नाबालिग की उम्र का सबूत छिपाकर आरोपी को बचाने का मामला:मध्य प्रदेश  हाईकोर्ट ने डीजीपी को पुलिस अधिकारी और स्कूल प्रिंसिपल पर कार्रवाई के दिए निर्देश

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक नाबालिग लड़की की उम्र से जुड़े अहम दस्तावेजों को छिपाने और आरोपी को बरी कराने में मदद करने के गंभीर मामले में कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि वे इस मामले के जांच अधिकारी और संबंधित स्कूल के प्रिंसिपल के खिलाफ एक महीने के भीतर अनुशासनात्मक कार्रवाई पर फैसला लें।

जस्टिस जी. एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने इस लापरवाही पर कड़ा रोष जताया है। कोर्ट ने डीजीपी को आदेश दिया कि वे इस अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुपालन रिपोर्ट 12 अगस्त 2026 तक हाईकोर्ट के प्रधान रजिस्ट्रार के समक्ष पेश करें। खंडपीठ का आरोप है कि जांच अधिकारी और स्कूल प्रिंसिपल ने लड़की की असली उम्र के सबूतों को दबाकर अदालती कार्यवाही के साथ धोखा किया है। इसी संदेहास्पद जांच के आधार पर एक निचली अदालत ने आरोपी को पहले ही बरी कर दिया था।

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई

यह पूरा मामला रवि प्रजापति नाम के व्यक्ति द्वारा दायर की गई एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) की सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि वन स्टॉप सेंटर में सुरक्षात्मक कस्टडी में रखी गई किशोरी को तुरंत रिहा किया जाए। उसका दावा था कि एक निचली अदालत ने पहले ही लड़की को बालिग घोषित कर दिया है, इसलिए उसे वहां रखना अवैध है। हालांकि, हाईकोर्ट ने जब स्कूल और प्रशासनिक रिकॉर्ड्स के मूल रजिस्टरों की खुद जांच की, तो लड़की की वास्तविक जन्मतिथि 10 फरवरी 2009 पाई गई। इस लिहाज से वह अभी 17 साल की नाबालिग है। कोर्ट ने आदेश दिया कि 18 वर्ष की आयु पूरी होने तक उसे वन स्टॉप सेंटर में ही रहना होगा।

स्कूल के दो रजिस्टरों से खुला गड़बड़ी का राज

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मामले की तह तक जाने के लिए हाईकोर्ट ने मूल केस डायरी और स्कूल के मूल एडमिशन रजिस्टर को अपने पास मंगवाया था। रिकॉर्ड की जांच में पता चला कि स्कूल में साल 2015 के दो अलग-अलग एडमिशन रजिस्टर मौजूद थे। जुलाई 2015 के पहले रजिस्टर में लड़की की जन्मतिथि 10 मई 2008 दर्ज थी। वहीं, सितंबर 2015 में आधार कार्ड और जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर तैयार किए गए दूसरे संशोधित रजिस्टर में उसकी सही जन्मतिथि 10 फरवरी 2009 दर्ज की गई थी।

इसके बावजूद, स्कूल के प्रिंसिपल ने संशोधित रिकॉर्ड को जानबूझकर छिपाया और केवल पुराने रजिस्टर के आधार पर आयु प्रमाण पत्र जारी कर दिया। इसके अलावा, योजना, आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग द्वारा जारी प्रमाण पत्र, नगर पालिका के जन्म प्रमाण पत्र और लाडली लक्ष्मी योजना के सभी सरकारी दस्तावेजों में भी लड़की की जन्मतिथि सर्वसम्मति से 10 फरवरी 2009 ही दर्ज पाई गई।

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पुलिस के उदासीन रवैये पर कोर्ट की फटकार

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी ने लड़की के माता-पिता से उसकी पढ़ाई से जुड़े मूल दस्तावेज हासिल करने का कोई प्रयास नहीं किया था। कोर्ट ने कहा कि इन महत्वपूर्ण दस्तावेजों को जानबूझकर छिपाए जाने के कारण निचली अदालत को यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि अभियोजन पक्ष लड़की के नाबालिग होने का संदेह से परे सबूत पेश नहीं कर सका।

राज्य पुलिस की आलोचना करते हुए हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि नाबालिग लड़कियों से जुड़े संवेदनशील मामलों में ऐसा संवेदनहीन और उदासीन रवैया अपनाने वाले पुलिस अधिकारियों को बिना सजा के कैसे छोड़ा जा सकता है। कोर्ट ने याद दिलाया कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत उम्र निर्धारण के लिए स्कूल के प्रमाण पत्र को सबसे अहम दस्तावेज माना गया है, ऐसे में प्रिंसिपल और जांच अधिकारी की भूमिका बेहद गैर-जिम्मेदाराना रही है।

अपील पर नए सिरे से विचार करने की तैयारी

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आरोपी रवि प्रजापति को निचली अदालत से बरी किए जाने के खिलाफ राज्य सरकार की अपील वर्तमान में हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ के समक्ष विचाराधीन है। खंडपीठ ने इस आदेश की एक प्रति अपील रिकॉर्ड में शामिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि राज्य सरकार लड़की की सही उम्र से जुड़े इन नए और प्रमाणित वैज्ञानिक सबूतों को अदालत के सामने रखने के लिए एक नया आवेदन दायर कर सकती है।

कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि लड़की के नाबालिग होने के कारण उसे याचिकाकर्ता के साथ जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। वह 18 वर्ष की आयु पूरी होने तक वन स्टॉप सेंटर में ही रहेगी, जिसके बाद वह अपनी मर्जी से जीवन जीने के लिए स्वतंत्र होगी।

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