बॉम्बे हाईकोर्ट ने साल 2006 के वन अधिकार कानून (फॉरेस्ट राइट्स एक्ट) को लागू करने में हो रही अत्यधिक देरी पर महाराष्ट्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस अजय एस गडकरी और जस्टिस कमल आर खाता की खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस कानून के प्रावधानों को पूरी तरह लागू करने के लिए एक निश्चित समय-सीमा तय करे। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त तय करते हुए वन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को एक विस्तृत हलफनामा दायर करने का आदेश दिया है, जिसमें कानून लागू न होने के कारणों और इसे लागू करने के प्रस्तावित समय-ढांचे का पूरा ब्योरा देना होगा।
अधिकारियों के सुस्त रवैये पर कोर्ट की नाराजगी
यह आदेश पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन ‘वनशक्ति’ द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून बनने के करीब दो दशक बाद भी राज्य में इसे ठीक से लागू न करना प्रशासनिक लापरवाही और संवेदनहीनता को दर्शाता है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि खुद सरकार ने भी यह स्वीकार किया है कि महाराष्ट्र में 2006 के इस महत्वपूर्ण अधिनियम को अब तक प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा सका है।
सरकार की दलील खारिज, 12 साल से लंबित है मामला
सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार के वकील ने दलील दी कि राज्य में आदिवासियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के अधिकारों की पहचान करने और उन्हें तय करने की प्रक्रिया अभी जारी है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। खंडपीठ ने कहा कि वह इस दलील को स्वीकार नहीं कर सकती क्योंकि वन अधिकारों को तय करने में 10 साल से अधिक का समय नहीं लगना चाहिए। कोर्ट ने इसे अधिकारियों का बेहद सुस्त और गैर-जिम्मेदाराना रवैया करार दिया और कहा कि ऐसा आचरण बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने इस बात पर भी गहरी चिंता जताई कि यह याचिका 7 अप्रैल 2014 से, यानी पिछले 12 सालों से अधिक समय से कोर्ट में लंबित है। कोर्ट ने कहा कि इतने लंबे समय में सरकार केवल तरह-तरह के बहाने बनाती रही है, लेकिन कानून के अनिवार्य प्रावधानों को लागू न करने का कोई ठोस या तर्कसंगत कारण पेश नहीं कर पाई है।
क्या है वन अधिकार कानून और इसके प्रावधान
साल 2006 में पारित किए गए ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम’ का मुख्य उद्देश्य वन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों को उनके कानूनी अधिकार देना है। इस कानून के तहत दो मुख्य श्रेणियों के अधिकारों को मान्यता दी गई है: पहला, व्यक्तिगत वन अधिकार (आईएफआर), जिसके जरिए वनवासियों को खेती और रहने के लिए जमीन का कानूनी अधिकार मिलता है। दूसरा, सामुदायिक वन संसाधन (सीएफआर) अधिकार, जो स्थानीय समुदायों को जंगलों का सामूहिक रूप से प्रबंधन, संरक्षण और टिकाऊ इस्तेमाल करने का अधिकार देता है।

