सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में गैंग रेप के एक दोषी की सजा को उसके शेष प्राकृतिक जीवन के लिए सश्रम कारावास से घटाकर 20 साल के सश्रम कारावास में बदल दिया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि भारतीय दंड संहिता की धारा 376-डी के तहत दोषसिद्धि के निचली अदालतों के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है, लेकिन शेष प्राकृतिक जीवन के लिए दी गई आजीवन कारावास की सजा आनुपातिकता के सिद्धांत (Doctrine of Proportionality) को संतुष्ट नहीं करती है। कोर्ट ने अपराध की जघन्य प्रकृति और दोषी की कम उम्र, साफ रिकॉर्ड और सुधार की संभावनाओं के बीच संतुलन स्थापित करते हुए माना कि सजा हमेशा संतुलित और आनुपातिक होनी चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला नई दिल्ली का है जहां पीड़िता ने रात के समय दिल्ली रेलवे स्टेशन से इस भरोसे पर एक रिक्शा लिया कि चालक उसे उसके घर छोड़ देगा। लेकिन घर छोड़ने के बजाय, वह उसे एक सुनसान जगह पर ले गया जहां पहले से ही एक अन्य व्यक्ति मौजूद था, और दोनों ने मिलकर रेप के अपराध को अंजाम दिया। इस संबंध में 7 सितंबर 2016 को नई दिल्ली के आई.पी. एस्टेट पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई थी।
जून 2017 में एडिशनल सेशंस जज, तीस हजारी कोर्ट, दिल्ली ने अपीलकर्ता और सह-आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376-डी के तहत दोषी ठहराया था। उन्हें उनके शेष प्राकृतिक जीवन तक सश्रम कारावास और 25,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता और गवाह के बयानों पर भरोसा किया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने 1 नवंबर 2017 को स्वतंत्र रूप से सबूतों का मूल्यांकन करने के बाद इस सजा और दोषसिद्धि की पुष्टि की थी। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में नोटिस जारी करते समय दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था और अपनी समीक्षा को केवल सजा की मात्रा (quantum of sentence) तक सीमित रखा था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि अपराध के समय उसकी उम्र केवल 25 वर्ष थी और उसका कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं था। इतनी कम उम्र होने के कारण उसमें सुधार की प्रबल संभावना है। यह भी कहा गया कि लगभग दस वर्षों की कैद (छूट सहित) के दौरान जेल में उसका आचरण बहुत अच्छा रहा है।
दूसरी ओर, दिल्ली राज्य (अभियोजन पक्ष) ने ऐसा कोई रिकॉर्ड या साक्ष्य पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो सके कि अपीलकर्ता में सुधार असंभव है, और न ही उसने जेल में अपीलकर्ता के अच्छे आचरण के दावे का खंडन किया।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने आनुपातिकता के सिद्धांत के आलोक में सजा का मूल्यांकन किया। जस्टिस संजय करोल ने फैसला लिखते हुए सजा के बुनियादी सिद्धांत को स्पष्ट करने के लिए एक पुराने मामले का हवाला दिया जिसमें कहा गया था:
“सजा देने की प्रक्रिया के कुशल समन्वय द्वारा जहां सख्त होना चाहिए वहां सख्त रहें, और जहां दया की आवश्यकता हो वहां दयालु रहें।”
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के एक ऐतिहासिक मामले में जस्टिस पी.एन. भगवती की असहमतिपूर्ण राय का भी उल्लेख किया, जिसमें आनुपातिकता को संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत एक महत्वपूर्ण कसौटी माना गया था:
“अब कानून के शासन का यह एक अनिवार्य तत्व है कि दी जाने वाली सजा अपराध के आनुपातिक होनी चाहिए। यदि कोई कानून ऐसी सजा का प्रावधान करता है जो अपराध के अनुपात में अत्यधिक है, तो यह मनमाना और तर्कहीन होगा, क्योंकि यह तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा और कानून के शासन के विपरीत होगा…”
पीठ ने पूर्व के अन्य फैसलों का भी संदर्भ दिया जिसमें स्पष्ट किया गया था कि सजा तय करते समय अपराध की गंभीरता प्राथमिक विचार होने के साथ-साथ सुधारवादी न्याय और शमनकारी आधारों पर भी न्यायिक विवेक के तहत विचार किया जाना चाहिए। इसके साथ ही कोर्ट ने माना कि महिलाओं के खिलाफ हिंसक अपराधों से कड़ाई से निपटना जरूरी है और समाज के गुस्से को उचित सजा के रूप में प्रतिबिंबित होना चाहिए।
अदालत ने कई पुराने न्यायिक उदाहरणों की समीक्षा की जहां दोषियों की कम उम्र, जेल में अच्छे आचरण और सुधार की संभावनाओं को देखते हुए मौत की सजा या अत्यधिक कठोर सजाओं को 20 से 35 वर्ष के निश्चित कारावास में बदला गया था।
कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि निर्भया कांड के बाद वर्ष 2013 के संशोधन के जरिए धारा 376-डी को बदला गया था, जिसमें न्यूनतम सजा 20 वर्ष और अधिकतम सजा शेष प्राकृतिक जीवन के लिए आजीवन कारावास तय की गई थी। इसके तहत अदालतों को “विशेष और पर्याप्त कारणों” से भी न्यूनतम सजा से कम करने की शक्ति को समाप्त कर दिया गया, जो अपराध की गंभीरता को दर्शाता है।
हालांकि, महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा की निरंतरता पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“…यह अपराध, जैसा कि पहले ही देखा जा चुका है, जघन्य है और न केवल पीड़िता के खिलाफ है बल्कि बड़े पैमाने पर समाज के खिलाफ है। पितृसत्तात्मक सोच की बेड़ियों से मुक्त होने के लिए सामाजिक और मनोवैज्ञानिक रूप से काफी विकास के बावजूद, इस तरह की घटनाएं बेरोकटोक जारी हैं।”
कोर्ट का निर्णय
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपराध की भयावहता के साथ-साथ अपीलकर्ता के पक्ष में मौजूद शमनकारी कारकों (जैसे आपराधिक इतिहास न होना, घटना के समय उम्र 25 वर्ष होना और जेल में अच्छा आचरण) के बीच संतुलन बनाया। चूंकि राज्य यह स्थापित करने में विफल रहा कि अपीलकर्ता में सुधार असंभव है, इसलिए कोर्ट ने सजा को संशोधित करना उचित समझा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए अपीलकर्ता की सजा को शेष प्राकृतिक जीवन के लिए आजीवन कारावास से घटाकर 20 वर्ष का सश्रम कारावास कर दिया, जिसमें नियमानुसार छूट का लाभ भी शामिल होगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अहसान बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2026 (एसएलपी (क्रिमिनल) संख्या 3407/2026 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 20 जुलाई, 2026

