कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य विधानसभा की एक समिति के उस निर्देश को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसमें भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी), बेंगलुरु को यौन उत्पीड़न के आरोपों में बर्खास्त किए गए एक पूर्व असिस्टेंट प्रोफेसर को नौकरी पर वापस रखने का आदेश दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी विधायी समिति के पास ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने या आदेश जारी करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है जो पहले ही अदालत के जरिए अंतिम निर्णय तक पहुंच चुके हैं।
जस्टिस एम. जी. एस. कमाल ने अपने आदेश में विधानसभा समिति के इस कदम को पूरी तरह से अधिकार-क्षेत्र से बाहर और मनमाना बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत के सामने ऐसा कोई कानून या प्रावधान पेश नहीं किया गया है, जो किसी विधायी समिति को अदालत के अंतिम आदेशों पर पुनर्विचार करने या उनके ऊपर बैठकर फैसला करने की शक्ति देता हो।
यह कानूनी चुनौती आईआईएससी और उसके तत्कालीन निदेशक अनुराग कुमार की ओर से दायर की गई थी। संस्थान ने हाईकोर्ट से विधानसभा की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति द्वारा 6 अक्टूबर 2017 को जारी उस निर्देश को रद्द करने की मांग की थी, जिसमें पूर्व असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. डी. सन्ना दुर्गप्पा को बहाल करने के लिए कहा गया था।
यौन उत्पीड़न के आरोपों से शुरू हुआ था विवाद
यह पूरा मामला साल 2014 से जुड़ा है। 25 सितंबर 2014 को दुर्गप्पा के खिलाफ आईआईएससी की यौन उत्पीड़न शिकायत समिति के पास एक शिकायत दर्ज कराई गई थी। समिति ने अपनी जांच पूरी कर महज पांच दिन बाद, यानी 30 सितंबर को दुर्गप्पा को पद से हटाने की सिफारिश की। इसके बाद संस्थान की गवर्निंग काउंसिल ने दुर्गप्पा से उनका पक्ष मांगा और उनकी दलीलों पर विचार करने के बाद 28 अप्रैल 2015 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया।
बर्खास्तगी के बाद दुर्गप्पा ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। इसके साथ ही उन्होंने नागरिक अधिकार प्रवर्तन निदेशालय और कर्नाटक राज्य एससी/एसटी आयोग के पास भी अपनी बर्खास्तगी और जातिगत उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करा दी।
अदालत की निगरानी में हुआ था समझौता
साल 2015 के अंत में दोनों पक्षों के बीच हाईकोर्ट की मध्यस्थता और निगरानी में एक समझौता हुआ। इस समझौते के तहत दुर्गप्पा की बर्खास्तगी को स्वैच्छिक इस्तीफे में बदल दिया गया और उन्हें उनके सभी वित्तीय लाभ सौंप दिए गए। इसके बदले में दुर्गप्पा ने संस्थान के खिलाफ दर्ज अपनी सभी शिकायतें वापस लेने पर सहमति जताई थी। हालांकि, इसके चार महीने बाद ही दुर्गप्पा ने इस समझौते को रद्द कराने के लिए दोबारा हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन तब अदालत ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया था।
बिना तथ्य विचार किए समिति ने दिया आदेश
हाईकोर्ट की देखरेख में हुए इस समझौते को चुनौती दिए बिना दुर्गप्पा ने साल 2017 में विधानसभा की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति के पास एक आवेदन दायर कर दिया। समिति ने इस पर आईआईएससी को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने और पेश होने का निर्देश दिया। आरोप है कि समिति ने संस्थान द्वारा सौंपे गए लिखित जवाब पर कोई विचार नहीं किया और सीधे दुर्गप्पा को बहाल करने का फरमान जारी कर दिया।
आईआईएससी का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता एस. आर. कमलाचरण ने अदालत में दलील दी कि दुर्गप्पा की इस शिकायत का उद्देश्य बकाया लाभ पाना नहीं था, बल्कि वह उन यौन उत्पीड़न के आरोपों में खुद को बेकसूर साबित करने की कोशिश कर रहे थे, जिनका कानूनी रूप से पहले ही अंतिम निपटारा हो चुका था।
हाईकोर्ट ने संस्थान की दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि विधानसभा समिति के बहाली आदेश में किसी पुराने अदालती फैसले या ऐसे किसी कानून का कोई जिक्र नहीं था जो उसे इस तरह का निर्देश देने की शक्ति प्रदान करता हो। इसलिए यह आदेश पूरी तरह से क्षेत्राधिकार की कमी के कारण रद्द किए जाने योग्य है।
उत्पीड़न के अन्य मामले भी कोर्ट से खारिज
अपनी बहाली की कोशिशों के समानांतर दुर्गप्पा ने इन्फोसिस के सह-संस्थापक और आईआईएससी गवर्निंग काउंसिल के अध्यक्ष क्रिस गोपालकृष्णन समेत संस्थान के 15 अन्य वरिष्ठ अधिकारियों और फैकल्टी सदस्यों के खिलाफ जातिगत उत्पीड़न की तीन अलग-अलग शिकायतें भी दर्ज कराई थीं।
साल 2025 में हाईकोर्ट ने उनकी तीसरी शिकायत को भी खारिज कर दिया था। अदालत ने तब स्पष्ट किया था कि ये आरोप एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आते। कोर्ट ने इन शिकायतों को अधिकारियों को तंग करने का एक दुर्भावनापूर्ण प्रयास और अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग करार दिया था। अदालत का कहना था कि यह मूल रूप से एक दीवानी (सिविल) विवाद था, जिसे जबरन आपराधिक रंग देकर बार-बार शिकायतें दर्ज कराई जा रही थीं।

