संसदीय संशोधन से पहले मिले अनुसूचित जाति आरक्षण के अधिकार नहीं छीने जा सकते: गुजरात हाईकोर्ट

गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी नागरिक को कानून के तहत अनुसूचित जाति (एससी) आरक्षण का लाभ मिल चुका है, तो संसद द्वारा सूची में बाद में किए गए संशोधन के आधार पर उस अधिकार को वापस नहीं लिया जा सकता। जस्टिस एन.एस. संजय गौड़ा और जस्टिस जे.एल. ओडेदरा की पीठ ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें अपने एक कर्मचारी के डिमोशन को रद्द करने के ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती दी गई थी। पीठ ने कहा कि जो संवैधानिक अधिकार एक बार किसी व्यक्ति में निहित हो जाते हैं, उन्हें बाद में बनाए गए किसी कानून से छीना जाना असंवैधानिक है।

नौ साल बाद डिमोशन किए जाने का मामला

यह कानूनी विवाद ईपीएफओ कर्मचारी रंजीत वसंतलाल मकवाना से जुड़ा है। मकवाना 7 अप्रैल 1995 को एससी कोटे के तहत ईपीएफओ में लोअर डिवीजन क्लर्क (एलडीसी) के पद पर भर्ती हुए थे। उस समय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) अधिनियम, 1976 के तहत गुजरात में मोची समुदाय को पूरे राज्य में अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता प्राप्त थी।

विभाग की परीक्षा पास करने के बाद 31 दिसंबर 2003 को मकवाना को प्रवर्तन अधिकारी/लेखा अधिकारी के पद पर पदोन्नत किया गया। हालांकि, पदोन्नति के लगभग नौ साल बाद 29 नवंबर 2012 को ईपीएफओ ने उन्हें अपर डिवीजन क्लर्क (यूडीसी) के पद पर डिमोट कर दिया। संगठन का तर्क था कि 17 दिसंबर 2002 को लागू हुए संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश (द्वितीय संशोधन) अधिनियम, 2002 के तहत मोची समुदाय के लिए भौगोलिक सीमाएं फिर से लागू कर दी गई थीं, जिसके अनुसार केवल डांग जिले और वलसाड जिले के अंबरगांव तालुका के मोची समुदाय को ही एससी माना जाएगा। ईपीएफओ के अनुसार, मकवाना इन क्षेत्रों से संबंधित नहीं थे, इसलिए वे पदोन्नति के समय आरक्षण के पात्र नहीं थे।

ट्रिब्यूनल का फैसला और हाईकोर्ट का रुख

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने अशीष मिश्रा को दिवाली पर लखीमपुर जाने की अनुमति दी, राजनीतिक जमावड़े पर रहेगी पाबंदी

मकवाना ने इस डिमोशन को सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (सीएटी) में चुनौती दी। ट्रिब्यूनल ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि पदोन्नति की रिक्ति वर्ष 2000 में उत्पन्न हुई थी, जब पूरे गुजरात में मोची समुदाय को एससी दर्जा हासिल था। ईपीएफओ ने सीएटी के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट में ईपीएफओ ने तर्क दिया कि आरक्षण की पात्रता पदोन्नति की तिथि (31 दिसंबर 2003) से तय होनी चाहिए न कि रिक्ति के वर्ष से। संगठन का कहना था कि अनुच्छेद 341 के तहत जब संसद किसी जाति की मान्यता को संशोधित करती है, तो संशोधित क्षेत्र से बाहर के व्यक्ति आरक्षण का दावा नहीं कर सकते।

दूसरी ओर, मकवाना के वकील ने पक्ष रखा कि जाति का निर्धारण जन्म से होता है। जब मकवाना सेवा में शामिल हुए और पदोन्नति पाई, तब पूरे राज्य में मोची समुदाय को एससी मान्यता प्राप्त थी। संसद को सूची में संशोधन का अधिकार तो है, लेकिन इसका इस्तेमाल किसी व्यक्ति के पहले से मिले संवैधानिक अधिकारों को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता।

जीवनभर जारी रहेगा आरक्षण का लाभ

READ ALSO  झारखंड हाईकोर्ट ने पीएलएफआई प्रमुख के इलाज पर हलफनामा मांगा

संविधान के अनुच्छेद 15, 16, 17, 46, 335, 338 और 341 के साथ-साथ मोची समुदाय के वैधानिक इतिहास की समीक्षा के बाद हाईकोर्ट ने 17 जुलाई को अपना फैसला सुनाया। पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 341(2) के तहत संसद के पास सूची में संशोधन की शक्ति जरूर है, लेकिन इसे भूतलक्षी (अतीत से) प्रभाव से लागू करके किसी व्यक्ति के निहित संवैधानिक अधिकारों को नहीं छीना जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति ऐसी जाति में पैदा हुआ है जिसे उस समय अनुसूचित जाति में शामिल किया गया था, या जिसने कानूनन मान्यता के समय आरक्षण का लाभ ले लिया है, वह अपने पूरे जीवनकाल में उस लाभ का हकदार रहेगा। कोर्ट ने टिप्पणी की कि किसी कर्मचारी को करियर के बीच में आरक्षण लाभ से वंचित करना उसे अधर में छोड़ने जैसा है, जो कि संवैधानिक रूप से अनुचित है।

READ ALSO  सीआरपीसी की धारा 451 के तहत शक्ति का प्रयोग आपराधिक अदालतों द्वारा विवेकपूर्ण नजरिये से और बिना किसी अनावश्यक देरी के किया जाना चाहिए: इलाहाबाद हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने सीएटी के उस बिंदु पर निर्णय देना अनावश्यक माना कि पात्रता का आधार रिक्ति का वर्ष था या पदोन्नति की तारीख। पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि मकवाना के अधिकार 2002 के संशोधन के बाद भी सुरक्षित रहे। इसके साथ ही कोर्ट ने ईपीएफओ की याचिका खारिज करते हुए मकवाना का डिमोशन रद्द करने के आदेश को बरकरार रखा।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles