शिकायतकर्ता के मुकरने और स्वतंत्र गवाह न होने से एफआईआर या पुलिस की गवाही अमान्य नहीं होती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि एफआईआर दर्ज कराने वाला मुख्य शिकायतकर्ता अपने बयान से मुकर जाए या मौके पर कोई स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह मौजूद न हो, तो भी एफआईआर की प्रासंगिकता और पुलिस अधिकारियों की गवाही की विश्वसनीयता कम नहीं होती। जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की डिवीजन बेंच ने साल 1995 के एक हत्या और लूट के मामले में फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया। कोर्ट ने मुख्य आरोपी धर्मेंद्र सिंह की हत्या, लूट और चोरी की संपत्ति रखने के मामले में दोषसिद्धि को बरकरार रखा, जबकि आर्म्स एक्ट के तहत उसकी सजा को रद्द कर दिया। वहीं, दूसरे सह-आरोपी चरण सिंह को सबूतों के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 22 दिसंबर 1995 को दोपहर करीब 3:45 बजे मुरादाबाद रेलवे स्टेशन के पूर्वी गेट के पास हुई एक वारदात से जुड़ा है। बिहार के मुजफ्फरपुर के रहने वाले कारोबारी पप्पू उर्फ राज किशोर प्रसाद बर्तनों के कच्चे माल का व्यापार करते थे और मुरादाबाद के स्थानीय व्यापारियों से भुगतान लेने आते रहते थे। घटना वाले दिन उन्होंने मुरादाबाद के व्यापारियों सचिन, मोहम्मद नासिर, राजेश मेटल, ईश्वर और इब्राहिम से लगभग 1,25,000 रुपये नकद वसूले थे। वह सुरेश कुमार खन्ना (PW-2) और सुरेंद्र कुमार के साथ रिक्शे से रेलवे स्टेशन की ओर जा रहे थे।

जैसे ही वे स्टेशन के पूर्वी गेट के पास पहुंचे और पैदल चलने लगे, धर्मेंद्र सिंह, चरण सिंह और शेर सिंह ने उनके हाथ से पैसों से भरा सूटकेस छीनने की कोशिश की। पप्पू द्वारा विरोध किए जाने पर शेर सिंह ने उनके सीने में गोली मार दी, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। वहीं, धर्मेंद्र सिंह सूटकेस छीनकर भागने लगा। शेर सिंह और चरण सिंह रेलवे ट्रैक के रास्ते फरार हो गए, लेकिन धर्मेंद्र को रेलवे ओवरब्रिज पर पुलिस टीम ने रंगे हाथों पकड़ लिया, जिसका नेतृत्व एसएचओ हेमंत कुमार मिश्रा (PW-1) कर रहे थे। पुलिस ने धर्मेंद्र के पास से लूटा हुआ सूटकेस (जिसमें 1,25,000 रुपये और पप्पू का व्यक्तिगत सामान था) और एक 12 बोर का देसी तमंचा व तीन कारतूस बरामद किए।

ट्रायल कोर्ट ने 27 मार्च 2008 को धर्मेंद्र सिंह और चरण सिंह दोनों को आईपीसी की धारा 302/34 और 394 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। धर्मेंद्र को धारा 411 और आर्म्स एक्ट की धारा 25 के तहत भी सजा मिली थी। तीसरे आरोपी शेर सिंह की सुनवाई के दौरान ही मृत्यु हो गई थी, जिससे उसके खिलाफ मामला समाप्त हो गया था। दोनों दोषियों ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं के वकीलों ने तर्क दिया कि आरोपियों को अपराध से जोड़ने वाला कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मुख्य चश्मदीद गवाह और मामले के शिकायतकर्ता सुरेश कुमार खन्ना (PW-2) सहित अन्य गवाह मुकर (होस्टाइल हो) गए हैं। बचाव पक्ष का कहना था कि जब शिकायतकर्ता ने ही लिखित रिपोर्ट का समर्थन नहीं किया, तो अभियोजन का पूरा मामला खारिज हो जाता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सूटकेस की बरामदगी पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था और पुलिसकर्मी केवल अपने केस को साबित करने के लिए गवाह बने हैं।

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दूसरी तरफ, राज्य सरकार के अपर शासकीय अधिवक्ता (ए.जी.ए.) ने इन दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि भले ही गवाह मुकर गए हों, लेकिन उनके बयानों के मुख्य हिस्से से घटना की पुष्टि होती है जिसे पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता। पुलिसकर्मियों की आरोपियों से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी, इसलिए उनकी गवाही और मौके से रंगे हाथों हुई पैसों की बरामदगी धर्मेंद्र सिंह के अपराध को पूरी तरह साबित करती है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने मुकरे हुए गवाहों के बयानों और सुप्रीम कोर्ट के कानूनी मिसालों का बारीकी से अध्ययन किया।

शिकायतकर्ता के मुकरने के बावजूद एफआईआर की प्रासंगिकता

शिकायतकर्ता सुरेश कुमार खन्ना (PW-2) के इस दावे पर कि उसने पुलिस के लिखाने पर रिपोर्ट लिखी थी, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के गोवर्धन और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2025) मामले का हवाला दिया, जिसमें बबलू उर्फ गुरदीप सिंह बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2012) के फैसले का जिक्र था। कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“सिर्फ इसलिए कि मुख्य गवाह (PW-1/शिकायतकर्ता) मुकर गया है, यह नहीं कहा जा सकता कि एफआईआर अपनी पूरी प्रासंगिकता खो देगी और इसे किसी भी उद्देश्य के लिए नहीं देखा जा सकता।”

कोर्ट ने कहा कि हेड मोहर्रिर यशपाल सिंह (PW-14) द्वारा एफआईआर का दर्ज होना कानूनी रूप से साबित किया गया था, जिससे इसकी प्रासंगिकता और अभियोजन की कहानी को समर्थन मिलता रहता है।

पुलिस गवाहों की विश्वसनीयता

स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति में पुलिस की गवाही पर सवाल उठाने वाली दलीलों को कोर्ट ने पूरी तरह खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के गिरजा प्रसाद (मृत) विधिक प्रतिनिधि बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2007) मामले का उल्लेख करते हुए बेंच ने टिप्पणी की:

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“यह धारणा कि हर व्यक्ति ईमानदारी से काम करता है, किसी भी अन्य व्यक्ति की तरह ही एक पुलिस अधिकारी पर भी लागू होती है। केवल पुलिस बल से जुड़े होने के कारण उनके बयानों पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता।”

बेंच ने मधु उर्फ मधुरनाथ बनाम कर्नाटक राज्य (2014) का भी हवाला दिया और माना:

“इस बात पर कोई प्रतिबंध नहीं है कि एक पुलिसकर्मी गवाह नहीं बन सकता या उसकी गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता, बशर्ते वह विश्वास जगाने वाली हो।”

कोर्ट ने एसएचओ हेमंत कुमार मिश्रा (PW-1), एसआई टी.आर. कोठारी (PW-6) और एसआई महेंद्र सिंह त्यागी (PW-10) की गवाही को पूरी तरह विश्वसनीय और स्पष्ट माना।

वारदात के पीछे का मकसद

कोर्ट ने माना कि बरामद किए गए 1,25,000 रुपये के नोटों के बंडलों पर मुरादाबाद के विशिष्ट व्यापारियों के हस्ताक्षर और सील मौजूद थे, जिससे लूट और हत्या का एक बड़ा मकसद साबित होता है। आरोपियों को पप्पू के व्यापार और बड़ी रकम के बारे में पता था, जिसने उन्हें इस वारदात को अंजाम देने के लिए प्रेरित किया।

आर्म्स एक्ट और चरण सिंह की भूमिका

हाईकोर्ट ने अभियोजन के मामले में दो बड़ी कानूनी कमियों को रेखांकित किया। पहली यह कि आर्म्स एक्ट मामले की जांच करने वाले एसआई कैलाश चंद्र वर्मा (PW-9) ने बरामद तमंचे और कारतूसों को फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) नहीं भेजा और न ही खुद इसकी जांच की कि हथियार चालू हालत में था या नहीं। इस चूक के कारण हथियार को अपराध से नहीं जोड़ा जा सका, इसलिए धर्मेंद्र की आर्म्स एक्ट की धारा 25 के तहत सजा रद्द कर दी गई।

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दूसरा यह कि सह-आरोपी चरण सिंह की मौके पर मौजूदगी या उसकी सक्रिय भूमिका साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं मिला। उसे मौके पर गिरफ्तार नहीं किया गया था और न ही उसके पास से कोई संदिग्ध सामान मिला था, जिससे उसका इस अपराध में शामिल होना संदेहास्पद हो जाता है।

कोर्ट का निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में निम्नलिखित बदलाव किए:

  1. चरण सिंह: चरण सिंह की अपील को स्वीकार कर लिया गया। कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए उन्हें आईपीसी की धारा 302/34 और 394 के तहत सभी आरोपों से बरी कर दिया, साथ ही उनके जमानत बांड और प्रतिभूतियों को रद्द कर दिया।
  2. धर्मेंद्र सिंह: धर्मेंद्र सिंह की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया। कोर्ट ने आर्म्स एक्ट के तहत उनकी सजा को रद्द कर दिया, लेकिन आईपीसी की धारा 302/34 (आजीवन कारावास), 394 (10 वर्ष का सश्रम कारावास) और 411 (3 वर्ष का सश्रम कारावास) के तहत उनकी सजा को बरकरार रखा।
  3. धर्मेंद्र सिंह, जो इस समय जमानत पर हैं, उन्हें एक महीने के भीतर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम), मुरादाबाद के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है। ऐसा न करने पर सीजेएम मुरादाबाद को उनकी गिरफ्तारी के लिए गैर-जमानती वारंट जारी करने का निर्देश दिया गया है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: धर्मेंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2718/2008
पीठ: जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी
निर्णय की तिथि: 10 जुलाई, 2026

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