जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के जस्टिस संजय धर की एकल पीठ ने एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई बालिग महिला अपनी स्वतंत्र मर्जी से अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रह रही है, तो उसे अदालत में पेश करने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पोषणीय नहीं है। अदालत ने कहा कि भले ही उनकी शादी की कानूनी वैधता पर विवाद हो, लेकिन बालिग व्यक्ति का स्वेच्छा से किसी के साथ रहना न तो गैर-कानूनी हिरासत है और न ही कोई अपराध।
मामले की पृष्ठभूमि
एक पिता ने अपनी बालिग बेटी को तलाशने, सुरक्षा देने और अदालत के समक्ष पेश कराने के निर्देश देने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। पिता की मांग थी कि किसी भी दबाव से मुक्त माहौल में अदालत और उनकी बेटी के बीच सीधी बातचीत कराई जाए ताकि उसकी वास्तविक इच्छा का पता चल सके।
पिता के अनुसार, उनकी बेटी का मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पहले से एक वैध विवाह हो चुका था जो वर्तमान में भी कायम है। 16 अप्रैल 2026 को वह पढ़ाई के दस्तावेज लाने चंडीगढ़ जाने की बात कहकर घर से निकली, लेकिन उसके बाद परिवार से उसका संपर्क टूट गया। गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज होने पर पुलिस जांच में पता चला कि एक अन्य व्यक्ति उसके साथ शादी करने का दावा कर रहा है।
मौजूदा याचिका से पहले, युवती और उस व्यक्ति ने परिवार से सुरक्षा की मांग को लेकर हाईकोर्ट की जम्मू पीठ के समक्ष एक याचिका (WP(C) No. 1040/2026) दायर की थी। उसमें उन्होंने बताया था कि वे बालिग और मानसिक रूप से स्वस्थ हैं तथा युवती ने अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन करने के बाद 22 दिसंबर 2025 को आर्य समाज मंदिर में विवाह कर लिया है। दस्तावेजों और दोनों के बयानों को देखने के बाद, हाईकोर्ट की समन्वय पीठ ने 17 अप्रैल 2026 को पुलिस को उन्हें सुरक्षा देने और किसी भी अनुचित परेशानी से बचाने का निर्देश दिया था। हालांकि, कोर्ट ने शादी की कानूनी वैधता पर कोई फैसला नहीं दिया था और परिवार को इसे सिविल कोर्ट में चुनौती देने की छूट दी थी।
याचिकाकर्ता के तर्क
वर्तमान बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में पिता ने अपनी बेटी के धर्म परिवर्तन पर गंभीर सवाल उठाए। उनका तर्क था कि पहले से एक वैध विवाह के कायम रहते हुए उस व्यक्ति के साथ दूसरा विवाह कानूनी रूप से अमान्य है।
याचिकाकर्ता ने मांग की कि उनकी बेटी का बयान दोबारा किसी निष्पक्ष वातावरण में दर्ज कराया जाए ताकि यह सत्यापित हो सके कि वह किसी दबाव में नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
मामले के रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि एक समन्वय पीठ पहले ही युवती का बयान दर्ज कर चुकी है और उसे संबंधित व्यक्ति के साथ जाने की अनुमति दे चुकी है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर सके जिससे यह लगे कि समन्वय पीठ के सामने दिया गया बयान किसी दबाव या अनुचित प्रभाव में दिया गया था। अदालत ने टिप्पणी की कि दोबारा बयान दर्ज कराने का आदेश देना अप्रत्यक्ष रूप से पुरानी न्यायिक कार्यवाही की समीक्षा (रिव्यू) करने जैसा होगा, जिसकी कानून में अनुमति नहीं है।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के कानूनी सिद्धांत और उसके दायरे को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका केवल तभी जारी की जा सकती है जब अदालत को यह प्रतीत हो कि संबंधित व्यक्ति को ऐसी परिस्थितियों में हिरासत में रखा गया है जो किसी अपराध के घटित होने का संकेत देती हैं या उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध बंधक बनाया गया है।”
मामले के तथ्यों का मूल्यांकन करते हुए अदालत ने माना:
“वर्तमान मामले में, रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से पता चलता है कि संबंधित व्यक्ति अपनी मर्जी और स्वेच्छा से प्रतिवादी के साथ रह रही है। प्रतिवादी के साथ उसकी शादी वैध हो सकती है या नहीं भी हो सकती है, लेकिन एक बार जब वह बालिग है और उसने प्रतिवादी के साथ रहने का सोच-समझकर फैसला लिया है, तो उक्त व्यक्ति के साथ उसका रहना कोई अपराध नहीं है।”
अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि याचिका में गैर-कानूनी हिरासत का कोई प्राथमिक आरोप तक नहीं लगाया गया है:
“वास्तव में, याचिकाकर्ता द्वारा इस याचिका में ऐसा कोई आरोप भी नहीं लगाया गया है कि उसे ऐसी परिस्थितियों में हिरासत में रखा गया है जिससे यह संदेह पैदा हो कि उसके खिलाफ कोई अपराध किया गया है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने दोहराया कि यदि पिता को अपनी बेटी और उस व्यक्ति के विवाह की कानूनी वैधता पर कोई आपत्ति है, तो वह सिविल कोर्ट के समक्ष उचित कानूनी कार्यवाही शुरू करने के लिए स्वतंत्र हैं, जैसा कि पिछली याचिका के आदेश में स्पष्ट किया गया था।
अदालत ने माना कि एक बालिग महिला का अपनी मर्जी से किसी के साथ रहना बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जारी करने का आधार नहीं बन सकता। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: परवेज़ अहमद खान बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश व अन्य
वाद संख्या: एचसीपी नंबर 89/2026, सीएम नंबर (4398/2026)
पीठ: जस्टिस संजय धर
निर्णय की तिथि: 17.07.2026

