PIL में जिस व्यक्ति पर लगाए आरोप, बाद में उसी का केस नहीं लड़ सकता वकील; BCI करे पेशेवर कदाचार की जांच: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया है कि जनहित याचिका (PIL) में किसी व्यक्ति को पक्षकार बनाकर उसके खिलाफ आरोप लगाने वाला अधिवक्ता बाद में उसी व्यक्ति का केस अदालत में लड़ने के लिए स्वीकार नहीं कर सकता। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा आचरण पेशेवर कदाचार (प्रोफेशनल मिसकंडक्ट) की श्रेणी में आता है या नहीं, यह भारतीय बार काउंसिल (बीसीआई) द्वारा जांच का विषय है। इसके साथ ही, मध्य प्रदेश निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग में नियुक्तियों को चुनौती देने और भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वाली तीनों जनहित याचिकाओं को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता पर प्रत्येक याचिका में 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया।

मामले का पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता अनिल सिंह, जो एक अभ्यास करने वाले अधिवक्ता हैं और स्वयं को एलएल.एम. का छात्र बताते हैं, ने मध्य प्रदेश निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग के अधिकारियों की नियुक्ति को चुनौती देते हुए और पद के दुरुपयोग व सरकारी धन के गबन के आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में तीन अलग-अलग जनहित याचिकाएं दायर की थीं—26 मार्च 2025 को रिट याचिका संख्या 11341/2025, 20 मई 2025 को रिट याचिका संख्या 18974/2025 और 25 जून 2025 को रिट याचिका संख्या 24052/2025।

इन याचिकाओं में आयोग में हुई नियुक्तियों पर सवाल उठाए गए थे तथा वाहन भत्ता भुगतान में अनियमितताओं सहित भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए थे। याचिकाओं को दायर करने से पहले याचिकाकर्ता ने लोकायुक्त में भी एक विस्तृत शिकायत दर्ज कराई थी, जिसकी जांच कर सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसे पहले ही समाप्त कर दिया गया था।

याचिकाकर्ता की मांग और राज्य सरकार की दलीलें

याचिकाकर्ता ने अदालत से इन कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच और आपराधिक कार्रवाई की मांग की थी। रिट याचिका संख्या 11341/2025 में याचिकाकर्ता ने प्रार्थना की थी: “मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, चूंकि 1 लाख से अधिक छात्रों का भविष्य दांव पर है, इसलिए यह अदालत उच्च अधिकारियों यानी प्रमुख सचिव, उच्च शिक्षा विभाग और अन्य सक्षम प्राधिकारी को निष्पक्ष जांच करने तथा जल्द से जल्द रिपोर्ट सौंपने का निर्देश देने की कृपा करे।”

अन्य दो याचिकाओं (संख्या 18974/2025 और 24052/2025) में याचिकाकर्ता ने संगठित अपराध और गंभीर अनियमितताओं का दावा करते हुए लोकायुक्त, सीबीआई या पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने, वाहन भत्ते के रिकॉर्ड जब्त करने और गबन की गई राशि की वसूली का निर्देश देने का अनुरोध किया था।

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सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश सरकारी अधिवक्ता डॉ. एस. एस. चौहान ने अदालत के ध्यान में लाया कि 25 मार्च 2026 को याचिकाकर्ता अनिल सिंह ने डॉ. विश्वास कुमार चौहान की ओर से एक वकील के रूप में दो अन्य रिट याचिकाएं (संख्या 11220/2026 और 8260/2026) दायर की थीं, जिनमें डॉ. विश्वास कुमार चौहान के खिलाफ जारी वसूली आदेशों को चुनौती दी गई थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के आचरण का मूल्यांकन किया, जिसने पहले एक व्यक्ति को अपनी जनहित याचिका में आरोपी/प्रतिवादी बनाया और बाद में उसी व्यक्ति का वकील बनकर याचिकाएं दायर कीं। इस परस्पर विरोधी आचरण पर टिप्पणी करते हुए बेंच ने कहा: “यह भारतीय बार काउंसिल (बीसीआई) द्वारा जांच का विषय है कि क्या यह पेशेवर कदाचार की श्रेणी में आता है या नहीं।”

अदालत ने यह भी माना कि जनहित याचिकाओं में इस्तेमाल की गई जानकारी याचिकाकर्ता को उसके मुवक्किल से ही मिली प्रतीत होती है। बेंच ने टिप्पणी की: “चूंकि याचिकाकर्ता ने प्रतिवादियों में से एक यानी डॉ. विश्वास चौहान की ओर से याचिकाएं दायर की हैं, जो बाद की रिट याचिकाओं में उनके मुवक्किल हैं, इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि इन जनहित याचिकाओं में उल्लिखित सभी जानकारी और तथ्य उन्हीं से एकत्र किए गए थे, जिसे रिट याचिका के मेमो के पैरा 4 में छिपाया गया है।”

सक्षम प्राधिकारी द्वारा शिकायतें बंद किए जाने के बाद पीआईएल की पोषणीयता (मेंटेनेबिलिटी) पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब सक्षम अथॉरिटी किसी मामले की जांच करके उसे बंद कर चुकी हो, तो उसके बाद जनहित याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता।

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इसके अलावा, अदालत ने उल्लेख किया कि संबंधित प्रतिवादियों की नियुक्तियां वर्ष 2020 में हुई थीं, वे पिछले 25 वर्षों से सेवा में थे और अपने करियर के अंतिम पड़ाव पर थे। साथ ही, 4 नवंबर 2025 की अधिसूचना के माध्यम से नए अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति भी की जा चुकी है।

हाईकोर्ट का निर्णय

याचिकाओं में कोई मेरिट न पाते हुए डिवीजन बेंच ने तीनों जनहित याचिकाओं को खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता पर प्रत्येक याचिका के लिए 25,000 रुपये (कुल 75,000 रुपये) का जुर्माना लगाया।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: अनिल सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 11341/2025 (साथ में रिट याचिका संख्या 18974/2025 और 24052/2025)
पीठ: जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल
निर्णय की तिथि: 16 जुलाई 2026

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