बच्चों के लिए ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबंध की मांग: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बच्चों को ऑनलाइन गेमिंग की लत और इसके दुष्प्रभावों से बचाने के लिए दायर एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। कोर्ट ने केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर इस मामले पर अपना रुख स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। इस याचिका में बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म ‘रोब्लॉक्स’ (Roblox) और इसी तरह के अन्य डिजिटल ऐप्स पर नाबालिगों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने की मांग की गई है।

न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने पेशे से वकील रानी सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका पर यह सुनवाई की। याचिकाकर्ता ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, इंटरनेट सुरक्षा और उनके व्यवहार पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभावों को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है।

जागरूकता अभियान और विशेषज्ञ समिति के गठन की मांग

याचिका में केवल प्रतिबंध लगाने तक ही सीमित न रहकर व्यापक सुधारात्मक कदम उठाने की पैरवी की गई है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में विशेष जागरूकता अभियान चलाए जाएं ताकि बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों को रोब्लॉक्स जैसे डिजिटल गेम्स से जुड़े शारीरिक, मानसिक और सुरक्षा संबंधी खतरों के प्रति सचेत किया जा सके।

इसके साथ ही, याचिका में एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करने की भी अपील की गई है। इस प्रस्तावित समिति में बाल मनोवैज्ञानिकों, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों, एआई मॉडरेटरों और कानून प्रवर्तन अधिकारियों को शामिल करने का सुझाव दिया गया है, ताकि वे ऑनलाइन गेमिंग के खतरों का गहन विश्लेषण कर तत्काल सुरक्षा दिशानिर्देश तैयार कर सकें।

READ ALSO  अवमानना ​​मामलों में मूल डाक रसीदों की उचित फाइलिंग सुनिश्चित करें: इलाहाबाद हाईकोर्ट

बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर

दायर याचिका के अनुसार, अत्यधिक गेमिंग के कारण बच्चों की दिनचर्या बुरी तरह प्रभावित हो रही है। उनके खान-पान और सोने की आदतों पर इसका गहरा असर पड़ रहा है। बच्चे स्क्रीन टाइम को कम करने या गेम बंद करके किसी अन्य काम में ध्यान लगाने की बात पर अत्यधिक चिड़चिड़े हो जाते हैं और भारी मानसिक तनाव महसूस करते हैं। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि बच्चे क्या सही है और क्या गलत, इसका निर्णय खुद न लेकर उसी ऑनलाइन कंटेंट से प्रभावित हो रहे हैं जिसे वे लगातार देख रहे हैं।

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से सेलिना जेटली के भाई के लिए दुबई की लॉ फर्म को अधिकृत करने का निर्देश दिया

शोध में इंटरनेट एडिक्शन के चौंकाने वाले आंकड़े

याचिका में इन चिंताओं की पुष्टि के लिए पीजीआईएमईआर (PGIMER) चंडीगढ़ के मनोरोग विभाग द्वारा किए गए एक अध्ययन का हवाला दिया गया है। इस शोध के मुताबिक, करीब 15.9 प्रतिशत युवा गंभीर रूप से इंटरनेट एडिक्शन (लत) के शिकार हैं। यह लत युवाओं में डिप्रेशन (अवसाद) और एंग्जायटी (चिंता) को बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभा रही है।

अध्ययन के सह-लेखक डॉ. असीम मेहरा ने इस विषय पर जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि हर समय इंटरनेट की आसान उपलब्धता के कारण लोग अब वास्तविक मानवीय संपर्क से दूर हो रहे हैं और अनजाने में इस लत के जाल में फंसते जा रहे हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अब केवल किशोर ही नहीं, बल्कि उससे भी बेहद कम उम्र के बच्चे गेमिंग और इंटरनेट की लत के कारण क्लीनिकों में इलाज के लिए पहुंच रहे हैं।

READ ALSO  कर्नाटक हाईकोर्ट ने संतोष पाटिल मामले में 2022 के विरोध प्रदर्शन के लिए सीएम और कांग्रेस नेताओं पर जुर्माना लगाया
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles