रूपनगर (रोपड़) जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने मोहाली के एक रिहायशी प्रोजेक्ट में 3BHK फ्लैट का कब्जा देने में लगभग एक दशक की देरी करने पर डेवलपर फर्म डब्ल्यूडब्ल्यूआइसीएस एस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड को कड़ा आदेश सुनाया है। आयोग ने बिल्डर को निर्देश दिया है कि वह खरीदार को सभी तय सुविधाओं और कानूनी मंजूरियों के साथ फ्लैट सौंपे, अन्यथा 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 44.62 लाख रुपये की पूरी रकम वापस करे।
अध्यक्ष कुलजीत पाल सिंह तथा सदस्य रणवीर कौर और रमेश कुमार गुप्ता की तीन सदस्यीय पीठ ने 7 जुलाई को यह फैसला सुनाया। इसके साथ ही उपभोक्ता को हुई मानसिक प्रताड़ना और कानूनी खर्च की भरपाई के लिए बिल्डर पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। आयोग ने माना कि सरकारी मंजूरियां हासिल करने में हुई सात साल की देरी का बिल्डर के पास कोई वाजिब कारण नहीं था।
7 साल तक मंजूरी न मिलने पर आयोग की सख्ती
सुनवाई के दौरान उपभोक्ता आयोग ने स्पष्ट किया कि आवश्यक प्रमाण पत्रों के बिना किसी घर खरीदार को कब्जा देना वैधानिक नियमों का सीधा उल्लंघन है। आयोग के अनुसार, शिकायतकर्ता ने समय पर कब्जा मिलने की उम्मीद में अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा जमा कराया था, इसलिए बिल्डर की यह कानूनी जिम्मेदारी बनती है कि वह तय समय सीमा के भीतर कानूनी रूप से पूर्ण फ्लैट सौंपे।
2012 में बुकिंग और 2015 की डेडलाइन
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, खरीदार ने वर्ष 2012 में मोहाली स्थित इस प्रोजेक्ट में तीन बेडरूम का फ्लैट बुक कराया था। समझौते की शर्तों के तहत ग्रेज पीरियड मिलाकर अगस्त 2015 तक कब्जा मिल जाना चाहिए था। खरीदार मई 2017 तक कुल कीमत का लगभग पूरा हिस्सा यानी 44.68 लाख रुपये जमा करा चुका था।
पूरा भुगतान पाने के बावजूद कंपनी समय पर वैध कब्जा देने में नाकाम रही। खरीदार का आरोप था कि बिल्डर ने कम्प्लीशन सर्टिफिकेट के बिना ही अधूरे फ्लैट का कब्जा लेने का दबाव बनाया और अतिरिक्त पैसों की मांग जारी रखी। इसके बाद परेशान होकर खरीदार ने सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का हवाला देते हुए उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
बिल्डर का पक्ष और दलीलें
दूसरी तरफ, डब्ल्यूडब्ल्यूआइसीएस एस्टेट्स और उसके निदेशकों ने आरोपों को खारिज करते हुए शिकायत रद्द करने की मांग की। कंपनी का दावा था कि अक्टूबर 2017 और मई 2018 में कब्जा ऑफर किया गया था, जिसे खरीदार ने स्वीकार नहीं किया।
बिल्डर का कहना था कि ग्राहक ने सर्विस टैक्स छोड़कर 43.39 लाख रुपये दिए थे और 5.35 लाख रुपये बकाया थे। देरी के मुआवजे के तौर पर समझौते के मुताबिक 5 रुपये प्रति वर्ग फुट प्रति माह की दर से राशि देने या बकाया में समायोजित करने की बात कही गई। डेवलपर ने यह भी दलील दी कि 2017 में आंशिक कम्प्लीशन प्रमाण पत्र मिला था और 2 जून 2023 को अंतिम कम्प्लीशन सर्टिफिकेट जारी हो चुका है। इसके अलावा 400 में से अधिकतर फ्लैटों में लोग रह रहे हैं और पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में लंबित मामले भी निपट चुके हैं।
कानूनी अनिवार्यता और अंतिम निर्देश
उपभोक्ता आयोग ने बिल्डर की दलीलों को खारिज कर दिया। आयोग ने ध्यान दिलाया कि पंजाब अपार्टमेंट एंड प्रॉपर्टी रेगुलेशन एक्ट (PAPRA) के तहत कब्जा सौंपने से पहले कम्प्लीशन और ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट प्राप्त करना बिल्डर का अनिवार्य कानूनी कर्तव्य है।
आयोग ने बिल्डर को निर्देश दिया कि वह सभी वादे के मुताबिक सुविधाओं, वैध कम्प्लीशन और ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट के साथ फ्लैट सौंपकर सेल डीड निष्पादित करे। यदि ऐसा नहीं होता है, तो कंपनी को भुगतान की तारीख से 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 44.62 लाख रुपये की पूरी राशि लौटानी होगी, साथ ही 50,000 रुपये का मुआवजा भी देना होगा।

