इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि जिन अधिवक्ताओं के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं, उन्हें अदालतों में वकालत करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। साथ ही उनके आपराधिक मुकदमों की सुनवाई पड़ोसी जिले की ऐसी अदालत में स्थानांतरित की जानी चाहिए, जो संबंधित जिले से कम से कम 100 किलोमीटर दूर हो।
जस्टिस विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने यह टिप्पणी इटावा के एक अधिवक्ता की याचिका खारिज करते हुए की। याचिका में अधिवक्ता ने अपने खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने वाले पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की थी। अदालत के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड के अनुसार, संबंधित अधिवक्ता के खिलाफ तीन आपराधिक मामले दर्ज हैं, जबकि उसके पांच भाइयों के खिलाफ कुल 31 आपराधिक मामले लंबित बताए गए हैं।
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के सचिव को यह भी निर्देश दिया कि डिग्री सत्यापन के दौरान फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों वाले पाए गए सभी 105 अधिवक्ताओं के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कराई जाए। अदालत ने कहा कि उनके विरुद्ध जालसाजी, धोखाधड़ी, प्रतिरूपण तथा तथ्यों के अनुसार लागू अन्य धाराओं में कार्रवाई की जाए।
बार काउंसिल की अनुशासनात्मक कार्रवाई पर अदालत ने जताई चिंता
जस्टिस विनोद दिवाकर ने कहा कि अदालत के समक्ष उपलब्ध सामग्री से यह चिंताजनक स्थिति सामने आई है कि पुलिस रिकॉर्ड में बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने के बावजूद उत्तर प्रदेश बार काउंसिल ने केवल कुछ ही मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की है।
अदालत ने कहा कि इससे स्पष्ट होता है कि बार काउंसिल की आंतरिक अनुशासन और नियमन की व्यवस्था समस्या की गंभीरता और मामलों की संख्या के अनुरूप सक्रिय नहीं रही।
बार एसोसिएशनों और जिला अदालतों की स्थिति पर गंभीर टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि गोरखपुर और कानपुर सहित कई बार एसोसिएशनों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग पदाधिकारी बने हुए हैं। अदालत ने यह भी कहा कि लगभग हर जिला अदालत में बार काउंसिल में पंजीकृत कुछ कानून स्नातकों के संगठित समूह सक्रिय हैं, जो अदालतों के आदेशों को बलपूर्वक लागू कराने, अदालत के बाहर दबाव बनाकर विवाद सुलझाने, कमजोर पक्षकारों को डराने-धमकाने और किरायेदारों तथा संपत्ति पर कब्जा रखने वालों को जबरन बेदखल कराने जैसी गतिविधियों में शामिल बताए गए हैं।
पीठ ने कहा कि कई जिला न्यायाधीश ऐसे मामलों में प्रभावी कार्रवाई करने से बचते रहे हैं या समस्या की गंभीरता को स्वीकार नहीं करते, क्योंकि ऐसी धारणा है कि इन समूहों को सामाजिक और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है।
अदालत ने कहा कि इस कारण युवा अधिवक्ताओं और नव नियुक्त न्यायिक अधिकारियों के लिए निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से कार्य करना लगातार कठिन होता जा रहा है।
हजारों अधिवक्ताओं पर दर्ज हैं आपराधिक मामले
पुलिस द्वारा अदालत में प्रस्तुत सांख्यिकीय रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में वर्तमान में 5,14,439 अधिवक्ता पंजीकृत हैं, जिनमें से 2,49,809 को सर्टिफिकेट ऑफ प्रैक्टिस जारी किया गया है।
रिपोर्ट में बताया गया कि राज्य के 75 जिलों, सात कमिश्नरेट और जीआरपी क्षेत्रों में 4,157 अधिवक्ताओं के खिलाफ कुल 5,056 आपराधिक मामले दर्ज हैं।
हाईकोर्ट ने इसे अत्यंत गंभीर चिंता का विषय बताते हुए कहा कि कुछ अधिवक्ता 46 तक एफआईआर दर्ज होने के बावजूद अदालतों में वकालत कर रहे हैं।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि लखनऊ के वजीरगंज थाना क्षेत्र में सबसे अधिक ऐसे अधिवक्ता पाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यहां 422 अधिवक्ताओं के खिलाफ 236 एफआईआर दर्ज हैं, जो राज्य के किसी भी अन्य एकल थाना क्षेत्र की तुलना में कहीं अधिक है।
फर्जी डिग्री सत्यापन को अदालत ने बताया सतही अभ्यास
डिग्री सत्यापन के दौरान बार काउंसिल ने 105 अधिवक्ताओं को फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के आधार पर पंजीकृत पाया। इनमें 65 मामलों में एलएलबी की डिग्री, 28 मामलों में स्नातक की डिग्री और पांच मामलों में एकीकृत बीए एलएलबी की डिग्री फर्जी पाई गई।
इसके अलावा तीन-तीन अधिवक्ताओं के इंटरमीडिएट और हाईस्कूल प्रमाणपत्र भी फर्जी पाए गए, जबकि एक अधिवक्ता ने बीसीए की फर्जी डिग्री प्रस्तुत की थी।
अदालत ने कहा कि 5.14 लाख से अधिक पंजीकृत अधिवक्ताओं में केवल 105 फर्जी डिग्रीधारकों की पहचान होना सांख्यिकीय दृष्टि से विश्वसनीय नहीं लगता और प्रथम दृष्टया यह सत्यापन प्रक्रिया केवल औपचारिकता प्रतीत होती है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सर्टिफिकेट ऑफ प्रैक्टिस जारी करते समय पुलिस सत्यापन न किया जाना नियामक व्यवस्था की एक गंभीर और अक्षम्य कमी है। अदालत के अनुसार, अन्य विनियमित पेशों में चरित्र और आपराधिक पृष्ठभूमि का सत्यापन अनिवार्य होता है, जबकि उत्तर प्रदेश में विधि व्यवसाय में प्रवेश के समय ऐसी कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं है।
पीठ ने यह भी कहा कि कुछ फर्जी डिग्रीधारी अधिवक्ता 1991 और 1992 से पंजीकृत हैं। अदालत के अनुसार, वे दशकों तक बिना किसी वैधानिक अधिकार के अदालतों में पेश होते रहे, वकालतनामे दाखिल करते रहे और न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बने रहे, जिससे उन मामलों की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं जिनमें उन्होंने पक्षकारों का प्रतिनिधित्व किया।
हाईकोर्ट ने जारी किए कई प्रशासनिक निर्देश
हाईकोर्ट ने सभी जिलों के पुलिस आयुक्तों और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को निर्देश दिया कि किसी भी अधिवक्ता के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने और उसके बाद अंतिम रिपोर्ट या आरोपपत्र दाखिल होने पर तत्काल जिला न्यायाधीश, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और संयुक्त निदेशक (अभियोजन) को इसकी सूचना दी जाए। साथ ही प्रत्येक एफआईआर की प्रति उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के सचिव को भी भेजी जाए और प्रत्येक थाना इसके लिए अलग रजिस्टर बनाए।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि प्रत्येक पंजीकृत अधिवक्ता हर वर्ष शपथपत्र दाखिल कर यह बताए कि पिछले एक वर्ष के दौरान उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज हुआ, आरोपपत्र दाखिल हुआ या मुकदमा चला है या नहीं। अदालत ने कहा कि गलत जानकारी देने पर अधिवक्ता का पंजीकरण स्वतः निलंबित किया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि बार काउंसिल इन घोषणाओं का मिलान अदालतों के रिकॉर्ड और पुलिस डेटाबेस से कर सकती है।
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को 30 दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को होगी।

