अहमदाबाद सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 38 दोषियों की मौत की सजा की पुष्टि कर दी है। हाईकोर्ट ने आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) से जुड़े इन दोषियों की फांसी के खिलाफ दायर सभी अपीलों को खारिज कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने इस गहरी साजिश में शामिल 11 अन्य दोषियों को दी गई उम्रकैद की सजा को भी बरकरार रखा है।
जस्टिस ए. वाई. कोगजे और जस्टिस समीर दवे की खंडपीठ ने 7 जुलाई को यह फैसला सुनाया था, जिसकी प्रति सोमवार को जारी की गई। इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने फरवरी 2022 में विशेष अदालत द्वारा दिए गए उस ऐतिहासिक फैसले को सही ठहराया है, जिसमें 38 लोगों को मौत की सजा और 11 को उम्रकैद सुनाई गई थी। राज्य सरकार ने भी मौत की सजा को बरकरार रखने की मांग की थी।
कठोर सजा के पीछे अदालत के तर्क
हाईकोर्ट ने फांसी की सजा की पुष्टि करते हुए कहा कि इस व्यापक आतंकी साजिश का मुख्य उद्देश्य समाज में बड़े पैमाने पर आतंक फैलाना था। कोर्ट के अनुसार, इस वीभत्स हमले में भारी संख्या में बेकसूर लोगों की जान गई, जिसके कारण दोषियों को कानून के तहत मिलने वाली अधिकतम सजा देना पूरी तरह न्यायसंगत है।
पीठ ने अपनी टिप्पणी में रेखांकित किया कि जिस तरह से इन सिलसिलेवार धमाकों को अंजाम दिया गया, वह दोषियों की क्रूर मानसिकता और निर्दोष लोगों की जान लेने पर उनके मन में किसी भी तरह के पछतावे के अभाव को दर्शाता है। कोर्ट ने यह भी पाया कि कई दोषियों का पुराना आपराधिक इतिहास रहा है और जेल में रहने के दौरान भी उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई थी। अदालत को रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी तथ्य नहीं मिला जिससे दोषियों के प्रति किसी भी तरह की नरमी बरती जाए या उनकी सजा कम की जाए।
उम्रकैद के दोषियों की भूमिका
खंडपीठ ने उम्रकैद पाने वाले 11 दोषियों के मामले में अभियोजन पक्ष के दावों को सही माना। कोर्ट ने कहा कि इन दोषियों ने आतंकी गतिविधियों के लिए रसद और अन्य महत्वपूर्ण सहायता जुटाई थी। इनमें गुजरात और केरल में आतंकी प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन करना, साजिशकर्ताओं को पनाह देना और धमाकों में इस्तेमाल किए गए स्कूटर, प्लास्टिक के डिब्बे तथा घड़ियां जैसी सामग्रियां एकत्र करना शामिल था।
इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने दोषियों पर लगाए गए जुर्माने की राशि को भी बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि जान-माल की भारी क्षति और सार्वजनिक संपत्तियों को पहुंचाए गए नुकसान को देखते हुए यह आर्थिक दंड पूरी तरह उचित है।
पीड़ितों के लिए मुआवजे का आदेश
हाईकोर्ट ने गुजरात सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस आतंकी हमले के पीड़ितों और उनके परिवारों को आर्थिक सहायता प्रदान करे। कोर्ट के आदेश के अनुसार, प्रत्येक मृतक के परिवार को 10 लाख रुपये और गंभीर रूप से घायल हुए व्यक्तियों को 5 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। सरकार को यह मुआवजा राशि 30 मार्च, 2027 से पहले वितरित करनी होगी।
70 मिनट में दहला था अहमदाबाद
यह पूरा मामला 26 जुलाई, 2008 का है, जब अहमदाबाद में केवल 70 मिनट के भीतर सिलसिलेवार ढंग से 21 बम धमाके किए गए थे। इन हमलों में 56 लोगों की मौत हो गई थी और 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। इस हमले की सबसे क्रूर कड़ी यह थी कि धमाके उन अस्पतालों में भी किए गए, जहां घायलों को इलाज के लिए ले जाया जा रहा था। भारतीय इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी आतंकी हमले में स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों को निशाना बनाया गया था।
एक साथ 38 को फांसी का ऐतिहासिक फैसला
इस मामले की जांच और सुनवाई भारतीय कानूनी इतिहास में बेहद विस्तृत रही है। पुलिस ने कुल 35 मामलों को आपस में जोड़कर जांच की थी, जिसमें अहमदाबाद में दर्ज 20 प्राथमिकियां (एफआईआर) और सूरत से बरामद हुए 15 जिंदा बमों के मामले शामिल थे। विशेष अदालत के समक्ष कुल 78 आरोपियों पर मुकदमा चलाया गया, जिनमें से 49 को दोषी करार दिया गया था।
सजा पाने वालों में प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का पूर्व प्रमुख सफदर नागोरी भी शामिल है। इसके अलावा, दोषी ठहराए गए अन्य लोग मध्य प्रदेश, केरल, उत्तर प्रदेश और गुजरात समेत देश के 11 राज्यों से संबंधित हैं।
हाईकोर्ट ने इस मामले की अपीलों पर डेढ़ साल से अधिक समय तक गहन सुनवाई की। इस साल फरवरी से इस मामले की रोजाना आधार पर सुनवाई की जा रही थी।
फरवरी 2022 में विशेष अदालत द्वारा सुनाया गया यह फैसला देश के कानूनी इतिहास का सबसे बड़ा फैसला था, जिसमें एक ही मामले में एक साथ 38 लोगों को मौत की सजा दी गई थी। इससे पहले, जनवरी 1998 में तमिलनाडु की टाडा अदालत ने वर्ष 1991 के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्याकांड में सभी 26 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी।

