एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले में पिछले साढ़े सात साल से जेल में बंद वकील सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने गाडलिंग के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की त्वरित सुनवाई की मांग के बाद यह भरोसा दिया। कोर्ट में पक्ष रखते हुए सिब्बल ने कहा कि हालांकि इस जमानत याचिका पर पहला नोटिस साल 2023 में ही जारी किया गया था, लेकिन जजों के खुद को मामले से अलग करने (recusals) के चलते इस पर सुनवाई लगातार टलती रही। इस पर पीठ ने आश्वस्त किया कि वे इस मामले को अगले एक हफ्ते या उसके आसपास सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करेंगे।
सुनवाई टलने का लंबा इतिहास
गाडलिंग की जमानत याचिका में हो रही इस लंबी देरी पर उनके वकीलों ने पहले भी चिंता जताई है। पिछले साल 8 अगस्त 2025 को गाडलिंग का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई से इस मामले में जल्द सुनवाई का अनुरोध किया था। ग्रोवर ने तब कोर्ट का ध्यान दिलाया था कि सुप्रीम कोर्ट में इस जमानत याचिका पर सुनवाई अब तक 11 बार टल चुकी है।
इससे पहले, पिछले साल 27 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने गाडलिंग और इस मामले की सह-आरोपी व सामाजिक कार्यकर्ता ज्योति जगताप की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई टाल दी थी। इसी सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की उस याचिका पर भी विचार टाल दिया था जिसमें कार्यकर्ता महेश राउत को मिली जमानत को चुनौती दी गई थी। गौरतलब है कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने राउत को जमानत दे दी थी, लेकिन एनआईए की अपील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी थी।
गाडलिंग पर लगे आरोप और पूरा मामला
अभियोजन पक्ष ने सुरेंद्र गाडलिंग पर कड़े आतंकवाद विरोधी कानून गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। जांच एजेंसियों का आरोप है कि गाडलिंग ने प्रतिबंधित माओवादी विद्रोहियों को रसद और अन्य सहायता पहुंचाई। इसके अलावा उन पर फरार आरोपियों के साथ मिलकर साजिश रचने और भूमिगत नक्सलियों के साथ सरकार की गुप्त जानकारियां व संवेदनशील नक्शे साझा करने के आरोप हैं।
सरकारी पक्ष के मुताबिक, गाडलिंग ने स्थानीय लोगों को माओवादी आंदोलन से जुड़ने के लिए उकसाया और विद्रोही समूहों को सुरजागढ़ खदानों के काम का विरोध करने के निर्देश दिए। उनके खिलाफ यह मामला 31 दिसंबर 2017 को पुणे के शनिवारवाड़ा किले में आयोजित एल्गार परिषद सम्मेलन में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों से भी जुड़ा है। पुलिस का दावा है कि इन भाषणों की वजह से ही अगले दिन पुणे जिले के कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसक झड़पें हुई थीं।
सह-आरोपियों की कानूनी स्थिति
इस मामले की सह-आरोपी ज्योति जगताप को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के फरवरी 2022 के उस आदेश के खिलाफ उनकी अपील खारिज कर दी थी, जिसमें उन्हें जमानत देने से मना किया गया था। हाईकोर्ट ने पाया कि जगताप ‘कबीर कला मंच’ की सक्रिय सदस्य थीं। इस समूह ने 2017 के सम्मेलन के दौरान एक नाटक का मंचन किया था, जिसमें न केवल आक्रामक बल्कि बेहद भड़काऊ नारे लगाए गए थे। एनआईए के अनुसार, कबीर कला मंच प्रतिबंधित संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) का ही एक मुखौटा संगठन है।

