मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान भगवान राम और माता सीता पर विवादित टिप्पणी करने के आरोपी संदीप कुमार को अग्रिम जमानत दे दी है। 16 जुलाई को दिए गए अपने आदेश में अदालत ने कहा कि हालांकि कार्यक्रम के दौरान शब्दों का चयन अनुचित हो सकता है, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि याचिकाकर्ता की मंशा धार्मिक भावनाएं भड़काने या समाज में वैमनस्य फैलाने की थी।
क्या है पूरा मामला
यह विवाद सिवनी जिले के बरघाट पुलिस थाना क्षेत्र में आयोजित एक कार्यक्रम से जुड़ा है। यू.एस. एग्रो सीड्स कंपनी द्वारा आयोजित इस सांस्कृतिक संध्या में मशहूर भजन गायिका शहनाज़ अख्तर की प्रस्तुति हो रही थी। कार्यक्रम का संचालन संदीप कुमार कर रहे थे। प्रस्तुतियों के बीच में संदीप कुमार ने अपने टैबलेट पर एक वीडियो दिखाते हुए एक दोहा पढ़ा।
पुलिस का दावा है कि इस दौरान उन्होंने माता सीता और भगवान राम के संबंध में अमर्यादित टिप्पणी की। घटना के बाद बरघाट पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं के तहत भ्रामक और भड़काऊ बयानों से शत्रुता बढ़ाने का मामला दर्ज कर लिया था।
अदालत में बचाव और राज्य सरकार के तर्क
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान संदीप कुमार के अधिवक्ताओं विशाल वी.आर. डेनियल और अपूर्वा सिंह राजपूत ने तर्क दिया कि संबंधित बयान रामचरितमानस के एक प्रसंग पर आधारित था। इसमें रावण की पत्नी मंदोदरी और लंका की अन्य महिलाओं के उस भय का वर्णन किया जा रहा था, जो उन्हें माता सीता के अपहरण के बाद लंका के विनाश को लेकर था।
बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि जब दर्शकों ने इस पर आपत्ति जताई, तो संदीप कुमार ने तुरंत मंच से सार्वजनिक रूप से माफी मांग ली थी, जिसका वीडियो रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध है। इसके अलावा, कानूनी रूप से इस मामले में झूठी अफवाह या भ्रामक सूचना फैलाने के तत्व मौजूद नहीं हैं।
वहीं, राज्य सरकार के अभियोजक ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह एक गंभीर अपराध है और आरोपी को राहत देने से समाज में गलत संदेश जाएगा, जिससे बहुसंख्यक समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं।
हाईकोर्ट का अवलोकन और ज़मानत की शर्तें
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस देवनारायण मिश्रा की पीठ ने वीडियो साक्ष्यों का अध्ययन किया। हाईकोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि जिस संदर्भ में वह दोहा पढ़ा गया था, उसमें शब्दों का चुनाव भले ही पूरी तरह सही न रहा हो, लेकिन प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत नहीं होता कि संदीप कुमार का उद्देश्य धार्मिक आधार पर उपद्रव, दंगा या जन-असंतोष पैदा करना था।
अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि इस अपराध में अधिकतम तीन वर्ष की कैद या जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान है। इसके अलावा, भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 के तहत इस तरह की कार्यवाही के लिए जिलाधिकारी, राज्य सरकार या केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य होती है।
मामले के तथ्यों और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व नज़ीरों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने बिना केस के गुण-दोष पर टिप्पणी किए अग्रिम जमानत अर्जी स्वीकार कर ली। अदालत ने निर्देश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में संदीप कुमार को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक सॉल्वेंट ज़मानतदार प्रस्तुत करने पर रिहा किया जाए। यह ज़मानत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 482(2) की शर्तों के अधीन रहेगी।

