ग्राहक को नई बताकर बेची टेस्ट-ड्राइव कार: राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने टाटा मोटर्स को दी राहत, सिर्फ डीलर पर लगाया जुर्माना

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने अपने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि रिटेल डीलर द्वारा की गई स्वतंत्र धोखाधड़ी के लिए कार निर्माता कंपनी को उत्तरदायी नहीं माना जा सकता। आयोग ने पंजाब के एक टाटा मोटर्स डीलर को ग्राहक के साथ धोखाधड़ी करने और सेवा में गंभीर कमी का दोषी पाते हुए उसे ग्राहक को पूरा रिफंड और मुआवजा देने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही, आयोग ने टाटा मोटर्स को मामले में सभी कानूनी और वित्तीय देनदारियों से पूरी तरह बरी कर दिया है।

जस्टिस (सेवानिवृत्त) ए पी साही की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें सदस्य भरतकुमार पंड्या भी शामिल थे, ने यह निर्णय 15 जुलाई को सुनाया। आयोग ने इस विवाद में दायर कई अपीलों पर सुनवाई करते हुए राज्य स्तर के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसने निर्माता कंपनी पर भी वित्तीय देनदारी डाल दी थी। इस निर्णय के साथ ही आयोग ने 2012 के जिला स्तर के उस आदेश को पूरी तरह बहाल कर दिया है जिसमें सिर्फ रिटेल डीलर को ही दोषी पाया गया था।

डीलर और कार निर्माता के बीच व्यावसायिक संबंध स्वतंत्र

राष्ट्रीय आयोग ने कहा कि पंजाब राज्य उपभोक्ता आयोग ने 2014 में टाटा मोटर्स को संयुक्त रूप से दोषी मानकर गलती की थी। पीठ ने रेखांकित किया कि राज्य आयोग ने वाहन में किसी तकनीकी खराबी या मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट (उत्पादन संबंधी खराबी) का वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत किए बिना ही निर्माता कंपनी को जिम्मेदार ठहरा दिया था।

आयोग ने साफ किया कि किसी वाहन में मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट साबित करने के लिए उसकी उत्पादन प्रक्रिया की औपचारिक वैज्ञानिक जांच जरूरी होती है, जो इस मामले की निचली अदालतों में से किसी ने भी नहीं की थी। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि कार निर्माता कंपनियां और उनके रिटेल डीलर आपस में ‘प्रिंसिपल-टू-प्रिंसिपल’ (प्रधान-से-प्रधान) के आधार पर काम करते हैं। इस कानूनी व्यवस्था के तहत दोनों पक्ष पूरी तरह स्वतंत्र कॉर्पोरेट इकाइयां होते हैं, इसलिए डीलर द्वारा किए गए किसी भी अनुचित व्यापार व्यवहार या सेवा की कमी के लिए निर्माता कंपनी को कानूनी रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

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मामले की सुनवाई के दौरान टाटा मोटर्स की ओर से पेश अधिवक्ता ऋतु राज ने स्पष्ट किया कि कंपनी ने यह गाड़ी स्वतंत्र व्यावसायिक लेनदेन के तहत हिंद मोटर्स को 6.39 लाख रुपये में बेची थी। उन्होंने तर्क दिया कि टाटा मोटर्स और गाड़ी खरीदने वाले ग्राहक के बीच सीधे तौर पर कोई संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्ट) संबंध नहीं था, इसलिए डीलर की स्वतंत्र गड़बड़ी के लिए कंपनी को उत्तरदायी नहीं बनाया जा सकता।

क्या था पूरा विवाद

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इस विवाद की शुरुआत 25 अक्टूबर 2011 को हुई थी, जब पटियाला जिले के निवासी साधु सिंह ने मेसर्स हिंद मोटर्स इंडिया लिमिटेड से 7 लाख रुपये से अधिक की कीमत में टाटा मांजा एलान कार खरीदी थी। शिकायतकर्ता के अनुसार, गाड़ी की डिलीवरी लेते ही उसमें कई यांत्रिक गड़बड़ियां सामने आईं, जिसकी शिकायत उन्होंने अगले ही दिन डीलर से की। डीलर के वर्कशॉप में बार-बार गाड़ी ले जाने के बाद भी इन समस्याओं को ठीक नहीं किया जा सका।

इसके बाद साधु सिंह ने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने गाड़ी बदलने, मानसिक उत्पीड़न के मुआवजे और मुकदमेबाजी के खर्च की मांग की थी। जिला फोरम ने 21 अगस्त 2012 को अपने आदेश में माना कि हिंद मोटर्स ने टेस्ट-ड्राइव (डेमो) के लिए इस्तेमाल की जाने वाली पुरानी कार को नई बताकर बेचा था, जो अनुचित व्यापार व्यवहार की श्रेणी में आता है। जिला फोरम ने डीलर को आदेश दिया था कि वह गाड़ी वापस ले, ब्याज सहित पूरी रकम लौटाए और ग्राहक को 2 लाख रुपये का मुआवजा तथा 20,000 रुपये अदालती खर्च के तौर पर भुगतान करे।

मुआवजे की रकम और पुराना आदेश बहाल

जिला फोरम के इस फैसले को डीलर हिंद मोटर्स ने पंजाब राज्य उपभोक्ता आयोग में चुनौती दी थी। राज्य आयोग ने 13 फरवरी 2014 को अपने फैसले में बदलाव करते हुए टाटा मोटर्स को भी संयुक्त रूप से जिम्मेदार घोषित कर दिया। इसके साथ ही राज्य आयोग ने ग्राहक को मिलने वाली मुआवजा राशि को 2 लाख रुपये से घटाकर 1 लाख रुपये कर दिया था।

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इस फैसले के खिलाफ साधु सिंह के बेटे रणजीत सिंह ने अपने पिता की ओर से 2014 में राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC) का रुख किया। रणजीत सिंह ने दलील दी कि डीलर ने गाड़ी बेचने के दौरान ऐसा कोई कागजात नहीं दिया जिससे पता चले कि यह एक डेमो या टेस्ट-ड्राइव गाड़ी थी। गाड़ी का इनवॉइस (बिल) और रजिस्ट्रेशन के कागजात इसे बिल्कुल नई कार के रूप में दर्शाते थे।

राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने अपने अंतिम फैसले में राज्य आयोग द्वारा मुआवजा राशि घटाए जाने को पूरी तरह अनुचित माना। आयोग ने जिला फोरम के 2012 के आदेश को पूरी तरह बहाल करते हुए हिंद मोटर्स को आदेश दिया कि वह ब्याज सहित पूरा रिफंड दे, 2 लाख रुपये का मुआवजा चुकाए और 20,000 रुपये मुकदमा खर्च के रूप में भुगतान करे। टाटा मोटर्स को इस पूरे मामले में सभी दायित्वों से मुक्त कर दिया गया है।

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