कर्नाटक हाईकोर्ट ने कर्नाटक लोक सेवा आयोग (केपीएससी) के निलंबित अध्यक्ष शिवशंकरप्पा एस साहुकार की बेटी सुमा एस साहुकार के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने 3बी आरक्षण श्रेणी का लाभ लेने के लिए कथित तौर पर गलत आय प्रमाण पत्र जमा करने को प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी और असली जरूरतमंद उम्मीदवारों का हक मारने वाला कृत्य करार दिया।
वार्षिक आय में भारी अंतर पर हाईकोर्ट सख्त
जस्टिस एम नागप्रसन्ना की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान सख्त मौखिक टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि जिस उम्मीदवार के परिवार की वास्तविक वार्षिक आय लगभग 30 लाख रुपये हो, उसका खुद को 40 हजार रुपये सालाना आय वाला बताकर आरक्षण का दावा करना सरासर धोखा है।
पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से सवाल किया कि क्या यह आंखों में धूल झोंकने जैसा नहीं है। अदालत ने कहा कि इस तरह गलत दस्तावेज जमा करके उस गरीब उम्मीदवार का अवसर छीना गया है जिसकी वास्तविक आय 40 हजार रुपये या उससे कम रही होगी।
क्या है पूरा मामला
यह मामला मार्च 2024 का है, जब सुमा साहुकार ने केपीएससी के माध्यम से उद्योग एवं वाणिज्य विभाग में जूनियर इंजीनियर (सिविल) पद के लिए आवेदन किया था। उन्होंने 3बी श्रेणी के तहत आरक्षण का दावा किया था, जो उन परिवारों के लिए निर्धारित है जिनकी कुल वार्षिक आय 8 लाख रुपये से कम होती है।
दस्तावेजों के सत्यापन के दौरान सामने आया कि सुमा ने अपने परिवार की आय केवल 40,000 रुपये वार्षिक दर्शाई थी। जबकि उनके पिता सितंबर 2019 से केपीएससी के सदस्य के रूप में लगभग 2.05 लाख रुपये प्रतिमाह मूल वेतन ले रहे थे और अप्रैल 2021 से 2.25 लाख रुपये प्रतिमाह मूल वेतन व भत्तों के साथ आयोग के अध्यक्ष पद पर कार्यरत थे। इस आधार पर उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की जालसाजी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और उनका असली के रूप में इस्तेमाल करने से जुड़ी धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
बचाव पक्ष की दलीलें खारिज, याचिका वापस ली
सुनवाई के दौरान सुमा के वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण श्याम ने तर्क दिया कि कर्नाटक राज्य आरक्षण नियमों के तहत किसी प्रारंभिक जांच या सत्यापन के बिना ही सीधे प्राथमिकी दर्ज कर ली गई। उन्होंने यह भी सफाई दी कि याचिकाकर्ता ने गलती से परिवार की आय के बजाय केवल अपनी व्यक्तिगत आय घोषित कर दी थी।
अदालत ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि जब तथ्यों में कोई अस्पष्टता नहीं है और आवेदक के पिता खुद 2.17 लाख रुपये प्रतिमाह वेतन ले रहे थे, तब किसी अलग जांच की जरूरत नहीं रह जाती। पीठ ने कहा कि सरकारी सेवा में आने के इच्छुक उम्मीदवारों से बुनियादी पात्रता नियमों की समझ की उम्मीद की जाती है और यह पूरी तरह से एक स्पष्ट मामला है।
विशेष सार्वजनिक अभियोजक बी एन जगदीशा के इस बयान के बाद कि याचिकाकर्ता किसी वंचित समुदाय से नहीं हैं और वे ऐसे संरक्षण की हकदार नहीं हैं, बचाव पक्ष ने याचिका वापस लेने का अनुरोध किया। अदालत ने प्राथमिकी को चुनौती देने की छूट देते हुए याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।
अग्रिम जमानत और पिता की याचिका
उल्लेखनीय है कि बेंगलुरु की एक सत्र अदालत ने हाल ही में सुमा साहुकार को इस मामले में अग्रिम जमानत दी थी। वहीं दूसरी ओर, उनके पिता शिवशंकरप्पा एस साहुकार ने अपने निलंबन आदेश को चुनौती देते हुए अलग से कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

