रजिस्टर्ड सेल डीड पर लागू नहीं होती साक्ष्य अधिनियम की धारा 68, केवल अनिवार्य रूप से सत्यापित होने वाले दस्तावेजों पर ही होगी लागू: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय में स्पष्ट किया है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 68 केवल उन दस्तावेजों पर लागू होती है जिन्हें कानूनन गवाहों द्वारा सत्यापित (अटेस्ट) कराना अनिवार्य होता है, और रजिस्टर्ड सेल डीड (बिक्री विलेख) पर यह धारा लागू नहीं होती। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने केरल हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने प्रक्रियात्मक और कानून की व्याख्या से जुड़ी गंभीर गलतियां की थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को हाईकोर्ट के पास नए सिरे से सुनवाई के लिए भेज दिया है।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह पूरा विवाद ‘ए’ शेड्यूल नाम की 13 सेंट जमीन को लेकर शुरू हुआ था। इस संपत्ति का आधा हिस्सा यानी 6.5 सेंट (जिसे मुकदमे में ‘बी’ शेड्यूल कहा गया) मूल रूप से राजेश्वरी (प्रतिवादी संख्या 3) का था, जो उन्हें 1978 के एक बंटवारे के जरिए मिला था। बाकी आधा हिस्सा अशोक कुमार और ललिता के पास था।

19 दिसंबर 1978 को राजेश्वरी ने अपने हिस्से की 6.5 सेंट जमीन वनजाक्षी नाम की महिला को एक रजिस्टर्ड सेल डीड (दस्तावेज संख्या ए-3) के माध्यम से बेच दी। इसके बाद, 31 दिसंबर 1979 को अशोक कुमार, ललिता और वनजाक्षी ने मिलकर इस पूरी 13 सेंट जमीन को मूल वादी रुद्रायणी देवकी (जिनके कानूनी प्रतिनिधि अब इस मुकदमे में शामिल हैं) को एक रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए बेच दिया।

विवाद तब खड़ा हुआ जब राजेश्वरी ने 24 जनवरी 1996 को उसी 6.5 सेंट जमीन के लिए आर. वेरोनिका और एक अन्य व्यक्ति (अपीलकर्ता/प्रतिवादी संख्या 1 और 2) के पक्ष में एक और सेल डीड (दस्तावेज संख्या ए-4) निष्पादित कर दी। इस डीड के आधार पर अपीलकर्ताओं ने कथित तौर पर जमीन पर जबरन कब्जा कर लिया और निर्माण शुरू कर दिया। इसके विरोध में वादी ने नेदुमंगाड की मुंसिफ कोर्ट में मुकदमा दायर कर अपने मालिकाना हक की घोषणा, कब्जा वापस दिलाने और 1996 की सेल डीड को रद्द करने की मांग की।

प्रतिवादियों ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि राजेश्वरी ने कभी भी वनजाक्षी को 1978 वाली सेल डीड नहीं बेची थी और वादी के मालिकाना हक के दस्तावेज फर्जी हैं।

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निचली अदालतों का सफर

ट्रायल कोर्ट ने वादी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए 1996 की सेल डीड को अमान्य घोषित कर दिया। कोर्ट ने इस मामले में गवाह (पीडब्ल्यू-3, जो मृतक वनजाक्षी के पति थे) की गवाही को विश्वसनीय माना।

लेकिन, जब मामला अपील में गया तो प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया और मुकदमा खारिज कर दिया। कोर्ट का मानना था कि कोर्ट कमिश्नर संपत्तियों की ठीक से पहचान करने में विफल रहे और गवाह पीडब्ल्यू-3 की गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि राजेश्वरी ने खुद 1978 की डीड के निष्पादन से इनकार किया था।

इसके बाद वादी ने केरल हाईकोर्ट में दूसरी अपील दायर की। हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बहाल कर दिया। हाईकोर्ट ने तर्क दिया कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 के परंतु (प्रोविसो) के तहत, किसी भी दस्तावेज के निष्पादन से इनकार केवल उस व्यक्ति द्वारा ही किया जाना चाहिए जिसने उसे निष्पादित किया है, और वह भी उसके द्वारा दायर किसी स्वतंत्र मुकदमे या काउंटर क्लेम के माध्यम से। चूंकि राजेश्वरी ने ऐसा कोई मुकदमा दायर नहीं किया था, इसलिए हाईकोर्ट ने माना कि वादी के लिए सेल डीड को साबित करने के लिए किसी गवाह को बुलाना जरूरी नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट में पक्षों की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 100 के तहत दूसरी अपील का फैसला करते समय कानून का कोई भी महत्वपूर्ण प्रश्न तय नहीं किया, जो कि एक गंभीर कानूनी भूल है। इसके अलावा, अपीलकर्ताओं का कहना था कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 को लेकर हाईकोर्ट की व्याख्या गलत थी, क्योंकि कानून किसी व्यक्ति को किसी दस्तावेज के निष्पादन से इनकार करने के लिए अलग से मुकदमा दायर करने के लिए मजबूर नहीं करता।

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दूसरी ओर, प्रतिवादियों का कहना था कि हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण बिल्कुल सही था। उनका दावा था कि 1978 की सेल डीड को कानूनन सही साबित किया गया था और अपीलीय अदालत के पास गवाह की गवाही को खारिज करने का कोई ठोस कारण नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दो प्रमुख बिंदुओं पर विचार किया – पहला प्रक्रियात्मक नियम और दूसरा साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 की व्याख्या।

प्रक्रियात्मक स्तर पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीपीसी की धारा 100 के तहत किसी भी दूसरी अपील पर सुनवाई करने और फैसला सुनाने के लिए हाईकोर्ट द्वारा कानून का एक महत्वपूर्ण प्रश्न तय करना अनिवार्य है। ऐसा किए बिना सीधे मेरिट पर फैसला सुनाना हाईकोर्ट के निर्णय को कानूनी रूप से अमान्य बना देता है।

मुख्य कानूनी मुद्दे पर बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 54 के अनुसार, बिक्री विलेख (सेल डीड) को प्रमाणित करने के लिए गवाहों के हस्ताक्षर अनिवार्य नहीं हैं। चूंकि सेल डीड के लिए कानूनन सत्यापन (अटेस्टेशन) जरूरी नहीं है, इसलिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 — जो केवल कानूनन सत्यापित किए जाने वाले दस्तावेजों को साबित करने की प्रक्रिया बताती है — इस मामले में बिल्कुल लागू नहीं होती।

पीठ ने विशेष रूप से टिप्पणी की: “चूंकि कानूनन बिक्री विलेख (सेल डीड) के लिए गवाहों द्वारा सत्यापित किया जाना आवश्यक नहीं है, इसलिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 के प्रावधान प्रत्यक्ष तौर पर इस पर लागू नहीं होते हैं।”

कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने धारा 68 के परंतु (प्रोविसो) को समझने में गलती की। यह परंतु केवल उन दस्तावेजों पर लागू होता है जिनका कानूनन सत्यापन जरूरी होता है (जैसे गिफ्ट डीड या मॉर्टगेज डीड), और सेल डीड पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।

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कानूनी व्याख्या के नियमों पर चर्चा करते हुए पीठ ने कहा: “व्याख्या का यह एक बुनियादी नियम है कि किसी कानून के विशेष प्रावधान का परंतु (प्रोविसो) केवल उसी क्षेत्र को कवर करता है जो मुख्य प्रावधान के अंतर्गत आता है। यह उस मुख्य प्रावधान के लिए एक अपवाद तैयार करता है जिसके लिए इसे एक परंतु के रूप में शामिल किया गया है, न कि किसी अन्य प्रावधान के लिए (…)”

इसलिए, चूंकि धारा 68 का मुख्य भाग केवल उन दस्तावेजों पर लागू होता है जिनके लिए सत्यापन अनिवार्य है, इसलिए इसके परंतु का उपयोग रजिस्टर्ड सेल डीड के संबंध में एक स्वतंत्र नियम बनाने के लिए नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट के फैसले में प्रक्रियात्मक और व्यावहारिक दोनों ही स्तरों पर गंभीर खामियां पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने इस मामले को वापस केरल हाईकोर्ट भेज दिया है। हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न तय कर तीन महीने के भीतर इस दूसरी अपील का नए सिरे से निपटारा करे।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: आर. वेरोनिका एवं अन्य बनाम रुद्रायणी देवकी (मृतक) कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से एस. सथ कुमार एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 6526 ऑफ 2024 (@ स्पेशल लीव पिटीशन (सिविल) संख्या 27109/2018)
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा
निर्णय की तिथि: 14 जुलाई, 2026

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