सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वैज्ञानिकों की पदोन्नति के लिए उनकी उपयुक्तता का निर्धारण विषय विशेषज्ञों (डोमेन एक्सपर्ट्स) द्वारा किया जाना चाहिए, न कि उनके प्रदर्शन मूल्यांकन और कार्य रिपोर्ट के अंकों का गणितीय औसत निकाल कर। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट और सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट), बेंगलुरु के उन आदेशों को खारिज कर दिया, जिनमें सीएसआईआर को निर्देश दिया गया था कि वह प्रतिवादी वैज्ञानिक की पदोन्नति पर दोनों अंकों का औसत निकालकर पुनर्विचार करे।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले के अनुसार, प्रतिवादी अनिल अर्नस्ट सीएसआईआर में एक वैज्ञानिक थे। उन्होंने सीएसआईआर वैज्ञानिक भर्ती और पदोन्नति नियमावली, 2001 के तहत 19 सितंबर 2012 से सीनियर साइंटिस्ट के पद पर पदोन्नति की पात्रता का दावा किया था। इस नियमावली के तहत वैज्ञानिकों की पदोन्नति के लिए एक बहु-स्तरीय मूल्यांकन प्रक्रिया होती है, जो उनकी न्यूनतम सेवा अवधि और वार्षिक प्रदर्शन रिपोर्ट (एपीआर) या परफॉर्मेंस मैपिंग स्कीम (पीएमएस) की ग्रेडिंग से जुड़ी होती है।
हालांकि अर्नस्ट को बाद में 19 सितंबर 2015 से सीनियर साइंटिस्ट के रूप में पदोन्नत कर दिया गया था, लेकिन उन्होंने 2012 की अवधि के लिए पदोन्नत न किए जाने के फैसले को कैट बेंगलुरु के समक्ष चुनौती दी। अर्नस्ट का कहना था कि उनकी न्यूनतम सेवा अवधि के दौरान उनका पीएमएस स्कोर औसतन 92.1% था, जो उन्हें मूल्यांकन के योग्य बनाता था। लेकिन 14 सितंबर 2016 को हुई मूल्यांकन समिति (असेसमेंट कमेटी) की बैठक ने उनकी ‘वर्क रिपोर्ट’ का मूल्यांकन किया और उन्हें केवल 82% अंक दिए, जो पदोन्नति के आवश्यक 85% के बेंचमार्क से कम था।
अर्नस्ट का तर्क था कि मूल्यांकन समिति को उनके पीएमएस स्कोर (92.1%) और वर्क रिपोर्ट स्कोर (82%) का औसत निकालना चाहिए था। ऐसा करने से संयुक्त औसत 87.05% हो जाता, जो 85% की पात्रता सीमा को पार कर लेता। कैट बेंगलुरु ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए उनकी पदोन्नति का निर्देश दिया था। इसके बाद कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी इस तर्क की पुष्टि की, लेकिन निर्देश में थोड़ा संशोधन करते हुए मामले को सीएसआईआर को वापस भेज दिया ताकि वे एक समीक्षा विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) आयोजित करें। सीएसआईआर ने इन दोनों फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।
दोनों पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता सीएसआईआर ने अदालत के सामने तर्क दिया कि पदोन्नति की प्रक्रिया दो अलग-अलग चरणों में काम करती है। पहले चरण में एक आंतरिक स्क्रीनिंग कमेटी वार्षिक एपीआर/पीएमएस ग्रेड के आधार पर उम्मीदवारों की पात्रता की जांच करती है। जो उम्मीदवार इस पात्रता सीमा को पूरा करते हैं, उनके नाम दूसरे चरण यानी मूल्यांकन समिति (असेसमेंट कमेटी) के पास भेजे जाते हैं।
सीएसआईआर ने दलील दी कि 1 जून 2011 के सर्कुलर के पैराग्राफ 3(बी) के तहत, मूल्यांकन समिति उम्मीदवार की ‘वर्क रिपोर्ट’ और सेवा अवधि के पीएमएस के आधार पर उसका मूल्यांकन करती है। नियमों में कहीं भी पीएमएस और वर्क रिपोर्ट के अंकों का गणितीय औसत निकालने का प्रावधान नहीं है। चूंकि मूल्यांकन समिति ने अर्नस्ट को समग्र मूल्यांकन में 82% अंक दिए थे—जो 85% की पात्रता सीमा से कम थे—इसलिए उन्हें उस अवधि के लिए “पदोन्नति के लिए अभी उपयुक्त नहीं” घोषित किया गया था।
दूसरी ओर, प्रतिवादी वैज्ञानिक के वकील ने तर्क दिया कि पैराग्राफ 3(बी) में प्रयुक्त “और” शब्द (जिसमें कहा गया है कि मूल्यांकन वार्षिक प्रदर्शन/पीएमएस और वर्क रिपोर्ट पर आधारित होगा) यह दर्शाता है कि दोनों घटकों पर विचार किया जाना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि इन दोनों पैमानों को कितना महत्व (वेटेज) दिया जाना चाहिए, इस संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देशों की अनुपस्थिति में औसत निकालना ही एकमात्र तार्किक और गैर-मनमाना तरीका था। प्रतिवादी के वकील ने चिंता जताई कि यदि इस औसत फॉर्मूले को खारिज किया जाता है, तो यह मूल्यांकन समिति को असीमित और अनियंत्रित शक्तियां प्रदान करेगा, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मनमानेपन के खिलाफ नियम का उल्लंघन होगा।
कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने कैट बेंगलुरु और कर्नाटक हाईकोर्ट दोनों द्वारा नियमों की इस व्याख्या को खारिज कर दिया। 2001 के नियमों और 2011 के सर्कुलर का विश्लेषण करते हुए, पीठ ने टिप्पणी की कि पैराग्राफ 3(बी) केवल मूल्यांकन समिति को पीएमएस और वर्क रिपोर्ट दोनों पर विचार करने का निर्देश देता है, लेकिन अंक देने के लिए कोई विशिष्ट तरीका या गणितीय फॉर्मूला निर्धारित नहीं करता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमों में औसत निकालने की अनिवार्यता को शामिल करना वैधानिक प्रावधानों में अपनी तरफ से शब्द जोड़ने जैसा होगा। वैधानिक व्याख्या के स्थापित सिद्धांतों का हवाला देते हुए, अदालत ने सुरजीत सिंह कालरा बनाम भारत संघ (1991) और हमीदिया हार्डवेयर स्टोर्स बनाम बी. मोहन लाल सोकार (1988) के मामलों का जिक्र किया। कोर्ट ने रेखांकित किया कि अदालतें किसी प्रावधान में गायब शब्दों को तब तक नहीं जोड़ सकतीं जब तक कि वे गलती से छूट न गए हों या उनके बिना प्रावधान का कोई अर्थ ही न रह जाए।
इसके अलावा, अदालत ने माना कि एक वैज्ञानिक के लिए उसकी ‘वर्क रिपोर्ट’ अत्यंत महत्वपूर्ण होती है और इसका मूल्यांकन किए जा रहे शोध की जटिलता पर निर्भर करता है। पीठ ने कहा कि मूल्यांकन समिति एक उच्च स्तरीय निकाय है जिसमें प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञ शामिल होते हैं और पदोन्नति को लेकर पूर्ण विवेक उनके पास ही रहना चाहिए।
अपना मुख्य कानूनी निष्कर्ष साझा करते हुए अदालत ने कहा:
“पदोन्नति के लिए उपयुक्तता का निर्धारण विषय विशेषज्ञों पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए और नियमों की अनुपस्थिति में, किसी विशेष उम्मीदवार की पदोन्नति के लिए उपयुक्तता के मूल्यांकन में उन्हें कुछ हद तक छूट दी जानी होगी।”
पीठ ने आगे स्पष्ट किया:
“वार्षिक प्रदर्शन रिपोर्ट (एपीआर)/पीएमएस अंकों और ‘कार्य रिपोर्ट’ पर प्राप्त अंकों के औसत की प्रक्रिया, जिसे कैट द्वारा अपनाया गया था और हाईकोर्ट द्वारा इसकी पुष्टि की गई थी, उसे बरकरार नहीं रखा जा सकता है।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
मूल्यांकन समिति के सदस्यों के खिलाफ दुर्भावना या पक्षपात का कोई आरोप न पाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि निचले मंचों ने नियमों का गलत अर्थ निकाला था। अदालत ने सीएसआईआर की अपीलों को स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट और सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल दोनों के आदेशों को रद्द कर दिया और प्रतिवादी द्वारा दायर मूल आवेदन को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: द डायरेक्टर जनरल, काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च व अन्य बनाम अनिल अर्नस्ट
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 8790-8791/2026
पीठ: जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस मनमोहन
निर्णय की तिथि: 10 जुलाई, 2026

