सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक इमारत के ध्वस्तीकरण पर तुरंत रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने साफ किया कि याचिकाकर्ता को राहत के लिए सबसे पहले संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए।
सीधे सुप्रीम कोर्ट आने की प्रवृत्ति पर नाराजगी
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने याचिका पर सीधे विचार करने से मना कर दिया। चीफ जस्टिस ने याचिकाकर्ताओं द्वारा संबंधित क्षेत्राधिकार वाले हाईकोर्ट की अनदेखी कर सीधे देश की सबसे बड़ी अदालत का रुख करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की।
चीफ जस्टिस ने यह स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट पहली बार में सुनवाई करने वाली अदालत के रूप में सीधे इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा। उन्होंने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि यदि यह ढांचा आज पूरी तरह ध्वस्त भी कर दिया जाता है, तब भी वे सीधे इस मामले में दखल नहीं देंगे और याचिकाकर्ता को उचित राहत के लिए हाईकोर्ट ही जाना होगा।
स्वीकृत योजना बनाम तालाब की भूमि का विवाद
यह कानूनी विवाद संपत्ति के निर्माण की वैधता को लेकर परस्पर विरोधी दावों से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि इमारत का निर्माण बकायदा स्वीकृत बिल्डिंग प्लान के अनुसार ही किया गया था। वकील ने कोर्ट से अनुरोध किया कि चल रही तोड़फोड़ को तुरंत रोकने के लिए अंतरिम सुरक्षा प्रदान की जाए।
दूसरी तरफ, स्थानीय अधिकारियों ने इस दावे का विरोध करते हुए आरोप लगाया कि यह निर्माण उस भूमि पर किया गया है जो आधिकारिक दस्तावेजों में तालाब क्षेत्र के रूप में दर्ज है।
सुप्रीम कोर्ट से फौरी राहत और तत्काल सुनवाई की अर्जी खारिज होने के बाद अब याचिकाकर्ता को कानूनी उपचार के लिए संबंधित क्षेत्रीय हाईकोर्ट का रुख करना होगा।

