अमृतसर के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक डॉक्टर के क्रेडिट कार्ड खाते की गलत जानकारी सिबिल (CIBIL) में रिपोर्ट करने के मामले में आईसीआईसीआई बैंक (ICICI Bank) को सेवा में लापरवाही का दोषी पाया है। आयोग ने बैंक को पीड़ित डॉक्टर को कुल 12,500 रुपये का मुआवजा देने, क्रेडिट रिपोर्ट में सुधार करने और अनापत्ति प्रमाण पत्र (नो-ड्यूज सर्टिफिकेट) जारी करने का आदेश दिया है।
अध्यक्ष चरणजीत सिंह और सदस्य निधि वर्मा व वीपीएस सैनी की पीठ ने 25 जून को दिए अपने आदेश में कहा कि वित्तीय संस्थानों द्वारा क्रेडिट ब्यूरो को दी जाने वाली गलत जानकारी से उपभोक्ता की साख और पेशेवर प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचता है। आयोग के अनुसार, क्रेडिट रिपोर्ट में गलत प्रतिकूल प्रविष्टि होने से उपभोक्ता को न केवल मानसिक उत्पीड़न और असुविधा का सामना करना पड़ता है, बल्कि उसकी वित्तीय विश्वसनीयता पर भी विपरीत असर पड़ता है।
क्या था पूरा मामला
मामले की शुरुआत एक चिकित्सक द्वारा दायर शिकायत से हुई, जिनका प्रतिनिधित्व अधिवक्ता मुस्कान भाटिया ने किया। शिकायतकर्ता के पास आईसीआईसीआई बैंक का एक क्रेडिट कार्ड था। उनका आरोप था कि बैंक ने उनके खाते पर अत्यधिक ब्याज और बिना पूर्व सूचना के छिपे हुए शुल्क लगा दिए। उन्होंने कई बार बैंक से अत्यधिक ब्याज दर और अतिरिक्त शुल्कों को हटाने का अनुरोध किया, लेकिन बैंक ने उनकी बात नहीं सुनी।
अपनी सामाजिक और पेशेवर प्रतिष्ठा को बचाने के लिए डॉक्टर ने बैंक द्वारा मांगे गए पूरे बकाए का भुगतान कर दिया, जिसमें विवादित ब्याज और अन्य सभी शुल्क शामिल थे। इसके बावजूद, 29 मई 2020 के सिबिल स्टेटमेंट में उनके खाते की स्थिति को “राइट ऑफ/सैटल्ड” (बट्टे खाते में डाला गया/निपटाया गया) दर्शाया गया, जिससे उनकी पेशेवर और सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।
बैंक और सिबिल का पक्ष
बैंक की ओर से पेश अधिवक्ता प्रदीप अरोड़ा ने दलील दी कि शिकायत में लगाए गए आरोप अस्पष्ट थे, क्योंकि उसमें क्रेडिट कार्ड नंबर या अत्यधिक ब्याज से जुड़ी प्रविष्टियों का ब्योरा नहीं दिया गया था। बैंक ने जानबूझकर गलत जानकारी भेजने से इनकार करते हुए कहा कि सिबिल में क्रेडिट प्रविष्टियां स्वचालित रूप से सिस्टम के माध्यम से दर्ज होती हैं। बैंक ने यह भी दावा किया कि शिकायत दर्ज होने के बाद उन्होंने डॉक्टर से संपर्क कर कार्ड नंबर प्राप्त किया और सिबिल में प्रविष्टि को ठीक करवा दिया था, इसलिए अब इस शिकायत को खारिज कर दिया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, क्रेडिट इंफॉर्मेशन ब्यूरो (इंडिया) लिमिटेड (सिबिल) की ओर से उपस्थित अधिवक्ता एसके व्यास ने तर्क दिया कि एक पंजीकृत क्रेडिट सूचना कंपनी होने के नाते आयोग के पास उनके खिलाफ सुनवाई का अधिकार क्षेत्र नहीं है और बैंकों द्वारा प्रदान किए गए डेटा के लिए ब्यूरो को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।
आयोग का निर्णय और निर्देश
आयोग ने सिबिल की दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि ब्यूरो केवल बैंकों द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी को प्रदर्शित करता है और बैंक की पुष्टि के बिना अपने स्तर पर कोई बदलाव नहीं कर सकता। विवाद की जानकारी मिलने पर सिबिल ने सत्यापन प्रक्रिया शुरू कर दी थी, इसलिए ब्यूरो की ओर से जानबूझकर की गई किसी लापरवाही का मामला नहीं बनता।
आयोग ने आईसीआईसीआई बैंक को निर्देश दिया कि वह एक महीने के भीतर शिकायतकर्ता के सिबिल रिकॉर्ड में सुधार सुनिश्चित करे, विवादित खाते से संबंधित सभी प्रतिकूल प्रविष्टियां हटाए और यदि अभी तक जारी न किया गया हो तो नो-ड्यूज सर्टिफिकेट प्रदान करे। इसके साथ ही, बैंक को मानसिक उत्पीड़न के एवज में 7,500 रुपये और कानूनी खर्च के रूप में 5,000 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया गया है। निर्धारित एक महीने की समय सीमा में अनुपालन न करने की स्थिति में बैंक को शिकायत दर्ज होने की तिथि से राशि की वसूली तक 9 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज देना होगा।

