केरल हाईकोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाते हुए तिरुवनंतपुरम नगर निगम के एक जेल में बंद पार्षद को जेल परिसर के भीतर ही पद की शपथ लेने की अनुमति दे दी है। सोमवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पी वी कुन्हीकृष्णन ने स्पष्ट किया कि जब असाधारण परिस्थितियां सामने हों, तो लोकतंत्र की रक्षा के लिए अदालत को भी असाधारण कानूनी कदम उठाने पड़ते हैं। अदालत ने कहा कि केवल तकनीकी या प्रक्रियात्मक कमियों के चलते मतदाताओं के जनादेश को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
जेल परिसर में शपथ ग्रहण की तैयारी
हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, यह शपथ ग्रहण समारोह मंगलवार, 14 जुलाई को सुबह 11:00 बजे विय्यूर सेंट्रल जेल और सुधार गृह के भीतर आयोजित किया जाएगा। अदालत ने विय्यूर जेल के अधीक्षक को इस समारोह के लिए सभी जरूरी इंतजाम करने का निर्देश दिया है। कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के लिए तिरुवनंतपुरम की मेयर और निगम के बेहद सीमित अधिकारियों को जेल के भीतर जाने की अनुमति दी गई है। इसके साथ ही, इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए मान्यता प्राप्त मीडियाकर्मियों को भी जेल के भीतर समारोह की रिपोर्टिंग करने की इजाजत दी गई है।
शपथ रद्द होने और गिरफ्तारी का पूरा मामला
यह मामला तिरुवनंतपुरम नगर निगम के वार्ड संख्या 20 (वाझोट्टूकोनम) से निर्वाचित हुए 43 वर्षीय पार्षद सुगथन आर से जुड़ा है। सुगथन ने 9 दिसंबर 2025 को हुए स्थानीय निकाय चुनावों में जीत हासिल की थी, जिसके नतीजे 13 दिसंबर को घोषित किए गए थे। उन्होंने 21 दिसंबर 2025 को पहली बार शपथ लेकर कार्यभार संभाला था।
हालांकि, केरल हाईकोर्ट ने 24 जून 2026 को दिए अपने एक फैसले में सुगथन समेत कई पार्षदों की शपथ को केरल नगरपालिका अधिनियम के प्रावधानों के अनुकूल न पाते हुए अमान्य घोषित कर दिया था। अदालत ने सभी प्रभावित पार्षदों को चार सप्ताह के भीतर दोबारा शपथ लेने का निर्देश दिया था।
अन्य पार्षदों ने इस आदेश का पालन करते हुए दोबारा शपथ ले ली, लेकिन सुगथन इसी बीच ‘केरल असामाजिक गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम’ (कापा – KAAPA) के तहत हिरासत में ले लिए गए। निगम प्रशासन ने दोबारा शपथ ग्रहण के लिए 14 जुलाई की तारीख तय की थी। सुगथन ने समारोह में शामिल होने के लिए नेदुमंगड की न्यायिक प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट अदालत-द्वितीय से दो आपराधिक मामलों में अंतरिम जमानत भी हासिल कर ली थी, लेकिन ‘कापा’ के तहत निवारक निरोध (प्रिवेंटिव डिटेंशन) आदेश के कारण उन्हें जेल से रिहा नहीं किया जा सका। जेल से बाहर आने का कोई रास्ता न देख उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर प्रशासनिक स्तर पर शपथ दिलाने की मांग की थी।
संविधान और कानून के दायरे में दलीलें
अदालत की कार्यवाही के दौरान अभियोजन पक्ष के महानिदेशक टी आसफ अली ने तर्क दिया कि निवारक निरोध के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को कस्टडी से रिहा नहीं किया जा सकता। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 22(3) का हवाला देते हुए कहा कि गिरफ्तार लोगों को मिलने वाले बुनियादी संवैधानिक अधिकार निवारक बंदियों पर लागू नहीं होते। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने अदालत को आश्वस्त किया कि यदि आदेश दिया जाता है, तो वह जेल परिसर के भीतर ही शपथ दिलाने के लिए आवश्यक प्रशासनिक व्यवस्था करने को तैयार है।
इससे पहले अदालत ने राज्य सरकार से यह भी पूछा था कि क्या जेल के भीतर शपथ दिलाना कानूनी और प्रशासनिक रूप से व्यावहारिक है, क्योंकि जनप्रतिनिधि की अनुपस्थिति से स्थानीय निकाय के कामकाज पर असर पड़ सकता था।
लोकतंत्र और जनमत की रक्षा अदालत का कर्तव्य
अपने फैसले में जस्टिस कुन्हीकृष्णन ने कहा कि जब किसी तकनीकी भूल के कारण लोकतांत्रिक व्यवस्था ठप होने की कगार पर पहुंच जाए, तो संविधान और कानून के शासन को मजबूत करना अदालत का पहला कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि चुने हुए प्रतिनिधि को शपथ लेने से रोकने के स्थानीय शासन पर बेहद गंभीर परिणाम होंगे।
अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत लोकतंत्र केवल बहुमत का खेल नहीं है, बल्कि यह स्थापित नियमों, प्रक्रियाओं और संस्थागत मर्यादाओं से चलने वाली एक अनुशासित व्यवस्था है। हाईकोर्ट का यह निर्देश लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि नियम-कायदों के भीतर रहकर जनमत का सम्मान करने के लिए है।

