सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट कंपनी पार्श्वनाथ डेवलपर्स को गुरुग्राम के घर खरीदारों का पूरा पैसा 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ जमा करने के लिए एक सप्ताह की अंतिम मोहलत दी है। कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कंपनी इस आदेश का पालन करने में विफल रहती है, तो उसके निदेशकों को सीधे जेल की सजा भुगतनी होगी।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी और चेतावनी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सोमवार को मामले की सुनवाई के दौरान कंपनी और उसके निदेशकों के खिलाफ बेहद तल्ख टिप्पणियां कीं। पीठ ने कहा कि इस कंपनी ने देश भर के लोगों के साथ धोखाधड़ी की है और पूरी कानूनी व्यवस्था का मज़ाक बनाकर रख दिया है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने चेतावनी दी कि यदि एक सप्ताह के भीतर अदालती आदेशों का पालन नहीं किया गया, तो कंपनी के निदेशकों को जेल भेजा जाएगा। उन्होंने यूनिटेक मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि पार्श्वनाथ के निदेशकों का भी वही हश्र होगा जो यूनिटेक के प्रमोटरों का हुआ था, क्योंकि इन्होंने पूरी प्रणाली को बंधक बना लिया है।
कोर्ट ने ठुकराईं कंपनी की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग कर रहा है, जो उसे न्याय सुनिश्चित करने के लिए पूर्ण अधिकार देता है। ऐसे में कोर्ट दिवाला प्रक्रिया (आईबीसी) या अन्य किसी तकनीकी दलील पर विचार नहीं करेगा। कंपनी की तरफ से दी गई इस दलील को भी खारिज कर दिया गया कि उसी इमारत में कुछ अन्य खरीदार भी रह रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश ने सख्त लहजे में कहा कि हमारे पास कोई नई योजना लेकर मत आइए। पहले पूरा पैसा जमा कीजिए, उसके बाद ही कोई बात होगी। उन्होंने साफ किया कि आदेश को लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए, अगला कदम केवल जेल है।
अदालत ने निर्देश दिया कि कंपनी और उसके निदेशकों के बैंक खातों को फ्रीज रखने सहित पूर्व में लगाए गए सभी प्रतिबंध जारी रहेंगे। इस मामले की अगली सुनवाई आगामी सोमवार यानी 27 जुलाई को होगी।
दो दशकों का लंबा संघर्ष
यह पूरा मामला वरिष्ठ नागरिकों और कैंसर पीड़ित रीता टिक्कू व उनके पति लोकेश टिक्कू से जुड़ा है। इस दंपती ने अपनी जीवनभर की गाढ़ी कमाई (1.78 करोड़ रुपये) गुरुग्राम के सेक्टर 53 स्थित ‘पार्श्वनाथ एक्सोटिका’ परियोजना में निवेश की थी।
उन्हें वर्ष 2006 में फ्लैट आवंटित किया गया था और 2007 की शुरुआत में बिल्डर-बायर समझौता हुआ था। समझौते के मुताबिक, फरवरी 2013 तक उन्हें फ्लैट का कब्जा मिल जाना चाहिए था। हालांकि, पूरी रकम का भुगतान करने के बावजूद कंपनी ने निर्माण कार्य पूरा नहीं किया।
अथॉरिटी के आदेशों की अनदेखी और कानूनी अड़चन
फ्लैट न मिलने पर पीड़ितों ने हरियाणा रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (हरेरा – HRERA) का दरवाजा खटखटाया। हरेरा ने खरीदारों के पक्ष में मुआवजे का फैसला सुनाया। पार्श्वनाथ डेवलपर्स ने इस फैसले को कहीं चुनौती नहीं दी, जिससे यह आदेश अंतिम हो गया। इसके बावजूद कंपनी ने न तो कब्जा दिया और न ही मुआवजा चुकाया।
इसके बाद जब अथॉरिटी ने वसूली की कार्रवाई शुरू की और कंपनी के खिलाफ जमानती वारंट जारी किए, तो बिल्डर के सुरक्षाकर्मियों ने अदालती बेलीफ (कर्मचारी) को कंपनी परिसर के भीतर भी नहीं घुसने दिया। खरीदारों की परेशानी तब और बढ़ गई जब अप्रैल 2025 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के उस नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया जिसके तहत हरेरा को रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करने का अधिकार दिया गया था। इसके बाद पीड़ितों को सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी।
प्रशासन को कड़े कदम उठाने के निर्देश
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 13 जुलाई को सख्त रुख अपनाते हुए कंपनी के बैंक खाते सीज कर दिए थे और निदेशकों के खिलाफ जमानती वारंट जारी किए थे। कोर्ट ने किसी भी तीसरे पक्ष के पक्ष में नए अधिकार सृजित करने या फ्लैट का कब्जा देने पर भी रोक लगा दी थी।
सोमवार को सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार की ओर से अनुपालन हलफनामा पेश किया गया, जिसे कोर्ट ने तुरंत रिकॉर्ड पर लेने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), सभी जिला कलेक्टरों और पुलिस कमिश्नरों को अदालती आदेशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने और इस संबंध में हलफनामा दायर करने का आदेश दिया है।

