लापता रिकॉर्ड और कानूनी समय-सीमा बीतने के आधार पर हिमाचल हाईकोर्ट ने रद्द की 15 साल पुरानी एफआईआर

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में चोरी के 15 साल पुराने एक मामले को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की है कि सिर्फ एफआईआर दर्ज होने और उस पर कोई कार्रवाई न होने की वजह से किसी भी व्यक्ति को हमेशा के लिए कठघरे में खड़ा नहीं रखा जा सकता। जस्टिस राकेश कैंथला ने इस मामले पर 13 जुलाई को फैसला सुनाते हुए कहा कि जब केस से जुड़े सरकारी दस्तावेज ही लापता हैं और कानूनी मियाद भी समाप्त हो चुकी है, तो ऐसी निष्क्रिय एफआईआर को जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है।

पासपोर्ट आवेदन खारिज होने पर खुला मामला

यह पूरा मामला तब सामने आया जब याचिकाकर्ता ने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया और 1 जनवरी 2024 को पुलिस ने उसके खिलाफ लंबित एफआईआर का हवाला देते हुए निगेटिव वेरिफिकेशन रिपोर्ट जारी कर दी। याचिकाकर्ता का कहना था कि साल 2010 में एफआईआर दर्ज होने के बाद से पिछले 15 सालों में उन्हें पुलिस या अदालत की तरफ से कोई समन, नोटिस या किसी भी तरह की सूचना नहीं मिली थी।

जांच के दौरान फाइलों का नहीं मिला कोई सुराग

पासपोर्ट खारिज होने के बाद जब याचिकाकर्ता ने सिरमौर जिले के नाहन पुलिस थाने से संपर्क किया, तो थाना प्रभारी (एसएचओ) ने बताया कि मामले की फाइल 4 जनवरी 2010 को ही ट्रायल कोर्ट भेज दी गई थी। हालांकि, जब ट्रायल कोर्ट में इसकी पड़ताल की गई तो पता चला कि वहां केस का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है। अदालत ने पुलिस को उपलब्ध दस्तावेज पेश करने का निर्देश दिया, लेकिन पुलिस फाइल पेश करने में पूरी तरह असमर्थ रही। सत्र ट्रायल कोर्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट के पास केवल एफआईआर और जमानत के दस्तावेज ही उपलब्ध थे, जबकि मामले की मुख्य चार्जशीट का कोई अता-पता नहीं था।

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कार्रवाई की कानूनी समय-सीमा हुई समाप्त

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील राजेश कुमार ने दलील दी कि चोरी के मामलों में कानूनी कार्रवाई शुरू करने की अधिकतम समय-सीमा तीन साल की होती है, जो बहुत पहले ही समाप्त हो चुकी है। इतने सालों तक कोई कार्यवाही न होने के बाद भी एफआईआर को सक्रिय रखना याचिकाकर्ता के अधिकारों का हनन है।

दूसरी ओर, राज्य सरकार का पक्ष रख रहे अतिरिक्त महाधिवक्ता लोकेंद्र कुटलहरिया ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने दावा किया कि पुलिस ने चार्जशीट कोर्ट में जमा कर दी थी, भले ही उसकी प्राप्ति रसीद उपलब्ध नहीं है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चोरी का सामान बरामद कर लिया गया था, इसलिए एफआईआर को रद्द नहीं किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने रद्द की सभी कानूनी कार्यवाहियां

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हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की इन दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि न तो ट्रायल कोर्ट और न ही पुलिस के पास ऐसा कोई रिकॉर्ड है जो यह साबित कर सके कि चार्जशीट समय पर जमा की गई थी। जस्टिस कैंथला ने स्पष्ट किया कि चूंकि चोरी के मामले में कार्रवाई की तीन साल की कानूनी अवधि बीत चुकी है, इसलिए ट्रायल कोर्ट के लिए अब किसी भी तरह की कानूनी कार्यवाही शुरू करना संभव नहीं है।

अदालत ने इस निष्क्रिय एफआईआर और उससे जुड़ी तमाम कानूनी कार्यवाहियों को तुरंत प्रभाव से निरस्त कर दिया। याचिकाकर्ता को बड़ी राहत देते हुए हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि वह कोर्ट की वेबसाइट से इस फैसले की कॉपी डाउनलोड कर संबंधित विभागों में जमा कर सकते हैं। इसके साथ ही संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे फैसले की प्रमाणित कागजी प्रति के लिए जोर न दें और जरूरत पड़ने पर कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट से ही आदेश की पुष्टि कर लें।

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