौछार कर दी, जिससे ये चारों भी घायल हो गए। बदरुद्दीन ने अस्पताल ले जाते समय रास्ते में दम तोड़ दिया।

पुलिस स्टेशन कोतवाली देहात में 18 नामजद आरोपियों के खिलाफ धारा 147, 148, 149, 302 और 307 IPC के तहत एफआईआर दर्ज की गई। जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट दाखिल की गई और मामला सेशन कोर्ट भेजा गया।

24 सितंबर 1993 को द्वितीय अपर सेशन जज, मिर्जापुर ने आठ आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने सात आरोपियों—बाबू खान, जाफरू खान, नजरू खान, मलिक खान, सईद खान, रुस्तम खान और इर्शाद खान—को धारा 302 सहपठित धारा 149 IPC के आरोप से बरी कर दिया, लेकिन धारा 147, 148 और 307 सहपठित धारा 149 IPC के तहत दोषी ठहराते हुए चार-चार साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। वहीं, आरोपी हाशिम खान को धारा 302 IPC (सिम्पलिसिटर) के तहत दोषी ठहराकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई, साथ ही धारा 147, 148, 307 और 149 IPC में भी सजा दी।

सभी आठ दोषियों ने 1993 में हाईकोर्ट में अपील दायर की। अपील लंबित रहने के दौरान चार अपीलकर्ताओं—बाबू खान, सईद खान, जाफरू खान और नजरू खान—का निधन हो गया, जिससे उनके संबंध में अपील समाप्त हो गई। इसके बाद सुनवाई केवल चार जीवित अपीलकर्ताओं: मलिक खान, इर्शाद खान, रुस्तम खान और हाशिम खान की ओर से आगे बढ़ी।

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पक्षों की दलीलें

जीवित अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि हाशिम खान को धारा 302 IPC के तहत स्वतंत्र रूप से दोषी ठहराया गया है, जबकि उसके खिलाफ अलग से धारा 302 का आरोप तय ही नहीं किया गया था; आरोप केवल धारा 302 सहपठित धारा 149 IPC के तहत बनाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले सूरज पाल बनाम यूपी राज्य (AIR 1955 SC 419) का हवाला देते हुए वकील ने कहा कि विशिष्ट आरोप के अभाव में सजा अमान्य हो जाती है और इससे गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

अपीलकर्ताओं ने यह भी कहा कि जिन साक्ष्यों (PW-1, PW-2 और PW-3 के बयान) के आधार पर आठ सह-आरोपियों को बरी किया गया, उन्हीं साक्ष्यों पर इन्हें दोषी ठहराया गया। जावेद शौकत अली कुरैशी बनाम गुजरात राज्य ((2023) 9 SCC 164) का हवाला देते हुए समानता के आधार पर बरी करने की मांग की गई। इसके अलावा, शरद बिरधी चंद शारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य ((1984) 4 SCC 116) का हवाला देते हुए कहा गया कि घायलों के धारा 164 CrPC के गैर-साबित बयानों को धारा 313 CrPC के तहत आरोपियों के समक्ष नहीं रखा गया, फिर भी ट्रायल कोर्ट ने उन पर भरोसा किया।

दूसरी तरफ, राज्य के अपर शासकीय अधिवक्ता (AGA) और शिकायतकर्ता के वकील ने कहा कि अभियोजन का मामला PW-1, PW-2 और घायल गवाह PW-3 के प्रत्यक्ष बयानों पर आधारित है। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मौखिक साक्ष्यों पर भरोसा किया और धारा 164 CrPC के बयानों का उल्लेख केवल इसलिए किया क्योंकि बचाव पक्ष ने स्वयं गवाहों से उस पर जिरह की थी। उन्होंने कहा कि धारा 302 IPC का अलग से आरोप तय न होने से सजा खारिज नहीं होती यदि आरोपी को कोई नुकसान न पहुंचा हो, और कुछ आरोपियों के बरी होने से उन लोगों की सजा नहीं रुकती जिनकी विशिष्ट भूमिका साबित हुई है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं द्वारा उठाए गए कानूनी मुद्दों का गहन विश्लेषण किया।

1. धारा 302 IPC के तहत बिना अलग आरोप के सजा पर

हाशिम खान के खिलाफ धारा 302 IPC का अलग से आरोप तय न होने के संबंध में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ के फैसले विली (विलियम) स्लेनी बनाम मध्य प्रदेश राज्य ((1955) 2 SCC 340) का विश्लेषण किया। हाईकोर्ट ने ध्यान दिलाया कि प्रक्रियात्मक गलतियों या आरोप तय करने में हुई कमियों से तब तक ट्रायल अमान्य नहीं होता जब तक कि गंभीर प्रतिकूल प्रभाव या न्याय की विफलता न हुई हो।

विली स्लेनी मामले के मुख्य सिद्धांत को रेखांकित करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“यदि किसी अभियुक्त को प्राकृतिक न्याय और स्थापित सिद्धांतों के अनुसार पूर्ण और निष्पक्ष सुनवाई का अवसर मिलता है, यदि उस पर एक सक्षम अदालत द्वारा मुकदमा चलाया जाता है, यदि उसे उस अपराध की प्रकृति स्पष्ट रूप से बताई और समझाई जाती है जिसके लिए उस पर मुकदमा चल रहा है, यदि उसके खिलाफ मामला पूरी तरह और निष्पक्ष रूप से समझाया जाता है और उसे अपना बचाव करने का पूरा व निष्पक्ष अवसर दिया जाता है, तो कानून के बाहरी रूप का सारतः पालन होने की स्थिति में प्रक्रिया की मामूली भूलों, निरर्थक त्रुटियों और चूक को दंड प्रक्रिया संहिता द्वारा क्षम्य माना जाता है और जब तक अभियुक्त यह साबित न कर दे कि उस पर कोई गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, तब तक मुकदमा दूषित नहीं होता।”

इस सिद्धांत को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि हाशिम खान को पूरे मुकदमे के दौरान स्पष्ट रूप से पता था कि उस पर बंदूक रखने और बदरुद्दीन की हत्या करने वाली गोली चलाने का विशिष्ट आरोप है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पुष्टि हुई कि बदरुद्दीन को कई जानलेवा गोलियां लगी थीं, जिससे उसके फेफड़े, दिल और लीवर में छेद हो गए थे। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाशिम खान पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा, और माना कि भले ही औपचारिक आरोप धारा 302/149 IPC के तहत हो, धारा 302 IPC (सिम्पलिसिटर) के तहत सजा कानूनी रूप से वैध है।

2. समानता और सह-आरोपियों के बरी होने पर

समानता के आधार पर बरी करने की मांग पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की पीठ के फैसलों गुरचरण सिंह बनाम पंजाब राज्य ((1955) 2 SCC 424) और निसार अली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य ((1957) 1 SCC 350) का संदर्भ दिया।

कोर्ट ने दोहराया कि falsus in uno, falsus in omnibus का नियम भारत में साक्ष्य का अनिवार्य नियम नहीं है, बल्कि केवल एक सावधानी का नियम है। हाईकोर्ट ने कहा:

“अभियोजन पक्ष के गवाहों के साक्ष्य का वह हिस्सा जो विश्वसनीय और भरोसेमंद पाया जाता है, उसे साक्ष्य में पढ़ा जाएगा। ऐसे विश्वसनीय और भरोसेमंद अभियोजन साक्ष्य के आलोक में अभियुक्तों को कानूनी रूप से दोषी ठहराया जा सकता है।”

कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने घटना में शामिल न होने वाले आरोपियों और हथियार चलाकर गोलीबारी करने वाले सक्रिय हमलावरों के बीच सही अंतर किया था।

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3. धारा 164 CrPC और धारा 313 CrPC के बयानों पर

हाईकोर्ट ने मकसूदन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (AIR 1983 SC 126) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज धारा 164 CrPC का बयान, यदि व्यक्ति जीवित बच जाता है, तो उसे साक्ष्य अधिनियम की धारा 32 के तहत मृत्युकालिक कथन नहीं माना जा सकता। हालांकि, इसका उपयोग धारा 155 और 157 के तहत पुष्टि या खंडन के लिए किया जा सकता है। चूंकि बचाव पक्ष ने खुद PW-3 से 164 के बयान पर जिरह की थी, इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा उस पर विचार करना उचित था।

धारा 313 CrPC के तहत बयान दर्ज करने पर कोर्ट ने वसीम खान बनाम यूपी राज्य (AIR 1956 SC 400) और भूर सिंह बनाम पंजाब राज्य ((1974) 4 SCC 754) का हवाला दिया और माना कि मामूली कमियों से मुकदमा रद्द नहीं होता जब तक कि वास्तविक नुकसान न हुआ हो। प्रश्न संख्या 18 के तहत परिस्थितियों को आरोपी के सामने रखा गया था।

4. प्रत्यक्ष साक्ष्य बनाम परिस्थितिजन्य साक्ष्य

हाईकोर्ट ने शरद बिरधी चंद शारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य ((1984) 4 SCC 116) के फैसले को अलग बताते हुए कहा कि वह मामला परिस्थितियों पर आधारित था, जबकि वर्तमान मामला प्रत्यक्ष प्रत्यक्षदर्शियों (PW-1, PW-2 और घायल PW-3) के बयानों पर टिका है।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ने सुसंगत चश्मदीद बयानों और चिकित्सीय साक्ष्यों के जरिए अपना मामला संदेह से परे साबित किया है। ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई अवैधता न पाते हुए हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 1993 के दोषसिद्धि और सजा के आदेश को बरकरार रखा।

जीवित अपीलकर्ताओं—मलिक खान, इर्शाद खान, रुस्तम खान और हाशिम खान—की आपराधिक अपील खारिज कर दी गई। उनके जमानत बांड रद्द कर दिए गए। जीवित अपीलकर्ताओं को एक महीने के भीतर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मिर्जापुर के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया। यदि वे आत्मसमर्पण नहीं करते हैं, तो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मिर्जापुर को उनकी गिरफ्तारी के लिए गैर-जमानती वारंट जारी करने का आदेश दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: बाबू खान और 7 अन्य बनाम यूपी राज्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 1696/1993
पीठ: जस्टिस सिद्धार्थ, जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी
निर्णय की तिथि: 24 जुलाई 2026

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