IIT-JEE (एडवांस्ड) 2026 परीक्षा में एक अभ्यर्थी को अनुचित मदद दिलाने के लिए ड्यूटी पर तैनात अधिकारी को रिश्वत देने के आरोपी को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने 35 वर्षीय आरोपी परमजीत की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराध जनता के भरोसे को चोट पहुंचाते हैं, इसलिए ऐसे मामलों में जांच के शुरुआती चरण में अग्रिम जमानत देने में अत्यधिक सावधानी बरतना आवश्यक है।
जस्टिस सुमीत गोयल की पीठ ने 17 जुलाई को सुनाए निर्णय में स्पष्ट किया कि आरोपी को गिरफ्तारी से राहत देने से मामले की जारी जांच बाधित हो सकती है। अदालत ने कहा कि शुरुआती साक्ष्य और होटल का सीसीटीवी फुटेज घटना स्थल पर आरोपी परमजीत की मौजूदगी को साबित करते हैं। आरोपों की गंभीरता, आरोपी की विशिष्ट भूमिका और हिरासत में पूछताछ की जरूरत को ध्यान में रखते हुए पूर्व-गिरफ्तारी राहत देना न्यायसंगत नहीं है।
यह मामला 15 मई 2026 को घटी एक घटना से संबंधित है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, ‘ओम इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट’ परीक्षा केंद्र पर वेन्यू कमांडिंग ऑफिसर के रूप में तैनात सुमित कुमार एक होटल में ठहरे हुए थे। आरोप है कि परमजीत अपने एक साथी के साथ उनके कमरे में पहुंचा और एक उम्मीदवार को परीक्षा में अनैतिक लाभ पहुंचाने के बदले 500-500 रुपये के नोटों के दो बंडल रिश्वत के रूप में देने की कोशिश की।
सीसीटीवी फुटेज और जांच की आवश्यकता
जमानत याचिका का कड़ा विरोध करते हुए वरिष्ठ उप अधिवक्ता जनरल प्रियंका सदर ठाकुर ने कहा कि कथित अपराध बेहद गंभीर प्रकृति का है। यदि याचिकाकर्ता को जमानत दी जाती है तो उसके फरार होने या गवाहों और सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने की पूरी संभावना है।
दूसरी ओर, परमजीत के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता अंकुर मित्तल ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने कोर्ट के समक्ष तर्क रखा कि घटना के दो दिन बाद प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई, जिसकी कोई स्पष्ट वजह नहीं बताई गई है। इसके अलावा, शुरुआती शिकायत में परमजीत का नाम शामिल नहीं था और आरोप अस्पष्ट हैं, क्योंकि उनमें अभ्यर्थी का नाम या रोल नंबर तक दर्ज नहीं है।
कानूनी प्रावधानों पर बचाव पक्ष के तर्क
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि इस मामले में लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 लागू नहीं होता। उन्होंने कहा कि संयुक्त प्रवेश बोर्ड (JAB) द्वारा यह कंप्यूटर-आधारित परीक्षा आयोजित की जाती है, लेकिन यह बोर्ड कानून के तहत कोई सार्वजनिक परीक्षा प्राधिकरण नहीं है। एडवोकेट मित्तल ने आगे बताया कि याचिकाकर्ता का कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं है और वह जांच में सहयोग करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों, निष्पक्ष जांच और आरोपी से पूछताछ की आवश्यकता के समक्ष अग्रिम जमानत के तर्क कमजोर पड़ते हैं। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि जांच प्रक्रिया को सुचारू बनाए रखने के लिए याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती।

